August 24, 2005

अध्याय ८: साला मैं तो साहब बन गया!

एनआरआई होने का अहसास
पूरे डेढ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गयीं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुँचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सबेरे के समय पहुँचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते आते रात हो गयी थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आँखो में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूढते ढूढते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की जमीन छुई तो प्लेन के अँदर सारे बच्चो ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखखर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत माँ की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षो बाद लौटे थे , हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गये।

हम नही सुधरेंगे
हलाँकि थोड़ी ही देर में सारा हर्ष गर्म मक्खन की तरह पिघल कर उड़ गया जब कन्वेयर बेल्ट पर अपना सामान नदारद मिला। पता चला कि ब्रसेल्स और ज्युरिख के बीच एयरलाईन वाले सामान जल्दी मे नही चढा पाये अतः अगली उड़ान में भेजेंगे। उन लोगो ने मेरा सामान निकटतम एयरपोर्ट यानि कि लखनऊ भेजने का वायदा किया। अब मैं हाथ में इकलौता केबिन बैग लेकर ग्रीन चैनल की ओर बड़ा जहाँ कस्टम आफिसर्स से पाला पड़ा। मेरे बैग में एक अदद सस्ता सा कार्डलेस और मेरे कपड़े थे। कस्टम अफिसर को वह दस डालर वाला फोन कम से कम सौ डालर का मालुम हो रहा था। मुफ्त में उसे ९०० और २.४ के फोन का अँतर समझाना पड़ा। हलाँकि आजकल कस्टम वाले ज्यादा तँग नही करते , शायद उपर से सख्ती है या फिर अब विदेशी सामान का ज्यादा क्रेज नही रहा। पर वर्ष २००० में स्थिति बहुत अच्छी नही थी। मेरे एक मित्र श्रीमान वेदमूर्ति जिन्हे अक्सर काम के सिलसिले में भारत जाना पड़ता था, इन कस्टम वालो की चेकिंग से आजिज आकर किसी खड़ूस कस्टम क्लर्क को अच्छा सबक सिखा आये थे। जनाब ने किसी चाईनाटाउन से ऐसा सरदर्द वाले बाम की डिब्बियाँ खरीदी थी जिनपर अँग्रेजी मे कुछ न लिखा था, इन डिब्बियों को जनाब वेदमूर्ती ने वियाग्रा जेली बताकर इँदिरा गाँधी हवाईअड्डे पर कस्टम क्लर्क को टिका दिया था। अब आगे क्या हुआ, यह जानने से बचने के लिए जनाब वेदमूर्ती यथासँभव इँदिरा गाँधी हवाईअड्डे पर जाने से कतराते हैं।

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है?
दिल्ली से कानपुर का सफर शताब्दी पर कट गया। सुना है कि दूसरे कि दाल में घी हमेशा ज्यादा दिखता है। यही कहावत आज खुद पर चरितार्थ हो रही थी। पहले रास्ते में पड़े गाँव कस्बे जिनको महज डेढ साल पहले ट्रेन से देखने लायक नही समझता था और सिर्फ सफर का अनचाहा हिस्सा लगते थे, आज बेहतरीन लैंडस्केप का नमूना लग रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली रेल क्रासिंग पर ट्रैक्टर, मोटरसाईकिल और साईकिल पर सवार लोग, लगता था कि बिल्कुल बेतकल्लुफ और हमारी तेजरफ्ता जिंदगी के मुकाबले कितने बेफिक्र हैं। मेरी इस राय से मेरे साथ चल रहे मेरे साले साहब यानि कि राजू भाई भी इत्तेफाक रखते हैं। मजे कि बात है कि राजू भाई को कानपुर की जिंदगी तेजरफ्ता लग रही है। अपने अपने पैमाने हैं, पर साफ दिख रहा है कि सारे भौतिक सुख बटोर लेने की चाहत ने हमारे कानपुर,लखनऊ सरीखे शहरों में भी अद्श्य एचओवीलेन पैदा कर दी हैं। शेरो शायरी का कोई खास शौक तो नही मुझे पर एक गजल का टुकड़ा याद आता है "इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है?"

ओमनी वैन
कानपुर सेंट्रल पर पूरा परिवार अगवानी करने आ गया था। हमारे चाचाश्री किसी मित्र की मारूति ओमनी वैन मय ड्राईवर के ले आये थे। आखिर भतीजा अमेरिका से आ रहा है, मजाल है कि आटो या रिक्शे पर चला जाये। पिछलि दो सीटो पर जहाँ अमेरिका में महज पाँच लोग बैठते हैं, यहाँ आठ दस लोग बैठ गये थे। मैं ड्राईवर के बगल में बैठा तो बगल के दरवाजे से चाचाश्री प्रविष्ट हुए यह कहते हु कि "जरा खिसको गुरू।" खिसकने के लिए गियर के दोनो तरफ पैर डालने पड़े। अब दाँयि तरफ से ड्राइवर साहब गुजारिश कर रहे थे कि भाईजान जरा गियर लगाना है, पैर खिसका लिजीये। उधर सामने सड़क पर गाय,भैंसे और साईकिलें, मालुम पड़ रहा था कि विंडस्क्रीन से चिपके हुए चल रहे हैं और कहीं गाड़ी से लड़ न जाये। ऐसा नही था कि मैं इन चीजो का आदी नही हूँ, अरे भाई पूरे दस साल मैने भी साइकिल, टीवीएस चैंप और एलएमएल वेस्पा इन्ही सड़को पर चलायी है और ऐसी चलाई है कि जान अब्राहम भी नही चला सकता । पर महज एक साल के अमेरिका प्रवास ने आदत बिगाड़ दी है। अपनी ही सड़क पर हल्की सी दहशत मालुम हो रही है। सिर्फ एक समझदारी की मैनें, कि वैन में यातायात पर कुछ नही बोला नही तो पिछली सीट पर बैठे भाई,बहनों की टीकाटिप्पणियों की बौछार कुछ यूँ आती।

  • एक ही साल में रँग बदल गया।
  • रँगबाजी न झाड़ो।
  • जनाब एनआरआई हो गये हैं।
  • यह अटलाँटा नही कानपुर है प्यारे।
  • कनपुरिये तो अटलाँटा में कार दौड़ा सकते हैं लेकिन किसी अमेरिकी की हिम्मत है जो कानपुरिया ट्रैफिक के आगे टिक सके?


सुना है तेरी महफिल में
एक पुराना गाना याद आता है जो कुछ यूँ है
साकिया आज कि रात नींद नही आयेगी
सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।
पूरे ३६ घँटो का सफर कट गया। पर रात में जैट लैग शुरू हो गया। इस बला से लंबी हवाई यात्रा कर चुके लोग वाकिफ है। दरअसल अमेरिका से भारत आते हुए आप समय की कई स्थानीय सीमाऐं लाँघ कर आते हैं। अमूमन अगर आप अमेरिका से शाम को चलते हैं जब भारत में स्थानीय समय के हिसाब से सुबह होती है। भारत का समय आम तौर पर अमेरिका से ११ घँटे आगे चलता है। इसिलिए शुरू में कई रिश्तेदार जो इस अलबेले समय के झमेले से नावाकिफ थे, फोन करने पर हैरान होते थे कि उनके सोने जाने के समय मैं सवेरे की चाय कैसे पी रहा हूँ? जब आप दिल्ली पहुँचते है तो आपका शरीर उस ११ घँटे की समय सीमा को तुरँत नहीं लाँघ पाता। उसे भारत के दिन में रात महसूस होती है। इसिलिए रात के दो तीन बजे नींद खुल जाती है और दोपहर में आदमी सुस्ती महसूस करता है। हलाँकि कुछ लोग इसे एनआरआई लटके झटके समझ लेते हैं।

आप लाईन में क्यूँ लगे?
दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाड़ू लग रही थी, सारे कर्मचारि नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आईये। यहाँ सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बँद किवाड़ खुलने लगे थे और जेट लैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यवहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घँटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया। थोड़ी देर में बैंक का चपरासी पहचान गया। दरअसल इसी शाखा में मेरे एक चाचाश्री मैनेजर रह चुके थे, अब उनका ट्राँसफर हो गया था। पर उनकी तैनाती के दिनो में यही चपरासी घर पर बैंक की चाभी लेने आता था। चपरासी का नाम भी याद आ गया शँभू। शँभू जोर से चिल्लाया अरे भईया आप यहाँ? कहाँ थे इतने दिन ? शँभू पंडित को यह तो पता था कि मैं कानपुर से बाहर काम करता हूँ पर उसके "बाहर" की परिधि शायद हद से हद दिल्ली तक थी। मैने भी अनावश्यक अमेरिका प्रवास का बखान उचित नही समझा और उसे टालने के लिए कह दिया कि बाहर काम कर रहा था, इसलिए अब कानपुर कम आता हूँ। पर शँभू पँडित हत्थे से उखड़ गये। लगे नसीहत देने "अरे भईया, कोई इतनी दूर भी नही गये हो कि दोस्तों के जनेऊ शादी में न आ सको। अरे दिल्ली बँबई का किराया भी ज्यादा नही है।" अब शँभू पँडित खाँमखा फटे मे टाँग अड़ा रहे थे। उनको रँज था कि मैं अपने कुछ दोस्तो की शादी वगैरह में कानपुर नही पहुँचा था। शँभू पँडित के इस तरह से उलाहना से बड़ी विकट स्थिति हो रही थी। भँडाफोड़ करना ही पड़ा , शँभू पँडित को जवाब उछाला "अबे, अमेरिका मे था, अब यहाँ हर महीने थोड़े ही आ सकता हूँ?" इतना बोलना था कि आस पास खड़े लोग मुड़कर देखने लगे और पहचानने की कोशिश करने लगे। यहाँ तक की बैंक मैनेजर के केबिन से आवाज आयी "अबे शँभू कौन है ? किससे बाते कर रहे हो?" शँभू पँडित को यह जोर का झटका धीरे से लगा था, सकपका कर बोले "साहेब, अरोरा साहब के भतीजे हैं, अमेरिका में रहते हैं।" केबिन से फिर आवाज आयी "अबे तो उन्हे बाहर क्यों खड़ा कर रखा है।" एक मिनट के अँदर ही मैं मैनेजर साहब से मुखातिब था। मैनेजर साहब ने क्लर्क को केबिन में बुलाकर मेरे काम करवा दिया और अमेरिका के बारे में अपनी कुछ भ्रांतियों का निराकरन करवाया। मेरा काम तो हो गया था पर मैं सोच रहा था कि वह अस्सी लोग जो लाईन में खड़े थे उन्हे क्या मैनेजर साहब बेवकूफ समझते थे जिनके ऊपर किसी भी नेता,अभिनेता,वीआईपी या एनआरआई को तवज्जो दी जा सकती है और वे उफ्फ तक नही करते।