November 08, 2005


Table of Contents



  • प्रस्तावना
  • अध्याय ‍१: ओवर टू यूएसए
  • अध्याय २: पहली हवाई यात्रा
  • अध्याय ३: वेलकम टु अमेरिका
  • अध्याय ४: गड्डी जान्दी है छलांगा मारदी! 
  • अध्याय ५: अटलाँटा के अलबेले रँग
  • अध्याय ६: वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट 
  • अध्याय ७: छुट्टी के रँग, केडी गुरू के सँग!
  • अध्याय ८: साला मैं तो साहब बन गया! 
  • अध्याय ९: जीरो मतलब शून्य!
  • अध्याय १०: पिंक या ब्लू !

  • अध्याय १०: पिंक या ब्लू

    चलो भाग चले पूरब की ओर
    भारत से वापसी हुई तो डलास से भी रूखसत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फिलाडेल्फिया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका में दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था, जो बेबुनियाद भी नही था। सत्यनारायण अपने बर्फ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। वहीं महेश भाई की तो जबरदस्त दुर्गति हुई थी। किसी भारत में रहने वाली मौसी से बतिया रहे थे महेश भाई। रिसेप्शन न मिलने की वजह से अपार्टमेंट के बाहर आ गये। अपार्टमेंट के पास एक रेल का ट्रेक था, वहाँ से जाती एक ट्रेन की आवाज सुनकर मौसी को शक हो गया कि महेश भाई किसी चाल या खोली में रहते हैं बिल्कुल वैसी ही जैसी भारत में रेलवे लाईन के पास कुँजड़ाबस्तियाँ होती हैं। महेशभाई मौसी की अफवाहप्रसारण क्षमता से भलीभाँति परिचित थे अतः उन्हे ठँडी हवा में ठिठुरते हुए भी यह समझाते रहे कि अमेरिका कि रेलवे लाईन के किनारे भारत की तरह कोई अवैध बस्तियाँ नहीं बसी होती। इस बीच हवा के झोंके से अपार्टमेंट का दरवाजा बँद हो गये और महेशभाई एक अदद बनियान पायजामे में कड़कती ठँड में सड़क पर। अपार्टमेंट आफिस भी रविवार की वजह से बँद। मेंटिनेंस वालो का नँबर याद नही। किसी योगी सरीखे दिखते महेशबाई चलदिये दो मिल दूर रहने वाले किसी दोस्त के यहाँ डाँडी यात्रा पर। रास्ते में अगर एक पुलिसवाला न मिलता तो शायद महेशभाई हमें अटंलाँटा मे न मिलते और हमें बर्तन रखने कि अलमारी के बारे में भी न पता चलता।
    खैर हमारे पास फिलाडेल्फिया जाने के अलावा कोई विकल्प न नही था। दिंसबर का मौसम था और इस डलास से फिलाडेल्फिया पूरे सौलह सौ मील ड्राइव करना संभव नही था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फिलाडेल्फिया को रूख किया। फिलाडेल्फिया में एक छोटे से उपशहर जिसे हम यहाँ सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा "किंग आफ प्रशिया"। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा, पर सभी निरूत्तर थे। इतिहास खँगालने पर भी यही पता चला कि १८५१ में किसी सर्वेक्षणकर्ता ने किसी होटल पर किंग आफ प्रशिया लिखा देख कर पूरे कस्बे का नाम यही समझ लिया| अब वह होटल वाला खुद किंग था या प्रशिया से आया था, खुदा जाने।

    बाँके बिहारी
    किंग आफ प्रशिया में आने पर पता चला कि हमारे परिवार का अँतरराष्ट्रीयकरण होने जा रहा है। इसमें एक अमेरिकी शामिल हो जायेगा। इस नये मेहमान के आने की तैयारियाँ शुरू हो गई। एक ऐसे ही शनिवार को नये अमेरिकी के संभावित नाम पर विचार विमर्श चल रहा था। आजकल बच्चों के इतने क्लिष्ट नाम रखे जा रहे हैं जिनको अँग्रेजी में टाँगटिव्सटर्स की संज्ञा दी जा सकती है। उस पर तुर्रा यह कि कभी कभी खुद माँ बाप को पता नही होता कि नाम का मतलब क्या है। फिर कई बार एक देश में रखा नाम दूसरे देश में मुसीबत बन जाता है। कुछ अक्षरों का तो अमेरिकन अँग्रेजी में वजूद ही नही । खुद मेरे नाम में आने वाला "त" कभी ड कभी ट बना डालते हैं यहाँ लोग। मेरे एक मित्र वाजिद की तो शामत ही आ गई थी। बेचारे ने बड़े अरमान से अपने जिगर के टुकड़े का नाम फख्र रख दिया। पर हर मेहमान , हर रिश्तेदार उनकी बुद्दि पर तरस खाते हुए उन्हें बच्चे का नाम बदलने की सलाह देने लगा,लेकिन वाजिद भाई भी अपनी पसंद पर अड़े रहे। पर बच्चे ने स्कूल जाना शुरू करने और समझदार हो जाने पर गदर काट दी कि या तो हमारा नाम बदलो या हमारा स्कूल। देर से ही सही वाजिद भाई को बात समझ में आ गयी और तमाम अदालती सरकारी खर्चों के बाद फख्र मियाँ, सलीम उर्फ सैम बन गये। कुछ ऐसे ही संस्कृति के कीड़े ने हमें काटा और हमें सूझा कि अगर हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो हम उसका नाम बाँके बिहारी रखेंगे। न जाने क्यों श्रीमती जी को यह नागवार गुजरा। उनको केशव,माधव वगैरह नाम पुरातन पंथी लग रहे थे जब्कि बाँके नाम से गुँडेपन का अहसास हो रहा था। इस मुद्दे पर हमारे गंभीर मतभेद हो गये। अँततः यह समझौता हुआ कि बाँके नाम सिर्फ घर में प्यार से पुकारा जायेगा।

    बच्चों की बरसात
    नये मेहमान के लिए हम सपरिवार ट्वायसआरअस गये। यहाँ नवजात शिशुओं के लिए एक सेक्शन ही अलग बना होता है। वहाँ हमारे सरीखे कई परिवार खरीदारी में लगे थे। ऐसी ऐसी चीजे जो कभी न देखी न सुनी। हमें किंकर्तव्यविमूढ देख एक सहायिका ने पूछा कि क्या हम बेबीशावर की योजना बना रहे हैं। इस सवाल पर हम से ज्यादा हमारी बेटी चकित थी कि भला बच्चो की बरसात कैसे हो सकती है और अगर बच्चे बरसने लगे तो कैसा नजारा होगा। इस नये शब्द का मतलब भी जल्द समझ में आ गया, बेबी शावर बहुत कुछ उत्तर भारत में होने वाली गोद भराई की रस्म जैसा उत्सव होता है। पर यहाँ आपके घर अनचाहे या एक सरीखे दो तीन उपहार न आ जाये इसके लिए आप अपनी पसंद के किसी स्टोर में अपनी मरजी की उपहार सूची चुन कर उसे अपने मित्रों या रिशतेदारों में ईमेल से वितरित कर देते हैं। लोग उसमें से अपनि पसंद या सामर्थ्य के हिसाब से चुनाव करके भुगतान कर देते हैं और उत्सव वाले दिन सारे सामान आपके घर एकसाथ पहुँच जाते हैं। कुछ ऐसा ही शादी विवाह में भी होता है। अगर ऐसा भारत में भी होता तो हर नवविवाहित को छः घड़ियाँ , तीन आईसक्रीम सेट , बारह लंचबाक्स और बत्तीस थर्मसों का संग्रहालय न बनाना पड़े या फिर गुप्ताजी का गिफ्ट वर्माजी की लड़की की शादी में और वर्माजी का गिफ्ट मिसेज कटियार की सालगिरह में न टिकाना पड़ता।

    बताओ डाक्टर ने क्या बताया?
    कुछ सप्ताह बाद श्रीमती जी का स्वास्थय परीक्षण के दौरान अल्ट्रासाऊँड हो रहा था। अमेरिका में बेटे या बेटियों को लेकर मुझे कोई पूर्वाग्रह नही दिखा। हलाँकि अल्ट्रासाउँड में नर्स होने वाले बच्चे का लिंग बता सकती है पर बहुत से दंपत्ति इसे अँत तक नही जानना चाहते। पर बच्चे के मामले में कई विशेषाधिकार माँ को प्रदत्त हैं। यही अल्ट्रासाउँड में हुआ , नर्स ने श्रीमती जी से पूछा कि क्या वे जानना चाहेंगी कि होने वाले बच्चे का लिंग क्या है। मारे रोमांच के श्रीमती जी की गर्दन १८० डिग्री केकोण पर घूम गई। नर्स ने यह जानना चाहा कि क्या वे इस सूचना के अधिकार से मुझे भी वंचित रखना चाहेंगीं। पता नहीं क्यों उन्होने हाँ कर दी। फिर क्या था, नर्स ने श्रीमती जी की आँखे ढँक कर मुझे इशारे से बता दिया कि "Its a boy!"। अस्तपताल से बाहर आते ही श्रीमती जी प्रश्न था "बताओ डाक्टर ने क्या बताया?" मैने चुहलबाजी में बहाना टिका दिया कि आप तो रोमांच को रोमांच ही रखना चाहती है अतः इसे रहस्य ही रहने दें। पर उनके पास ब्रह्मास्त्र मौजूद था। उन्होंने दाँव फेका कि चूँकि अमेरिका में हमारे रिश्तेदार वगैरह न होने कि वजह से सारी खरीदारी हमें ही करनी होगी और वह भी शिशुआगमन से पहले इसलिए मुझे या तो उन्हें सच बता देना चाहिए या फिर दोहरी खरीदारी के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि लड़की और लड़के के कपड़े अलग अलग होते हैं।

    प्रेटी वीमेन
    अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाऐं लगती हैं शिशुपालन की भी, और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आने है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहाँ प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी। मेरा विचार यह बना कि यह नियम भारत में बजाय विकल्प के आवश्यक कर देना चाहिये , बिना किसी धर्म के कठमुल्ले विचारों की परवाह किये बगैर। मुझे लगता है कि संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रसवगृह में जूझते छोड़ अस्तपताल के बाहर चाय आमलेट उड़ाते हिंदुस्तानी पतियों को जब तक सृजन में होने वाली वेदना का साक्षात दर्शन नही होगा, उन्हें सृजन की पीड़ा का पता नहीं चलेगा। अगर एक बार यह हो जाये तो अँधाधुध बढती आबादी पर रोक लगाने की अक्ल भी आ जायेगी और दुर्गा , सीता का नाम ले लेकर कन्या भ्रूण के खून से हाथ रँगने से पहले हाथ भी काँपेंगे। हमारी श्रीमती जी को उनकी किसी मित्र ने भ्रामक सूचना दे दी कि उनका डाक्टर महाखड़ूस है। श्रीमती जी ने डाक्टर बदलने का आग्रह कर डाला। अभी तक मुझे डाक्टर ठीक ही लगा था। पूछताछ करने पता चला कि गलती श्रीमती जी की सहेली के पतिदेव श्रीमान दुरईस्वामी की थी। दुरईस्वामी के यहाँ भी नये मेहमान की तैयारी थी। उनके यहाँ आपरेशन होना निश्चित था। डाक्टर ने दुरईस्वामी से सलाह मशविरा करके सबकी सुविधानुसार आपरेशन का दिन तय करदिया। शाम को दुरईस्वामी ने भारत में अपने पिताश्री को फोन करके आपरेशन के बारे में बताया। अगले दिन सबेरे सबेरे दुरईस्वामी का फोन बजा। यह उनके पिताश्री थे जो किसी ज्योतिषी के यहाँ यह पता कर आये थे कि दुरईस्वामी के तय की तारीख पर पैदा हुऐ बच्चे की कुँडली के सातवें घर मे राहु की धमाचौकड़ी मचनी तय है। अब दुरईस्वामी ने आफिस के आकस्मिक टूर का बहाना बना कर डाक्टर को बमुश्किल आपरेशन को एकदिन आगे खिसकाने पर राजी किया। अगले दिन फिर सबेरे सबेरे दुरईस्वामी का फोन बजा। पिताश्री ही थे फोन पर। दरअसल पिछलीबार ज्योतिषी ने गलती से भारतीय समयानुसार कुँडली विचार दी थी। अब दुरईस्वामी द्वारा तय नयी तारीख पर अगर बच्चे का जन्म होता तो बच्चे की कुँडली के पाँचवे घर मे चँद्रमा और केतू की बीच मारामारी होने वाली थी। बेचारे दुरईस्वामी के एक तरफ डाक्टर नाम का कुँआ था जो फिर तारीख बदलने की गुजारिश पर फट पड़ता और दूसरी तरफ पिताश्रीरूपी खाई थी जो तारीख न बदलवाने पर दुरईस्वामी को अपनी जायदाद से बेदखल करने पर अमादा थे। दुरईस्वामी ने कुँऐ में कूदना मुनासिब समझा और डाक्टर से उलझ गये। डाक्टर खूब चीखा चिल्लाया पर दुरई की कुँडली के आगे उसकी एक न चली। उसने मन मारकर फिर से अपने व्यस्त कैलेँडर से छेड़छाड़ की और नयी तारीख पर आपरेशन किया।
    खैर निश्चित दिन पर हम अस्तपताल पहुँचे और कमरा देख कर दँग रह गये। अच्छा खासा होटल का कमरा दिख रहा था। आक्सीजन सिलेंडर, ग्लूकोज चढाने की नली और बाकी संयत्र वस्तुतः कमरे की दीवारों में लकड़ी की दीवारों के पीछे छिपे थे, ताकि किसी को उन्हें देख कर अनावश्यक मानसिक तनाव न हो। श्रीमती जी के लिए टीवी सेट भी लगा था और उसपर प्रेटीवीमेन चल रही थी। कुछ देर में डाक्टर आये तो श्रीमती जी ने निर्देश थमा दिया कि उन्हें पुत्र या पुत्री का क्या नाम सर्टिफिकेट में लिखना है। श्रीमती जी को दो दो शंकाऐ थी, पहली कि शायद हमने उन्हें पुत्र वाली सूचना मन बहलाने के लिए बता रखी है और दूसरी कि प्रसव के बाद उनकी बेहोशी का फायदा उठाकर कहीं हम बर्थसर्टिफिकेट पर बाँकेबिहारी नाम न चढवा दें। डाक्टर उन्हें आश्वस्त करके शल्यक्ष ले गयें मुझे बाहर खिड़की के पास इंतजार करने की सलाह देकर।

    भयो प्रगट कृपाला
    करीब पंद्रह मिनट बाद ही एक नर्स हाथ में गुलाबी सा खिलौना लिये आ रही थी हमारी ओर। श्री श्री एक हजार आठ बाँके बिहारी जी महाराज का पदार्पण हो चुका था हमारे परिवार में। माननीय बाँके जी की भरपूर फोटो खींची गयीं। श्रीमती जी को बहुत कोफ्त हो रही थी अस्पताल में। शाकाहारी भोजन के नाम पर उबली गोभी , गाजर खानी पड़ रही थी और बाहर से खाना लाने पर पाँबदी थी। एक नरमदिल नर्स उन्हें जूस और फल वगैरह देकर दिलासा दे जाती थी। तीन दिन बाद हमें छुट्टी मिल जानी थी। छुट्टी वाले दिन दो अनुभव हुए। यह बताया गया कि बच्चे की कार सीट लाये बिना आपको बच्चा घर नही ले जाने दिया जायेगा। मेरे पास कारसीट थी पर नवजात शिशु के लिए हेडरेस्ट एक विशेष किस्म का तकिया लाना रह गया था। ट्वायसआरअस गया तो एक सेल्सगर्ल ने पूछा कि हेडरेस्ट बेटे के लिए लेना है या बेटी के लिए। जवाब सुनने पर वह कुछ परेशान होकर बोली अभी मेरे पास कोई नीला हेडरेस्ट नही है सिर्फ गुलाबी है। मैने कहा कि क्या फर्क पड़ता है। उसने गुलाबी हेडरेस्ट देते हुए कहा कि दो दिन बाद आकर नीले रंग वाले से बदल लेना। मैं सोच रहा था कि माना गुलाबी रंग लड़कियों पर फबता है पर "चलता है" वाली प्रवृति के चलते उसकी सलाह नजरअँदाज कर दी।

    पिंक या ब्लू
    अस्तपताल में डाक्टरों ने भली भाँति कारसीट की जाँच की , गुलाबी हेडरेस्ट देखकर नाक सिकोड़ी और पूरे दो घँटे तक निर्देश दिये कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। कुछ बाते जहाँ काम की थी वहीं कुछ सलाह अजीबोगरीब लग रहीं थी। जैसे कि बच्चा अगर रात में रोये तो या तो वह भूखा होगा या उसका बिस्तर गीला होगा। कुछ ऐसा लग रहा था कि हम नये माडल की कार घर ले जा रहे हों और सेल्समैन उसके फीचर्स के बारे में विस्तार से बता रहा हो। बाँके बिहारी हमें टुकुर टुकुर देख रहे थे , मानो कह रहो हों "पिताश्री , ठीक से निर्देश समझ लो। बाद में न कहना कि हमने रात में गदर क्यों काटी है या आप सबको हर दो दो घँटे में क्यो उठा रहा हूँ। यह सब तो पैकेज्ड डील है।" अस्तपताल से घर आने के पँद्रह दिन में ही पिंक या ब्लू का अमेरिकी कांसेप्ट अच्छी तरह से दिमाग में घुस गया। हर मिलने वाला छूटते ही कहता था कि बड़ी सुँदर बेटी है हमारी। हम हैरान कि अच्छा खासा लड़का सबको लड़की क्यों दिख रहा है। किसी अनुभवी दोस्त ने बताया कि यह समस्या लेबलिंग की है। अगर आटे की बोरी पर चावल का भी लेबल लगा दो तो एक औसत अमेरिकी उसे आटे के दाम पर खरीद लेगा। यहाँ मैने बाँके की कारसिट में गुलाबी हेडरेस्ट लगाकर लड़की होने का लेबल लगा दिया था।

    September 09, 2005

    अध्याय ९: जीरो मतलब शून्य!

    एकबार फिर फजीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यूँ कि लखनऊ फोन करना था। वर्ष २००० में मोबाईल,डब्लयूएलएल,आरआईएल और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुँचा और लखनऊ का नँबर मिलाने लगा। दोतीन बार प्रयास के बाद भी नँबर नही लग रहा था। सँचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद सँचालक कही तशरीफ ले गये थे और अपनी बहन को बैठाल गये थे। खैर उस कन्या ने पूछा कि आपका नँबर तो सही है। मेरे हिसाब से तो सही होना चाहिए था, अभी पिछले ही महीने तो अमेरिका से मिलाया था। जब एक बार फिर मिलाने लगा तो कन्या ने टोका ,
    कन्याः "आप क्या कर रहे हैं?"
    मैः लखनऊ का नँबर मिला रहा हूँ।
    कन्याःवह तो ठीक है पर एसटीडी कोड क्या मिला रहे हैं?
    मैः ५२२ , क्यों यह नही है क्या?
    कन्याः५२२ तो ठीक है पर जीरो क्यो नही लगा रहे?
    मैः जीरो
    कन्याःजीरो मतलब शून्य!
    मैः अरे, मुझे पता है जीरो मतलब शून्य।
    कन्याः लेकिन आप ५२२ के पहले शून्य क्यो नही लगा रहे? क्या पहली बार एसटीडी डायल किया है?
    दरअसल अमेरिका में आदत पड़ गयी थी ०११‍ ९१ ५२२ नँबर मिलाने की, अब यहाँ ०११‍ ९१ टपका कर शेष नँबर मिला रहा था।
    कन्या को अब कुछ शक हो चला था कि मैं शायद घाटमपुर सरीखे किसी देहात से उठकर सीधे शहर पहुँच गया हूँ और शायद जिंदगी में पहली बार एसटीडी मिला रहा हूँ। अब तक बाकी ग्राहको की दिलचस्पी भी मुझमें बढ चली थी। सबकी तिर्यक दृष्टि से स्पष्ट था कि मैं वहाँ एक नमूना बनने जा रहा था, जो शक्लोसूरत और हावभाव से तो पढा लिखा दिखता था पर उस नमूने को एसटीडी करने जैसे सामान्य काम की भी तमीज नही थी। मुझे याद आ गया कि करीब डेढ साल पहले एसटीडी मिलाने से पहले जीरो लगाने की आदत अमेरिका में आईएसडी मिलाते मिलाते छूट गयी थी और यहाँ मैंने सिर्फ आईएसडी कोड हटाकर जीरो न लगाने की नादानी कर डाली थी। खाँमखा बताना पढा कि मैं जीरो मतलब शून्य लगाना क्यों भूल रहा था। अब उस षोडशी की दिलचस्पी यह जानने में पैदा हो गई थी कि मैनें कित्ते पैसे देकर अमेरिका में नौकरी हासिल की थी। निम्न मध्यवर्ग जिसे अमेरिका में स्किल्ड लेबर्स कहते हैं, अपने खेत खलिहान बेचकर भी खाड़ी या लंदन में काम पाने की फिराक में रहता है। यह चलन वैसे पँजाब में कुछ ज्यादा है। डाटकाम के बुलबुले अभी दिल्ली बँबई से कानपुर सरीखे शहरो तक नही पहुँचे थे इसलिए किसी भी कनपुरिए को किसी ऐसे एनआरआई कनपुरिया जो अभी भी कानपुर में एलएमएल वेस्पा पर घूम रहा हो देख कर ताज्जुब करना स्वभाविक ही है।

    आपकी स्कूटर पर नँबर तो यूपी का है?
    अमेरिका में ट्रैफिक सिगनल स्वचालित हैं। इसिलिए यहाँ भारत की तरह चौराहे के बीच न तो मुच्छाड़ियल ट्रैफिक पुलिसवाला दिखता है न उसके के खड़े होने के लिए बनी छतरी। कभी कभी किसी समारोह वगैरह में या फिर सड़क निर्माण की दशा में ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए आम पुलिसवाले या पुलिसवालियाँ ही ट्रैफिक नियंत्रित करते हैं। पुलिसवालियाँ तो खैर डिंपल कपाड़िया जैसी दिखती ही हैं, पुलिसवाले भी कम स्मार्ट नही दिखते। केडीगुरू का मानना है कि इन पुलिसवालो की भर्ती के पहले ब्यूटी कांटेस्ट जरूर होता होगा। मैने भी आजतक एक भी तोंदियल पुलिसवाला नही देखा अमेरिका में। खैर फोटोग्रफी का नया शौक चर्राया था, जेब में कैमरा था और हैलट हास्पिटल के चौराहे पर सफेद वर्दी में एक ट्रैफिक हवलदार को देखकर उसकी फोटो लेने की सूझी। पर यह उतना आसान नही निकला जितना सोचा था। ट्रैफिक हवलदार बड़ा नखरीला निकला। पहले पँद्रह मिनट तक उसे यही शक बना रहा कि मैं शायद किसी मैगजीन या अखबार से हूँ और किसी लेख वगैरह में पुलिस की बुराई करने के इरादे से उस हवलदार की फोटो अपने लेख के लिए उपयोग कर लूँगा। वैसे पुलिसवालो की छवि कैसी है यह बताने की जरूरत नही पर उस वक्त वह दरोगा वाकई काम ही कर रहा था वसूली नहीं। पर उसे यह कतई हजम नही हो रहा था कि कोई भलामानुष अपने व्यक्तिगत एलबम के लिए किसी मुच्छाड़ियल पुलिसवाले की फोटो भला क्यों लेना चाहेगा। फिर से अमेरिका का तमगा चमकाना पड़ा। पर जो सवाल उस दरोगा ने किया उसकी उम्मीद बिल्कुल नही थी। उसने पूछा "आप कह रहे हैं कि आप अमेरिका में रहते हैं पर आपकी स्कूटर पर नँबर तो यूपी का है?" मैं सोच रहा था कि पुलिसवालो की भर्ती के पहले जनरलनालेज का टेस्ट नही होता क्या?

    डा. जैन
    एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिये जायें। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा. वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा. जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला "डायरेक्टर साहब अभी जरूरी मीटिंग कर रहे हैं , दो घँटे के बाद आइये।" पता नही इन क्लर्को की आदत होती है यह इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डँडा इस्तेमाल किया जाये। सचिव ने पूछ लिया "कहाँ से आये हैं", मैने जब डलास कहा तो उसने मुझे अँदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएँट्री का बोर्ड सिर्फ स्वदेशियों के लिए ही होता है। डा. जैन अँदर किसी से बात ही कर रहे थे। देखते ही पहचान गये। हजारों विज्ञार्थियों के नाम और शक्ल याद रख सकने की उनकी क्षमता विलक्षण है। कुछ देर तक वे बड़ी आत्मीयता से हालचाल लेते रहे। तभी कुछ सचिव और एक दो प्रोफेसर जिन्हे मैं नहीं जानता था फाईले लिये अँदर आये। मैने चलने की अनुमति चाही तो डा. जैन ने मुझसे बैठे रहने को कहा। बाकी सबको बैठने को कहकर उन्होनें मेरा परिचय सबको यह कहकर दिया कि ये डलास से आये हैं , वही काम करते हैं। मैं अभी यही सोच रहा था कि डा. जैन ने मेरा परिचय एचबीटीआई के पूर्व छात्र के रूप में क्यों नही दिया। तभी डा. जैन मुझसे मुखातिब हुए और एक सवाल दाग दिया "अतुल, यह बताओ कि अगर मेरे पास दस लाख रूपये हो और मुझे एचबीटीआई के कंप्यूटर सेक्शन के लिए कंप्यूटर खरीदने हो तो मुझे दो विकल्पों में क्या चुनना चाहिए, पचास हजार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर या फिर पाँच पाँच लाख के दो एडवाँस वर्कस्टेशन। " मैनें सीधे बेलौस राय जाहिर कर दी "पचास हजार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर लेने चाहिए।" डा. जैन के सामने बैठी मँडली में से कुछ लोग कसमसाये और उनमे कोई कुछ बोलने को हुआ कि तभी डा. जैन ने अगला सवाल दागा "क्यों?" मैं सोच रहा था कि डा. जैन की आखिर मँशा क्या है और यह समिति किस बात की मीटिंग कर रही है। पर चूंकि मैं डा. जैन के भूतपूर्व छात्र की हैसियत से वहाँ गया था इसलिए मैने समग्र जवाब देना उचित समझा। मैने कहा "सर, अगर कोई मशीन या पुल डिजाईन का कोर्स नही चलाना है इनपर तो डेस्कटाप ही ठीक रहेंगे, जिन एप्लीकेशन पर हम काम करते हैं वही यहाँ सिखायी जानी चाहिए, जो अभी भी यहाँ नही हैं और उन एप्लीकेशन के लिए डेस्कटाप की क्षमता काफी है। उससे कम से कम एकबार में चालीस छात्रों का भला होगा। अगर आप दो कंप्यूटर ले लेंगे तो एकबार में ज्यादा से ज्यादा चार लोग ही उसे उपयोग कर सकेंगे। यह वर्कस्टेशन की क्षमता के साथ नाइंसाफी और पैसे की बर्बादी होगी।" डा. जैन ने मुड़कर बाकी लोगो पर कटाक्ष रूपी प्रश्न किया " सुना आपने, यह राय एक अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियर की है, यही राय मै दे रहा था तो आप सब मुझे बेवकूफ समज रहे थे और कह रहे थे कि मैं बाबा आदम के जमाने कि तकनीकी पर भारोसा कर रहा हूँ।" मैने वहाँ वाकयुद्ध छिड़ने से पहले फूटने में भलाई समझी। बाद मे पता चला कि अँदर बैठे लोग कंप्यूटर खरीद समिति के सदस्य थे और उन लोगो में खरीदे जाने वाले कंप्यूटरों की क्षमता को लेकर मतभेद थे। डा. जैन जानते थे कि उनकी व्यवहारिक सलाह को लोग दकियानूसी समझ रहे थे पर जब उसी सलाह पर अमेरिकी स्वीकृती का मुलम्मा चढ गया तो वह काम की बात हो गई।

    पागल कौन?
    रात में मेरे चाचाश्री का फोन आया। वे मिर्जापुर के पास किसी फैक्ट्री में सहायक जनरल मैनेजर हैं। चाचाश्री कानपुर न आ पाने का कारण बता रहे थे। कारण सुन कर सब हँस हँस कर दोहरे हो गये। चाचाश्री की फैक्ट्री में कोई गार्ड था सँतराम। किसी मानसिक परेशानी के चलते उसका दिमाग फिर गया और वह फैक्ट्री में तोड़फोड़ करने लगा। चाचाश्री ने सँतराम को दो चौकीदारो के साथ फैक्ट्री के डाक्टर का सिफारशी पत्र देकर राँची मानसिक चिकित्सालय ले जाकर भर्ती कराने का आदेश दिया। चाचाश्री ने दोनो को निर्देश दिया था कि राँची पहुँच कर वहाँ के डाक्टर से बात करवा दें। अगले रविवार को चाचाश्री को कानपुर आना था। पर न जाने क्यों दोनो चौकीदारो का राँची पहुँच कर कोई फोन नही आया। चाचाश्री दोनो चौकीदारों की गैरजिम्मेदारी को लानते भेजते हुऐ शनिवार को सो गये। रात में बँगले के दरवाजे की घँटी बजी। चाचाश्री ने लाईट खोल कर देखा तो सँतराम खड़ा था। चाची की चीख निकलते निकलते बची। चाचाश्री ने चाची को संयत रहने का ईशारा किया। चाचाश्री ने देखा सँतराम फिलहाल तो सामान्य लग रहा था। उसने चाचाश्री को हाथ जोड़कर नमस्कार भी किया। चाचाश्री ने उसे वहीं बैठने को कहा और खुद यथासंभव दिखने की कोशिश करते हुए उससे दस फुट दूर सोफे पर बैठ गये। अब पागल का क्या भरोसा , कहीं हमला ही कर दे। चाचाश्री सोच रहे थे कि शायद यह उन दोनो चौकीदारों से निगाह बचाकर भाग आया है और वे दोनो चौकीदार या तो इसे ढूड़ रहे होंगे या फिर मारे डर के वापस ही नही आये। उसी उधेड़बुन में चाचाश्री ने सँतराम से पूछा
    चाचाश्रीः कहो सँतराम कैसे हो?
    सँतरामः जी साहब, दया है आपकी।
    चाचाश्रीः अकेले आये हो?
    सँतरामः जी साहब।
    चाचाश्रीः वह दोनो कहाँ हैं?
    सँतरामः कौन साहब?
    चाचाश्रीः अरे दोनो चौकीदार , जो तुम्हारे साथ राँची गये थे?
    सँतरामः साहब, उन दोनो को मैं भर्ती करा आया।
    चाचाश्री कुर्सी से उछलते हुए क्या!
    सँतरामः जी साहब, कल भर्ती कराया था, अगली ट्रेन पकड़ कर मैं ड्यूटी पर टैम से वापस आ गया।
    चाचाश्री ने सँतराम को चाय पिलाने के लिए इँतजार करने को कहकर दूसरे कमरे में फोन करने आ गये। चाची सँतराम पर निगाह रखे थीं। सँतराम बिल्कुल सामान्य दिख रहा था। चाचाश्री ने राँची मानसिक चिकित्सालय फोन मिलाया तो सुपरवाईजर ने बताया कि उनकी फैक्ट्री से एक चौकीदार दो पागलों को भर्ती करा गया है। भर्ती के दिन से दोनो ने बवाल मचा रखा है और रह रह कर दोनो आसमान सर पर उठा लेते हैं। चाचाश्री ने सुपरवाईजर को बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाया कि उसने पागल को छोड़कर दो भलेमानुषों को भर्ती कर लिया है। चाचाश्री ने अबकी बार छः चौकीदारो को सँतराम के साथ राँची भेजा। इस बार सँतराम को भर्ती कराने में कोई बखेड़ा नही हुआ। पिछली बार गये दोनो चौकीदार वापस आते ही चाचाश्री के पैरो में लौटकर रोने लगे और दुहाई माँगने लगे कि आगे से उन्हे किसी पागल के साथ न भेजे। दोनो ने राँची की कहानी सुनायी। दोनो चौकीदारों के साथ सँतराम बिल्कुल मोम के पुतले की तरह शाँत बैठे बैठै राँची तक गया। दोनों ने उसे रिक्शे के बीच बैठाल कर स्टेशन से मानसिक चिकित्सालय ले जाने लगे। मानसिक चिकित्सालय का गेट पास आते ही सँतराम रिक्शे से कूदकर भागा और चिकित्सालय के अँदर घुस गया। उसे जो भी पहला डाक्टर दिखा उसके पैर पकड़ कर वह जोर जोर से रोने लगा। उसने चिल्ला चिल्ला कर कर कहा कि उसे दो पागलों ने घेर लिया है और उसे बाहर बहुत मार रहे हैं। यह सुनकर डाक्टर ने चार वार्ड ब्वाय बाहर भेजे जहाँ वाकई दोनो चौकीदार चिकित्सालय की ओर बदहवास से भागे आ रहे थे। वार्डब्वायज यही समझे कि दोनो वाकई पागल हैं और सँतराम को ढूड़ रहे हैं। दोनो चौकीदारों को जब्रदस्ती हवा में टाँग के डाक्टर के सामने लाया गया। दोनो खुद को छुड़ाने के लिए गुल गपाड़ा मचाये थे और सँतराम को पागल बता रहे थे। डाक्टर ने उन्हे डपट कर कहा कि हर पागल खुद को समझदार और दूसरों को पागल कहता है। यह सुनकर चौकीदार वार्डब्वायज को पागल बताने लगे। दोनो को बाँधने के लिए वार्डब्वायज को उन्हे थोड़ा बहुत पीटना भी पड़ा। ज्यादा हँगामा करने पर उन्हें बेहोशी के इंजेक्शन ठोंक दिये गये। सँतराम जी तो उन्हे शान से भर्ती कराकर मिर्जापुर चल दिये, पर वार्डब्वायज की पिटाई से उन बेचारे चौकीदारों के शरीर के सारे जोड़ खुल गये।

    August 24, 2005

    अध्याय ८: साला मैं तो साहब बन गया!

    एनआरआई होने का अहसास
    पूरे डेढ साल बाद भारत भ्रमण पर जाने का अवसर मिला। डलास में पहले श्रीमती जी और चारूलता पूरे तीन महीने की छुट्टी पर निकल गयीं। मुझे बाद में तीन हफ्ते के लिए जाना था। डलास से ब्रसेल्स और ज्युरिख होते हुए दिल्ली पहुँचना था। आमतौर पर यूरोप में फ्लाईट सबेरे के समय पहुँचती है और पूरा यूरोप हरियाली होने की वजह से गोल्फ के मैदान सरीखा दिखता है। भारत आते आते रात हो गयी थी। पर इस्लामाबाद के ऊपर से उड़ते हुए पूरा समय आँखो में ही बीत गया, दिल्ली का आसमान ढूढते ढूढते। रात एक बजे प्लेन ने दिल्ली की जमीन छुई तो प्लेन के अँदर सारे बच्चो ने करतल ध्वनि की। प्लेन में मौजूद विदेशी हमारा देशप्रेम देखकर अभिभूत थे, साथ ही यह देखखर भी कि किस तरह हम सब प्लेन से टर्मिनल पर आते ही अपनी भारत माँ की धरती को मत्थे से लगाकर खुश हो रहे थे। कुछेक लोग जो वर्षो बाद लौटे थे , हर्षातिरेक में धरती पर दंडवत लोट गये।

    हम नही सुधरेंगे
    हलाँकि थोड़ी ही देर में सारा हर्ष गर्म मक्खन की तरह पिघल कर उड़ गया जब कन्वेयर बेल्ट पर अपना सामान नदारद मिला। पता चला कि ब्रसेल्स और ज्युरिख के बीच एयरलाईन वाले सामान जल्दी मे नही चढा पाये अतः अगली उड़ान में भेजेंगे। उन लोगो ने मेरा सामान निकटतम एयरपोर्ट यानि कि लखनऊ भेजने का वायदा किया। अब मैं हाथ में इकलौता केबिन बैग लेकर ग्रीन चैनल की ओर बड़ा जहाँ कस्टम आफिसर्स से पाला पड़ा। मेरे बैग में एक अदद सस्ता सा कार्डलेस और मेरे कपड़े थे। कस्टम अफिसर को वह दस डालर वाला फोन कम से कम सौ डालर का मालुम हो रहा था। मुफ्त में उसे ९०० और २.४ के फोन का अँतर समझाना पड़ा। हलाँकि आजकल कस्टम वाले ज्यादा तँग नही करते , शायद उपर से सख्ती है या फिर अब विदेशी सामान का ज्यादा क्रेज नही रहा। पर वर्ष २००० में स्थिति बहुत अच्छी नही थी। मेरे एक मित्र श्रीमान वेदमूर्ति जिन्हे अक्सर काम के सिलसिले में भारत जाना पड़ता था, इन कस्टम वालो की चेकिंग से आजिज आकर किसी खड़ूस कस्टम क्लर्क को अच्छा सबक सिखा आये थे। जनाब ने किसी चाईनाटाउन से ऐसा सरदर्द वाले बाम की डिब्बियाँ खरीदी थी जिनपर अँग्रेजी मे कुछ न लिखा था, इन डिब्बियों को जनाब वेदमूर्ती ने वियाग्रा जेली बताकर इँदिरा गाँधी हवाईअड्डे पर कस्टम क्लर्क को टिका दिया था। अब आगे क्या हुआ, यह जानने से बचने के लिए जनाब वेदमूर्ती यथासँभव इँदिरा गाँधी हवाईअड्डे पर जाने से कतराते हैं।

    इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है?
    दिल्ली से कानपुर का सफर शताब्दी पर कट गया। सुना है कि दूसरे कि दाल में घी हमेशा ज्यादा दिखता है। यही कहावत आज खुद पर चरितार्थ हो रही थी। पहले रास्ते में पड़े गाँव कस्बे जिनको महज डेढ साल पहले ट्रेन से देखने लायक नही समझता था और सिर्फ सफर का अनचाहा हिस्सा लगते थे, आज बेहतरीन लैंडस्केप का नमूना लग रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली रेल क्रासिंग पर ट्रैक्टर, मोटरसाईकिल और साईकिल पर सवार लोग, लगता था कि बिल्कुल बेतकल्लुफ और हमारी तेजरफ्ता जिंदगी के मुकाबले कितने बेफिक्र हैं। मेरी इस राय से मेरे साथ चल रहे मेरे साले साहब यानि कि राजू भाई भी इत्तेफाक रखते हैं। मजे कि बात है कि राजू भाई को कानपुर की जिंदगी तेजरफ्ता लग रही है। अपने अपने पैमाने हैं, पर साफ दिख रहा है कि सारे भौतिक सुख बटोर लेने की चाहत ने हमारे कानपुर,लखनऊ सरीखे शहरों में भी अद्श्य एचओवीलेन पैदा कर दी हैं। शेरो शायरी का कोई खास शौक तो नही मुझे पर एक गजल का टुकड़ा याद आता है "इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है?"

    ओमनी वैन
    कानपुर सेंट्रल पर पूरा परिवार अगवानी करने आ गया था। हमारे चाचाश्री किसी मित्र की मारूति ओमनी वैन मय ड्राईवर के ले आये थे। आखिर भतीजा अमेरिका से आ रहा है, मजाल है कि आटो या रिक्शे पर चला जाये। पिछलि दो सीटो पर जहाँ अमेरिका में महज पाँच लोग बैठते हैं, यहाँ आठ दस लोग बैठ गये थे। मैं ड्राईवर के बगल में बैठा तो बगल के दरवाजे से चाचाश्री प्रविष्ट हुए यह कहते हु कि "जरा खिसको गुरू।" खिसकने के लिए गियर के दोनो तरफ पैर डालने पड़े। अब दाँयि तरफ से ड्राइवर साहब गुजारिश कर रहे थे कि भाईजान जरा गियर लगाना है, पैर खिसका लिजीये। उधर सामने सड़क पर गाय,भैंसे और साईकिलें, मालुम पड़ रहा था कि विंडस्क्रीन से चिपके हुए चल रहे हैं और कहीं गाड़ी से लड़ न जाये। ऐसा नही था कि मैं इन चीजो का आदी नही हूँ, अरे भाई पूरे दस साल मैने भी साइकिल, टीवीएस चैंप और एलएमएल वेस्पा इन्ही सड़को पर चलायी है और ऐसी चलाई है कि जान अब्राहम भी नही चला सकता । पर महज एक साल के अमेरिका प्रवास ने आदत बिगाड़ दी है। अपनी ही सड़क पर हल्की सी दहशत मालुम हो रही है। सिर्फ एक समझदारी की मैनें, कि वैन में यातायात पर कुछ नही बोला नही तो पिछली सीट पर बैठे भाई,बहनों की टीकाटिप्पणियों की बौछार कुछ यूँ आती।

    • एक ही साल में रँग बदल गया।
    • रँगबाजी न झाड़ो।
    • जनाब एनआरआई हो गये हैं।
    • यह अटलाँटा नही कानपुर है प्यारे।
    • कनपुरिये तो अटलाँटा में कार दौड़ा सकते हैं लेकिन किसी अमेरिकी की हिम्मत है जो कानपुरिया ट्रैफिक के आगे टिक सके?


    सुना है तेरी महफिल में
    एक पुराना गाना याद आता है जो कुछ यूँ है
    साकिया आज कि रात नींद नही आयेगी
    सुना है तेरी महफिल में रतजगा है।
    पूरे ३६ घँटो का सफर कट गया। पर रात में जैट लैग शुरू हो गया। इस बला से लंबी हवाई यात्रा कर चुके लोग वाकिफ है। दरअसल अमेरिका से भारत आते हुए आप समय की कई स्थानीय सीमाऐं लाँघ कर आते हैं। अमूमन अगर आप अमेरिका से शाम को चलते हैं जब भारत में स्थानीय समय के हिसाब से सुबह होती है। भारत का समय आम तौर पर अमेरिका से ११ घँटे आगे चलता है। इसिलिए शुरू में कई रिश्तेदार जो इस अलबेले समय के झमेले से नावाकिफ थे, फोन करने पर हैरान होते थे कि उनके सोने जाने के समय मैं सवेरे की चाय कैसे पी रहा हूँ? जब आप दिल्ली पहुँचते है तो आपका शरीर उस ११ घँटे की समय सीमा को तुरँत नहीं लाँघ पाता। उसे भारत के दिन में रात महसूस होती है। इसिलिए रात के दो तीन बजे नींद खुल जाती है और दोपहर में आदमी सुस्ती महसूस करता है। हलाँकि कुछ लोग इसे एनआरआई लटके झटके समझ लेते हैं।

    आप लाईन में क्यूँ लगे?
    दो दिन बाद बैंक गया। सबेरे नौ बजे बैंक तो खुल गया था पर झाड़ू लग रही थी, सारे कर्मचारि नदारद। एक अदद चपरासी मौजूद था जिसने सलाह दी कि दस ग्यारह बजे आईये। यहाँ सब आराम से आते हैं। अब तक स्मृति के बँद किवाड़ खुलने लगे थे और जेट लैग तो क्या सांस्कृतिक लैग, व्यवहारिक लैग सब काफूर हो चले थे। दो घँटे के बाद वापस लौटा तो पूरे अस्सी आदमी लाइन में लगे थे। मैं भी लग गया। थोड़ी देर में बैंक का चपरासी पहचान गया। दरअसल इसी शाखा में मेरे एक चाचाश्री मैनेजर रह चुके थे, अब उनका ट्राँसफर हो गया था। पर उनकी तैनाती के दिनो में यही चपरासी घर पर बैंक की चाभी लेने आता था। चपरासी का नाम भी याद आ गया शँभू। शँभू जोर से चिल्लाया अरे भईया आप यहाँ? कहाँ थे इतने दिन ? शँभू पंडित को यह तो पता था कि मैं कानपुर से बाहर काम करता हूँ पर उसके "बाहर" की परिधि शायद हद से हद दिल्ली तक थी। मैने भी अनावश्यक अमेरिका प्रवास का बखान उचित नही समझा और उसे टालने के लिए कह दिया कि बाहर काम कर रहा था, इसलिए अब कानपुर कम आता हूँ। पर शँभू पँडित हत्थे से उखड़ गये। लगे नसीहत देने "अरे भईया, कोई इतनी दूर भी नही गये हो कि दोस्तों के जनेऊ शादी में न आ सको। अरे दिल्ली बँबई का किराया भी ज्यादा नही है।" अब शँभू पँडित खाँमखा फटे मे टाँग अड़ा रहे थे। उनको रँज था कि मैं अपने कुछ दोस्तो की शादी वगैरह में कानपुर नही पहुँचा था। शँभू पँडित के इस तरह से उलाहना से बड़ी विकट स्थिति हो रही थी। भँडाफोड़ करना ही पड़ा , शँभू पँडित को जवाब उछाला "अबे, अमेरिका मे था, अब यहाँ हर महीने थोड़े ही आ सकता हूँ?" इतना बोलना था कि आस पास खड़े लोग मुड़कर देखने लगे और पहचानने की कोशिश करने लगे। यहाँ तक की बैंक मैनेजर के केबिन से आवाज आयी "अबे शँभू कौन है ? किससे बाते कर रहे हो?" शँभू पँडित को यह जोर का झटका धीरे से लगा था, सकपका कर बोले "साहेब, अरोरा साहब के भतीजे हैं, अमेरिका में रहते हैं।" केबिन से फिर आवाज आयी "अबे तो उन्हे बाहर क्यों खड़ा कर रखा है।" एक मिनट के अँदर ही मैं मैनेजर साहब से मुखातिब था। मैनेजर साहब ने क्लर्क को केबिन में बुलाकर मेरे काम करवा दिया और अमेरिका के बारे में अपनी कुछ भ्रांतियों का निराकरन करवाया। मेरा काम तो हो गया था पर मैं सोच रहा था कि वह अस्सी लोग जो लाईन में खड़े थे उन्हे क्या मैनेजर साहब बेवकूफ समझते थे जिनके ऊपर किसी भी नेता,अभिनेता,वीआईपी या एनआरआई को तवज्जो दी जा सकती है और वे उफ्फ तक नही करते।

    July 05, 2005

    अध्याय ७: छुट्टी के रँग, केडी गुरू के सँग! !

    पामहैंड टर्न
    अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस ४ जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती है सारे जहाँ से अच्छा की स्वर लहरियाँ, रँग बिरंगी झँडिया, स्कूल में बँटने वाले बूँदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गाँधी ने कितनी बार "हम देख रहे हैं" या "हम देखेंगे" कहा। यहाँ माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह जगह स्टार और स्ट्राईप्स यानि की अमेरिकी झँडा तो दिखता है पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिख सकता है। पूरी आजादी है आपको अमेरिकी झँडा लगाने की। और तो और लोग स्टार और स्ट्राईप्स वाली टीशर्ट बनियान तक भी पहन डालते हैं। चारो ओर सेल के नजारे। हाँ शाम को तकरीबन हर शहर में सँगीत समारोह , खाना पीना और अँत में धुँआधार आतिशबाजी जरूर होती है। वैसे इस अवसर पर होने वाली तीन दिन की छुट्टी का देशी बिरादरी जम कर सदुपयोग करती है। यह निर्भर करता है आपके प्रवास के अनुभव पर। हमारे सरीखे नये नवेले अप्रवासी पूरे तीन दिन पयर्टन पर खर्च कर डालते हैं। अक्सर मित्रो के साथ भ्रमण रोमांच को दुगुना कर देता है। डलास में चार जुलाई को रूबी फाल यानि कि जल प्रपात देखने का कार्यक्रम निर्धारित हुआ। केडी गुरू साथ चल रहे थे। केडी गुरू हमारे कालेज के जमाने के कनपुरिया मित्र हैं। खासे जिंदादिल और शौकीन तबियत के ईंसान। हलाँकि स्वभाव के मामले में थोड़े प्रेशर कुकर हैं, यानि कि सँयम बहुत जल्दी खो देते हैं पर जल्द ठंडे हो जाते हैं। तो जनाब डलास से हम और केडी गुरू एकसाथ चले टेनेसी के चैटेनोगा की और। रास्ते में मैने ध्यान दिया कि केडी गुरू ड्राईव करते हुए कुछ कुछ कनपुरिया टैंपो वालो की भाँति खुली हथेली स्टेयरिंग पर चिपका कर गाड़ी मोड़ रहे थे और लेन चेंज करते वक्त कँधे को मिथुन चक्रवर्ती की तरह झटका देते थे। यह प्रक्रिया अनवरत चलने पर मैने अपने कौतुहूल को रोकना उचित नही समझा। पता चला कि केडी गुरू ने भारत में अपने ड्राईवर से कार चलाना सीखा था और यह दो गुर बोनस में सीख लिए थे। मुझे मच्छिका स्थाने मच्छिका वाला किस्सा याद आ रहा था जिसमें एक नकलची अपने से आगे वाले परीक्षार्थी की कापी लाईन दर लाईन टीप रहा था और एक जगह आगे वाले की कापी में मरी मक्खी चिपकी दिखने पर एक मक्खी मार कर अपनी कापी में ठीक उसी जगह चिपका देता है।वैसे केडीगुरू के इस खानदानी ड्राइवर ने उन्हे ईंदिरा गाँधी एयरपोर्ट पर मासूमियत मे यह वादा कर दिया था कि वह उनसे मिलने अमेरिका ड्राईव करके जरूर आयेगा, क्योंकि वह हवाईजहाज का टिकट अफोर्ड नही कर सकता था और उसे लगता था कि पँद्रहबीस दिन लगातार चलाने पर अमेरिका पहुँचा जा सकता है। केडीगुरू के फटकारने पर कि अमेरिका सात समुँदर पार है, बेचारा मायूस जरूर हुआ पर निराश कतई नही। सुना गया है कि उसे यकीन है कि केडीगुरू को अमेरिका के सारे रास्ते नहीं मालुम, ईसलिए आजकल वह अमेरिका का बाईरोड रास्ता ढूँड़ने मे लगा है।

    पढे लिखे भी झाड़ू लगाते हैं
    केडीगुरू ने मजेदार आपबीती सुनायी। केडीगुरू आफिस से घर का रास्ता लोकल ट्रेन से तय करते हैं। एक दिन स्टेशन जाते समय केडीगुरू फुटपाथ पर चल रहे थे। कुछ सोचते सोचते केडीगुरू का सूक्ष्म शरीर चाँदनी चौक पहुँच गया और स्थूल शरीर टेनेसी के फुटपाथ पर चलता रहा। रास्ते में एक भीमकाय अश्वेत झाड़ू लगा रहा था और अमेरिकन सभ्यतानुसार केडीगुरू से "हाई मैन, हाऊ यू डूईंग" बोला। केडी गुरू बेखुदी में सोचने लगे कि क्या जमाना आ गया है जो पढे लिखे अँग्रेजी दाँ लोगो को भी झाड़ू लगानी पड़ रही है। केडीगुरू उसके हालत पर अफसोस प्रकट कर सरकार को कोसने जा ही रहे थे कि उन्हे ख्याल आया कि वे चाँदनी चौक में नही अमेरिका में हैं जहाँ अनपढ भी अँग्रेजी ही बोलते हैं।

    रूबी फाल
    एक प्राकृतिक करिश्मा है यह मनोरम स्थल। पहले आपको एक पहाड़ी पर स्थित आगंतुक कक्ष में स्थित लिफ्ट से २६० फुट नीचे एक गुफा में जाना होता है। फिर करीब एक मील इस भूमिगत गुफा में चलना होता है। हजारो सालो में पानी के कटाव ने चूने के पत्थरो मे नयनाभिराम आकृतियाँ उकेर दी हैं। केडी गुरू और मेरा मानना था कि अगर यह स्थल भारत मे होता तो शर्तिया हर कदम पर एक चट्टान के पास एक एक पंडा दक्षिणा वसूल रहा होता उनको शिवलिंग या संतोषी माता का स्वरूप बताते हुए। गुफा के अँत में घुप अँधेरा था। नेपथ्य में मधुर संगीत के साथ पानी की आवाज विस्मय पैदा कर रही थी। गाईड ने जब बत्तियाँ जलायी तो सामने १४५ फुट की ऊँचाई से गिरता रूबी जल प्रपात दिखता है।

    भईये एँकर तो पानी में फेंक दो!
    चैटेनोगा मे एक झील में हम लोगो को चप्पू वाली नौका चलाने की सूझी। अमेरिकियो ने व्यवसायिकता की हद कर रखी है, टिकट के साथ ईश्योरेंस भी बेच रहे थे। खैर एक नौका पर केडी गुरू सपत्नीक लपक लिये। मैं दूसरी नाव की किनारे बाट जोह रहा था कि देखा केडी गुरू की नाव चकरघिन्नी की तरह सिर्फ गोल ही घूम रही है और केडी गुरू नाव की इस बेजा हरकत पर लालपीले हो रहे हैं। उनकी पत्नी उन्हे समझाने का प्रयत्न कर रही थी कि शायद नाव चलाने में कोई बेसिक गलती हो रही है पर केडी गुरू को नाव में कोई निर्माणगत खामी नजर आ रही थी। पँद्रह मिनट बीत जाने पर केडीगुरू ने झल्लाकर अपने हाथवाला चप्पू ही पानी में फेंक दिया। यह देखकर उनकी पत्नी सन्न रह गयीं। तभी मेरे बगल मे खड़े एक भारतीय सज्जन ने कहा "अपने दोस्त को बोलो, वह नाव का एँकर पानी में क्यो नही फेंकता?" इसके बाद केडीगुरू की खिसियानी हँसी,नाव में रखे मस्तूल (anchor) को पानी में डालना, उनकी पत्नी के सैंडिल का चप्पू के स्थान पर उपयोग करके नाव को किनारे तक लाना, दूसरा चप्पू लेना और फिर रास्ते भर उनकी प्रताड़ना अब इतिहास बन चुका है।

    कैपेचीनो या एसप्रेसो?
    वापस आते वक्त चाय की तलब लगी थी। पर यहाँ अगर हर एक्जिट रैंप पर चाय का ढाबा और पान की दुकान होती तो क्या बात होती। कुछ ऐसा नजारा होता कि एक्जिट रैंप पर कारो की कतारे होती और पप्पू गप्पू कुल्हड़ मे चाय परोस कर कारवालो की खिड़कियो तक पहुँचा रहे होते। लगता है यह सब होते होते पचासेक साल लग जायेंगे। खैर स्टारबक्स से काम चलाने की मजबूरी थी। यह शायद हमारा पहला तजुर्बा था स्टारबक्स में काफी पीने का। कम से कम पचास तरह की काफी के प्रकार उपलब्ध थे। कैपेचीनो , एक्प्रेसो,मोचा ,लैटे आदि आदि की भूलभुलैया में हमे अपनी झागवाली दूधिया काफी याद आ रही थी। केडीगुरू ने कुछ नया ट्राई करने के चक्कर में कैपेचीनो आर्डर कर दी। काउँटर से सवाल दागा गया वन शाट या टू शाट। अब यह जुमला तो मयखाने में ज्यादा चलता है। केडीगुरू गच्चा खा गये और बोले टूशाट। हाथ में लगा एक बित्ते भर का गिलास जिसमें दो छँटाक काफी सरीखा काढा परोसा गया था। बहुत देर मगजमारी के बाद समझ आया कि उसमे दूध इत्यादि खुद ही दूसरे काउँटर पर मिलाना था। बरहहाल काफी आनँद लेने के बाद हम वापस घर को चल दिये। हलाँकि केडीगुरू के टूशाट ने दो घँटे बाद असर दिखाया और उन्हें पेचिश लग गयी।

    अति(व्यवस्था) के झटके
    रात में हम होटल आकर रूके और दो कमरों मे ठहर गये। खाने के लिए मैं और केडीगुरू सामने के पीजा रेस्टोरेंट आर्डर करने गये। रेस्टोरेंट का दरवाजा बँद था और बाहर खड़े दो कर्मचारी धूम्रपान में मशगूल थे। उन्होने पीजा का आर्डर लेने से ईंकार कर दिया। उनका दिया तर्क अतिव्यवस्था के दुष्परिणाम दिखा रहा था। रेस्टोरेंट की व्यवस्था के अनुसार एक बार काऊँटर बँद हो जाने के बाद वो सिर्फ फोन पर ही आर्डर ले सकते थे, यानि कोई जुगाड़ वाली व्यवस्था नहीं। केडीगुरू दाँत पीसते हुए वापस आये और अपने कमरे से दो पीजा का आर्डर देकर पेचिशनिवारण हेतु बाथरूम में घुस गये। उनकी पत्नी हमारे कमरे में आकर मेरी पत्नी से बात करने लगीं। दो मिनट बाद देखा कि एक पीजा डिलीवरीवाला केडीगुरू के कमरे का दरवाजा पीट रहा है। बाहर आकर उससे पीजा माँगा तो अगला शगूफा हाजिर था। पीजावाला हमारे पैसे देने पर और केडीगुरू के पत्नी के यह दिलासा देने पर भी कि आर्डर देने वाला उनका पति है उन्हें पिजा देने को तैयार नही था। उनकी पालिसी थी कि आर्डर उसी कमरे में सप्लाई होगा जहाँ के फोन से आर्डर बुक किया गया है। हमारे सामने पीजावाले को दरवाजा पीटते हुऐ टापते रहने के अलावा कोई चारा नही था। दो मिनट बाद केडीगुरू तौलिया लपेटे आग्नेयनेत्रो से हमें घूरते प्रकट हुए। पीजावाले की व्यवसायिक मजबूरी जानने के बाद उनके पास मस्तक ठोंकने के अलावा कोई चारा नही था।

    वह खिड़की जो बँद रहती है
    नैशविले से वापस आते हुए बड़ा संगीन काँड हो गया। अँधेरा छा गया था और डलास आने में करीब दो घँटे बाकी थे। रास्ते में हमने रात्रिभोज करने के लिए एक कस्बे मे कार रोकी। एक चाईनीज रेस्टोरेंट में खाने का आर्डर दिया कि तभी मेरी चारूचँद्र को फ्रेंचफ्राई खाने की हट सवार हो गयी। केडीगुरू स्नहेवश खुद ही सड़क के दूसरी तरफ बने मैकडोनाल्ड में पैदल ही फ्रेंचफ्राई लेने चल दिये। करीब पँद्रह मिनट बाद केडीगुरू एक पुलिस आफिसर के साथ नमूदार हुए जो यह तसल्ली करना चाहता था कि उनके साथ और कौन हैं? हमें देखने के बाद पुलिसवाला खिसियानी हँसी हँसने लगा और केडीगुरू भुनभुनाने लगे। दरअसल बदकिस्मती से मैकडोनाल्ड का रेस्टोरेंट बँद हो गया था सिर्फ ड्राईवईन खुला था। ड्राईवईन वह खिड़की है जो रेस्टोरेंट के अँदर जाये बिना आप कार में बैठे बैठे खाने का सामान का आर्डर दे सकते हैं और भुगतान करके अपना सामान ले सकते हैं। केडीगुरू उस खिड़की पर पैदल पहुँच गये और उनकी खिड़की के काँच पर उँगली से ठक-ठक करके खिड़की खुलवाने का आग्रह करने लगे। कमअक्ल रेस्टोरेंट वालो ने शायद पहलीबार Drive-in खिड़की पर Walk-in ग्राहक देखकर उन्हें कोई चोरउचक्का समझ लिया और पुलिस बुला ली थी।

    June 06, 2005

    अध्याय ६: वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट

    मूविंग
    एक दिन सुबह सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी| सीधी सादी भाषा मे मतलब यह था कि उन्हे अब मेरी जरूरत नही थी और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया| जैसा कि पहले भी बता चुका हूँ कि तेजी से बदलती तकनीकि वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दोचार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है| इन सबके साथ जुड़ी है मूविंग की चिर समस्या यानी कि नये प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान का और कार का स्थानांतरण, फिर घर का पता,टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नये स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद| खैर बेंच पर आने के बाद का पहला सोमवार था| मार्च की गुगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं कुछ नया तकनीकी मसला पड़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी| यह मामू का फोन था| यह मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगामरो ने बिचौलियो के लिए इजाद कर रखा है| पता चला कि दो घंटे मे कोई जनाब ईंटरव्यू के लिए काल करेगे। काल आई और सिर्फ यह पूछने के बाद कि मैने कौन कौन सी विधाओ मे काम कर रखा है, डलास निवासी साक्षात्कारकर्ता ने निमंत्रण भेज दिया कि भाई आ जाओ डलास मे बसने।
    डलास यानि कि वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट
    अटलांटा से डलास कार यात्रा की ठानी थी| डलास अटलांटा से ८०० मील यानि कि करीब १३०० कि.मी. दूर है| पर रास्ता एकदम सीधा, एक हाईवे अटलांटा से शुरू होकर सीधे डलास पहुँचता है| हिंदुस्तान में मात्र दो दिन में १०५-१३० कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से १३०० कि.मी. का सफर कार में तय करने के बारे स्वपन में भी नही सोचा था| थोड़ी-थोड़ी दूर पर रेस्टोरेंट, रेस्टएरिया,गैसस्टेशन वगैरह होने और उत्तमकोटि की सड़क ने सफर को कष्टरहित बना दिया| जार्जिया से एलाबामा, मिसौरी एवं लुसियाना होते हुए टेक्सास में दाखिल हुए| पूरा रास्ता दो लेन का था| सफर मस्ती से कटता रहा| टेक्सास में दाखिल होते ही प्रांत के स्वागत पट्ट ने टेक्सास के अक्खड़पन से रूबरू कराया| जहाँ सारे प्रांत के स्वागत व॓लकम टु स्टेट से शुरू होते है वही टेक्सास की बानगी देखिए "Don't mess with Texas" | जहाँ तक नजर जा सकती है खेत दिखते हैं, कहीं कहीं काऊब्वाय घोड़े पर सवार गाय भैंसों को घेरे में इकठ्ठा कर रहे थे| अमेरिका में सर्वाधिक क्षेत्रफल मे बसा टेक्सास। जहाँ तक नजर जा सकती है, सपाट जमीन दिखती है। मैं हाइवे पर बने स्वागत कक्ष में रूका| सड़क मार्ग के आगंतुकों के लिए सभी प्रांतो में स्वागत सेंटर बने है| मुफ्त नक्शे, होटल व रेस्टोरेंट की तालिका एवं सभी पयर्टन स्थलों की सचित्र जानकारी| सहायता के लिए कुछ कर्मचारी | स्वागत सेंटर के कर्मचारियों ने मुझे डलास तक का रास्ता समझा दिया| कुछ ही घंटो के बाद अपनी नयी मंजिल डलास डाउनटाउन की खूबसूरत स्काईलाइन दूर से दिखने लगी| अमेरिका में गगनचुँबी ईमारतो का झुँड स्काईलाईन के नाम से जाना जाता है और किसी शहर की समृद्धि का परिचायक है, हलाँकि हम इसे कंक्रीट का जँगल के नाम से भी जानते हैं। फिर ६ लेन वाले हाइवे से सामना हुआ और कुछ ही देर में मै अपने होटल में था| रिसेप्शन कर्मचारी ने बताया कोई रवि आपके बगल वाले कमरे में आपका इंतजार कर रहे हैं| मैं सोच रहा था डलास मे मैं भला किस रवि को जानता हूँ? कमरा खुलवाने पर दारजी रविंदर भाई निकले| दारजी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली से आकाशवाणी को तलाक देकर आये थे|
    पंजाबी पुत्तर दि ग्रेट
    होटल में एकाध घंटे बाद याद आया कि पीजी भाई ने किसी ब्रिज का फिन नंबर दिया था| फोन करने के आधे घंटे के बाद ही ब्रज मोहन जी रात्रिभोज के निमंत्रण के साथ हाजिर थे| ऐसी जिंदादिली कम ही भारतीयों में देखने को मिलती है| ब्रिज भाई के साथ डलास में रंग जम गया या फिर उन्हीं की भाषा में नजारा आ गया| ब्रिज और दार जी दोनों तंदूरी चिकन के शौकीन थे और होटल में गुलाबी तंदूरी चिकन के साथ दोनों की मीठी पंजाबी बातें जो ईमानदारी से मेरे सिर्फ ५० प्रतिशत ही पल्ले पड़ती थी कानों को बड़ी भाती थी | ब्रिज के पास माजदा कार थी दमदार ईंजन वाली| माजदा के डैशबोर्ड पर ब्रिज ने शंकर जी की मूर्ती स्थापित कर रखी थी | ब्रिज भाई ड्राईवर तो उम्दा किस्म के थे पर जब कभी तरन्नुम में गाड़ी चलाते तो खता कर बैठते, अमेरिकी सड़को पर गलती अक्सर मँहगी ही पड़ती है ‌ ब्रिज भाई जब भी ऐसी किसी स्थिती से दोचार होने से बचते तो तुरंत शंकर जी के चरण स्पर्श करके कहते कि आज तो परमपिता परमात्मा ने बचा लिया | शंकर जी भी सोचते होंगे कि भक्त ने एक तो गाड़ी में उल्टा मुँह कर के बैठाला है, अक्सर तेज कार चलाता है और हर उलजलूल गलती से बचाने का ठेका भी मुझे ही दे रखा है| एक बार तो शंकर जी ने बहुत बचाया वरना हम दोनो को बड़े बेभाव की पड़ती | मैं और ब्रिज एक साथ उसकी कार में जा रहे थे| ब्रिज भाई मस्त मूड में थे| बोले कि महाराज, मुझे यहाँ रहते तीन साल हो गये अब तो रास्ते ईतने याद हो गये हैं कि आँख मूँद कर भी मंजिल तक पहुँचा सकता हूँ | यह कहते हुए ब्रिज भाई एक लेन में मुड़े| हम दोनों यह देख कर भौंचक्के रह गये कि एक कार तेजी से हमारी ही लेन में आ रही हैं| ब्रिज भाई ने हार्न मारा तो वह कारचालक उल्टे चोर कि तरह हम कोतवालों को डाँटते यानि कि हार्न मारते हुए चला गया | पर यह क्या अब तो दोनों लेन में कारे अपनी ही दिशा में आ रही थीं | ब्रिज भाई बोले महाराज आज क्या पूरे शहर ने पी रखी है| अब तक मुझे माजरा समझ में आ गया था, गफलत में हम एक एक्जिट रैंप में उल्टी दिशा में जा घुसे थे| अब हम दोनो को काटो तो खून नही कि अब गाड़ी को यूटर्न कैसे लगायें जब दोनो ही लेन में गाड़िया अपनी तरफ मरखने बैल के मानिंद दौड़ती हुई आ रही हैं| मैंने ब्रिज भाई को हार्न बजाते रहने को बोला ताकि दूसरी दिशा वाले सावधान रहें कि हम गलत दिशा में खड़े हैं| तभी एक पुलिस कार हमारी लेन में आई| हमारी कुछ जान मे जान आई| पुलिस वाले ने आकर पहला सवाल किया कि हम गलत दिशा में कैसे आ गये? ब्रिज भाई ने मासूमियत से जवाब दिया कि हम ईस ईलाके में नये हैं रास्ता भूल कर गलत लेन में आ गये, अब यूटर्न लगाना मुश्किल लग रहा है | पुलिस वाले ने लाईसेंस वगैरह की जाँच पड़ताल के बाद एक और पुलिस वाले की मदद से दोनो लेन बंद कर हमारी कार को यूटर्न में मदद दी और साथ ही भविष्य में सजग रहने की ताकीद भी की | पुलिस वाले ने हमारी और बाकि कारों के हार्न की जवाबी कव्वाली सुन कर और हमारी कार दूर से गलत दिशा में खड़ी देख कर समझा कि कोई शराबी गलत लेन में जा घुसा है, ईसीलिए वह मसला हल करने आ गया था| पर यहाँ मामला अपने ही शहर में नये होने का था|
    पापड़ प्रेमी
    होटल में तीन दिन रूकने के बाद हम नये अपार्टमेंट में गये| सामान पहुँचाते पहुँचाते रात के एक बज गये| अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी| मेरे पार्किंग लाट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी| मैने कुछ देर के लिए एक एक आरक्षित परंतु पड़े खाली पार्किंग लाट हथिया लिया| अपार्टमेंट में सामान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए| सीधे सवाल दागा कि क्या वह कोरोला तुम्हारी है| मैंने जल्दबाजी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लाट किसी ने हथिया रखा है अतः मैंने दूसरे पार्किंग लाट को प्रयोग कर लिया| वृद्ध सज्जन का अगला बाउँसर था "आपका पार्किंग लाट हथिया लिया गया हो तो ईसका यह मतलब नही कि आप भी किसी का पार्किंग लाट हथिया ले| आप गेस्ट लाट प्रयोग कर सकते थे|" जवाब बिल्कुल वाजिब था| चाँदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था| मैंने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लाट प्रयोग किया था, मैं अभी खाली करता हूँ| लेकिन वे भद्रपुरुष कल से ध्यान रखना की हिदायत देते हुए ओझल हो गये| बात आयी गई हो गई। डलास की तेज धूप देखकर मेरी मेमसाहब की बाँछे खिल गयी| पूरे दो साल बाद पापड़ बनाने का स्वर्णिम अवसर जो उनके हाथ लगा था| शाम को आफिस से वापस आया तो डलास की धूप में पके पापड़ चाय के साथ हाजिर थे | एक मजेदार प्रहसन हो गया उसके बाद| मेमसाहब ने बताया कि पापड़ बनाते समय नीचे की मंजिल पर रहने वाला कोई अमरीकी उनका दोस्त बन गया है| अधेड़ उम्र का व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है और भारतीय भोजन का शौकीन है| उसने मेमसाहब को पापड़ बनाते देख कर पूछा होगा कि तुम क्या कर रही हो| मेमसाहब ने उसे पापड़ पुराण सुना दिया| बंदा पापड़ प्रेमी निकला| उसने मेमसाहब को आसपास के सारे भारतीय रेस्टोरेंट के नाम गिना डाले| साथ ही उन्हे यह भी सलाह दे डाली कि चूँकि तुम लोग नये हो अतः मैं तुम्हारे शौहर को आसपास की सभी जरूरी चीजे,पते ठिकाने बता दूँगा| हलाँकि उसने यह भी स्वीकार किया कि भारतीयों को यहाँ अपने सामाजिक कौशल के चलते स्थापित होनें में ज्यादा कष्ट नही उठाना पड़ता| मेमसाहब ने घोषणा की कि छोले भठूरे बने है और मैं उनके "नये दोस्त" को भी कुछ छोले भठूरे दे आऊँ, इसी बहाने किसी काम के आदमी से जान पहचान हो जायेगी| मेरे यह कहने पर कि यहाँ के लोग ज्यादा मेलजोल पसंद नही करते, मेमसाहब ने उसके मिलनसार , एकाकी और अधेड़ होने के दुहाई दे डाली| मैं तब भी अड़ा था कि यहाँ के लोग शायद ही हमारी तरह ताउम्र विवाहित रहते हैं, असुविधा की वजह से बच्चे न पालकर कुत्ते बिल्ली पालते हैं और परिवार की जगह कार और मकान जैसी बेजान चीजों पर ज्यादा समय व ध्यान देते हैं, और ईसी वजह से अकेले रहते रहते खड़ूस हो जाते हैं| पर मेरी संवेदनशील पत्नी अगर किसी का भला करने पर अड़ जाये सारे तर्क कुतर्क व्यर्थ हैं| वह सामाजिकता, संवेदनशीलता और आखिरी में धार्मिक परमार्थ आदि के इतने तर्क प्रस्तुत करेगी कि उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नही बचता| झक मार कर मैं छोले भठूरे की प्लेट लेकर नीचे वाले अपार्टमेंट में गया और घंटी बजायी| अपने इस नये पड़ोसी से मैनें बताया कि मैं उनकी नयी पड़ोसन का पति हूँ और उनके लिए मेरी पत्नी ने छोले भठूरे भेंजे हैं| पड़ोसी ने मुझे अंदर आमंत्रित किया| रोशनी में मेरे दीदार होते ही वे बोले " I know you, we have had a discussion in parking lot. But now forget about it. " जनाब का नाम बाब था और वे फोर्ड कार की डीलरशिप में कार्यरत थे| भारतीय भोजन चटपटा होने की वजह से उन्हें बहुत पसंद था| मुझे उसने एक पेंटिग दिखायी जिसमे विश्व की सभी प्रकार की मिर्ची के चित्र थे| कुल ५६ प्रकार की मिर्ची में वह २० तरह की मिर्ची चख चुका था| बाब पार्किंग लाट वाला मामला जल्द ही भूल गया। उसने मुझे एक और तस्वीर दिखा कर उसमें एक महिला को पहचानने को कहा। यह महिला और कोई नही, बीस तीस अमेरिकी महिलाओ के शिष्टमँडल से घिरी स्वर्गीय श्रीमती ईँदिरा गाँधी की थी। उस शिष्टमँडल में बाब की दादी बी शामिल थी। बाब ने बताया कि वह भारत घूमने जाना चाहता है। उसके पहले वह तैयारी कर रहा और भारत के बारे मे जो कुछ उसे मिला सब पढ चुका था। एक दिन रविवार के सबेरे आवाज लगा कर बुलाने लगा। पता चला जनाब अपने पिछवाड़े बार्बक्यू स्टेक यानि कि भैंसे का माँस पका रहे थे। बोले कि तुम अक्सर भारतीय खाना खिलाते हो आज तुम्हे टेक्सास स्पेशल खिलाता हूँ। यह पता चलने पर कि हम शाकाहारी है, बेचारा बहुत निराश हुआ, पर थोड़ी ही देर मे कही से मैक्सिकन डिश लेकर हाजिर हो गया। कभी कभी ताज्जुब होता है, टेक्सास के बगल मे बसा देश है मेक्सिको, यहाँ के निवासियो के शक्लोसूरत भारतीयो से इस कदर मिलती हैं, कि धोखा हो जाता है। यहाँ तक कि उनका खाना पीना भी बहुत कुछ भारतीयो जैसा होता है।
    जलेबी का जलवा
    एक दिन शाम को आफिस से घर पहुँचा तो श्रीमती जी हाथ पर बरनाल अपनी पड़ोसन से बरनाल लगवा रही थीं| पता चला महिला मंडल में पकवान चर्चा के बीच जलेबी का जिक्र आ गया| सबको एक ही कोफ्त थी कि डलास में सब मिलता है पर किसी को जलेबी नही दिखी| एक दक्षिण भारतीय पड़ोसन तो कभी जलेबी नाम की चीज से रूबरू नही हुई थी| मेरी पाककला में सिद्धहस्त श्रीमती जी मोर्चे पर कूद पड़ी| आखिर कानपुर और जलेबी की प्रतिष्ठा का प्रश्न था| पर आपाधापी में गर्म तेल मैडम के हाथ छलक गया| उनकी प्राथमिक चिकित्सा के बीच मेरा पदार्पण हुआ| फौरन एक वाक् इन क्लीनिक ले गया| डाक्टर ने मरहम पट्टी तो कर दी पर उसे यह चोट कुकिंग में लगी है यह हजम नही हो रहा था| वह शंकित था कि कहीं चोट की वजह मियाँ बीबी में हाथापाई तो नहीं| अब शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी पर बुड़ऊ डाक्टर कुछ देर मे समझ गया कि इस दुर्घटना के पहले हम दोनों में सिर फुट्टवल जैसा कुछ नही हुआ|

    April 22, 2005

    अध्याय ५: अटलाँटा के अलबेले रँग

    उत्तर दक्षिण समागम
    मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राईविंग के द्रोणाचार्य बन गये| एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ| अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला| मंदिर में गणेश, शिव , हनुमान , मुरुगन, भूदेवी , तिरूपति बालाजी सब की प्रतिमा एक साथ एक हाल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ| मैनें अनुपम जी से, जो कि हिंदु स्वंयसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे , से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद-क्षेत्रवाद की समस्या यहाँ नही आयी|, क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता एक साथ सुशोभित हैं| अनुपम भाई ने एक ही क्षण में मुझे यथार्थ के धरातल पर ला पटका| वे बोले मान्यवर ये विशुद्ध अर्थशास्त्र है राष्ट्रप्रेम जैसा कुछ नही है | भाई जब मंदिर बना तो हैदराबादी बिना बालाजी की मूर्ती लगे चंदा नही दे रहे थे, वहीं तमिलनाडु और कर्नाटक वालों को लगता है कि उन्हें सिर्फ मुरुगन , भूदेवी या लक्ष्मी का आशीर्वाद ही फलीभूत होगा और बचे उत्तर भारतीय तो वे अपनी टेंट तभी ढीली करेंगे जब यहाँ हिन्दी में की गई प्रार्थना स्वीकारने वाले हनुमान जी विराजें| वह तो अटलांटा में काफी देशी (भारतीय) हैं वरना चंदा पूरा करने के लिए गुरू ग्रंथ साहिब और भगवान बुद्ध को भी मदिंर का हाल शेयर करना पड़ता| बाद में पता चला कि अटलांटा में जिमखाना क्रिकेट क्लब, तमिल समाज, पंजाबी बिरादरी, जैन सम्मेलन, बंगाली असोसियेशन , सिंधी सभा आदि आदि सारे मंच अपने अपने एजेंडे के साथ विद्यमान हैं| मैं सोच रहा था कि हम भारत से अपनी संस्कृति ही साथ नही लाते अपनी भाषावाद,जातिवाद और क्षेत्रवाद वगैरह की दीवारें भी साथ ले आते हैं| यह सब हमारी मानसिक बेड़ियाँ है जिनसे हमें छुटकारा मिल ही नहीं सकता| वैसे जहाँ एक ओर भाषावाद,जातिवाद और क्षेत्रवाद की बेड़ियाँ दिखी, वहीं एक सुखद अहसास भी हुआ | अमेरिका में भगवान भी एनआरआई नफासत के साथ रहते हैं| एयरकंडीशंड मंदिर, स्वच्छ वातावरण, अनुशासित भक्त| ताज्जुब है कि दीवार पर दिशा निर्देशो का पूरी सजगता से पालन होता है| न कोई फोटोग्राफी कर रहा है, न कोई शिवलिंग पर मत्था रगड़ कर उसे चमका रहा है न ही प्रसाद के लिए मारामारी| सिर्फ एक कमी खलती है, नये मंदिरों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर पुराने मंदिर डाऊनटाउन में बने हैं| अति सीमित पार्किंग के साथ| मंदिर व्यवथापक शुरु में जहाँ आकर बसे वहीं मदिंर ठोंक दिया| भविष्य में भक्त संख्यावृद्धि का ख्याल उनके जहन में कभी नही आया| अब चाहे शहर कितना बड़ जाये पर कई मंदिर व्यवथापक सुविधाविस्तार के मामलें में भारतीय रेल मंत्रालय की तरह सोचते हैं| जहाँ जी चाहे स्टेशन बना दो पब्लिक को सत्तर बार गरज है तो आयेगी ही|

    गोस्वामी जी की आंसरिग मशीन
    आजकल दिल्ली बंबई में तो आंसरिग मशीन आम बात हो गयी है| पर १९९९ में मेरे लिए नयी चीज थी| पर प्रहसन तब होता है जब यह अजूबा किसी छोटे शहर में पहुँच जाये | हमारे गोस्वामी जी भारत यात्रा से लौटकर आये तो सुनाने के लिए उनके पास यही प्रहसन था| बेचारे एक अदद आंसरिग मशीन ले गये अपने मथुरा वाले घर में| उन्होने आसंरिग मशीन को फोन से कनेक्ट करके रख दिया और बाकी परिवार के साथ चाय छत पर जाकर चाय पीने लगे| तभी नीचे से नौकर चिल्लाया कि "भईया, जिज्जा जी ईं भोपूं से कईस चिल्लाय रहे हैं?" सबने नीचे झाँका तो विकट दृश्य था| गोस्वामी जी के पड़ोस के मुहल्ले में रहने वाले जीजा जी ने फोन किया था| फोन चार घँटी बजते ही आँसरिंग मशीन पर ट्रांसफर हो गया| आगे का नजारा खुद गोस्वामी जी के शब्दों में
    आँसरिंग मशीन: श्री कुंदन गोस्वामी जी (गोस्वामी जी के पिताश्री) इस समय ....
    जीजाजी: हल्लो, हल्लो
    आँसरिंग मशीन: ...... या तो व्यस्त हैं या ..
    जीजाजी: अरे कौन बोल रहा है बिरजू (गोस्वामी जी का घरेलू नाम)?
    आँसरिंग मशीन: ... या घर में नहीं हैं ..
    जीजाजी: अरे बिरजू ई हम है मुरली(खुद जीजाश्री) पहिचाने नहीं का?
    आँसरिंग मशीन: ... आप कृपया बीप बजने के ..
    जीजाजी: अरे तुम कहीं संतू (गोस्वामी जी का नटखट भतीजा) तो नही हो, ई का शैतानी कर रहे हो छोरा लोग? चाचा की आवाज बना के बोलत हौ?
    आँसरिंग मशीन: ... बाद अपना संदेश रिकार्ड करें, ..
    जीजाजी: अरे का रिकार्ड करें , हम कोई गवैया हैं का? हे संतू , तनिक चाचा (गोस्वामी जी) को बुलाओ
    आँसरिंग मशीन: ... बीप ..
    जीजाजी: ए संतू तुम लोग बहुत शरारती हो गये हो, चाचा की आवाज बना के बोलते हो, अरे काम की बात करनी है , बुलाओ जल्दी चाचा को, नही तो हम आ रहे हैं|
    आँसरिंग मशीन: .... सन्नाटा ....
    जीजाजी: अच्छा नाही मनिहौ, अभी हम आवत है तुम्हरी कुट्म्मस करै की खातिर| धड़ाक से फोन पटकने की आवाज|
    इधर संतू मियाँ जो पास ही खेल रहे थे , जीजाश्री की आवाज सुनकर सिहर गये| जीजाजी के खाँमखा में संभावित आक्रमण की धमकी से उनकी पैंट भी गीली हो गई थी| गोस्वामी जी के पिताजी अलग चिल्ला रहे थे कि यह क्या तमाशा है, यहाँ किसी को इन सब झमेलों का शऊर नहीं हैं| तभी गोस्वामी जी की मुश्किलों में ईजाफा करते गुस्से में लाल पीले जीजाश्री का अवतरण हुआ| आते ही भाषण चालू कि तुम लोगो ने लड़को को बिगाड़ रखा है, फोन तक पर मजाक करते हैं, बड़ों की आवाज की नकल करके बेवकूफ बनाते हैं वगैरह वगैरह| जीजाश्री को लस्सी पिला कर ढंडा किया गया और फिर उन्हीं की आवाज आंसरिंग मशीन पर सुनाई गयी| आशा के विपरीत जीजाश्री का कथन था "लाला ई भोंपू हमरे लिए काहे नहीँ लाये| बहुत काम की चीज लगत है|" और आशानुसार गोस्वामी जी के पिताजी ने तुरंत बवालेजान यानि की आँसरिंग मशीन को जीजाश्री के सुपुर्द कर दिया|

    पीजी भाई
    जिंदगी में कुछ लोग ए॓से भी मिलते है जो बिन माँगे हमेशा सबकी मदद को तत्पर रहते हैं| हमारे पीजी भाई ए॓से ही जिंदादिल शख्स हैं| मैं पहली मुलाकात में उनका कायल हो गया था| न जाने कैसे उन्होनें मेरे मुँह से सिर्फ एक वाक्य सुन कर ताड़ लिया कि मैं कानपुर से हूँ| अमेरिका मे रहने लायक जुझारुपन पीजी भाई की शागिर्दी में सीखा है| १५ अगस्त को मजेदार वाक्या हुआ| सिविक सेंटर पर १५ अगस्त का मेला लगा था| खाने पीने से लेकर हर तरह की धार्मिक-सामाजिक धंधेबाजी के स्टाल लगे थे| कुछ देशप्रेमी कारगिल में पाकिस्तानी ज्यादतियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए थे| मैं और पीजी भाई कुछ अतिउत्साहियों की जबानी पतंगबाजी का मजा ले रहे थे| पाकिस्तान पर जबानी गोलीबारी में कोई सूरमाभोपाली पीछे नही रहना चाह रहा था| ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में पीजी भाई को मसखरी सूझी| वे बोले यदि आप सब साथ दें तो हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दे सकते है| सभी को लगा कि पीजी के दिमाग में कोफी अन्नान या बिल क्लिंटन को चिठ्ठी लिख मारने सरीखा कोई धाँसू आईडिया खदबदा रहा होगा| सारे भारत माँ के सपूत समवेत स्वर में बोले, पीजी भाई आप बस हुक्म करो हम सब का तो खून खौल रहा है| पीजी भाई बोले तो निकालो सब दस-बीस डालर| इस अप्रत्याशित पहल पर सबका क्यों कहना प्रत्याशित था| पीजी भाई ने प्रस्ताव रखा, कि जब पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित कर सकता है तो हम क्यों नही | रकम खर्च कर के क्या हम भी किसी बंबई दुबई के पप्पू पेजर , मुन्ना भाई या मदन ढोलकिया को कराची या लाहौर में एकाध बम फोड़ने की सुपारी नहीं दे सकते| अगर आप हजार डालर भी ईकठ्ठा कर लो तो मैं सुपारी का ईंतजाम करता हूँ| मैने देखा कि भारत माँ के सारे सपूत जिनका कुछ देर पहले खून खौल रहा था अपने अपने दस डालर लेकर छोले भटूरे का स्टाल तलाशने में लग गये| पीजी भाई का फलसफा कुछ अलग ही है| उन्होनें न्यूयार्क के भिखारियों की बदहाली की वीडियो फिल्म बना रखी है, जिसे वह हिंदुस्तान में अमेरिका-पूजकों को खासकर दिखाते हैं|

    हिंदु स्वंयसेवक संघ
    यह भारत वाले आरएसएस का अंतराष्ट्रीय संस्करण है| शुरू के महीनों में सप्ताहाँत पर करने को कुछ विशेष न होने के कारण शाखा में भी लिया| इसकी गतिविधियों में भाग लेकर पता चला कि हिंदु स्वंयसेवक संघ की उपयोगिता कितनी है और साथ ही लोगों खासकर बुध्दिजीवीयों के इससे बिदकते के कारण है| स्वंयसेवक संघ का अमेरिकी संस्करण एचएसएस क्रीमी लेयर समाज से आने वाले लोगों की वजह से कुछ "हटके" है| इसके पुराने सदस्य पहली बार अमेरिका आने वालों की यथासंभव मदद करते है, किसी भी सामाजिक कर्तव्य को निबाहने में , चाहे गुजरात का भूकंप राहत कोष एकत्र करना हो या कारगिल युद्ध में पाकिस्तान विरोध मार्च, आगे रहते हैं| सबसे अच्छा प्रयास तो बालगोकुलम का है| छोटे बच्चों के लिए भारतीय संस्कृति एवं महाकाव्यों पर आधारित लघुकथा, नाटक , मातृभाषा सिखाने हेतु सप्ताहाँत पर कक्षाओं का आयोजन होता है| अभिभावक ही सामूहिक रूप से कक्षा संचालन की जिम्मेदारी लेते हैं| संघ की भूमिका पाठ्य सामग्री एवं आवश्यक प्रशिक्षण तक सीमित रहती है | भारत के बाकि हिस्सों का तो पता नही पर अपने उत्तर प्रदेश में लफंगातत्व धर्म का तथाकथित ठेकेदार बनकर ऐसे संघठन में स्वार्थवश घुस जाता है और बुध्दिजीवी ऐसे तत्वों की वजह से बिदकते हैं|

    दिव्यराज जी और उनका गृह प्रवेश समारोह
    दिव्यराज सिहं जी अटलांटा में संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हैं| एक दिन मणिका जी (दिव्यराज सिहं की धर्मपत्नी) ने सकुचाते हुए अनुरोध किया कि मैं उनके पुराने घर से नये घर में सामान पहुँचाने मे सहयोग कर दूँ| दिव्यराज जी कुछ सकोंची स्वभाव के हैं| उनके सकोंच का एक अन्य कारण भी था| एक अति उत्साही स्वंयसेवक एक दिन पहले उनके घर से पुराना सामान फिंकवाते समय उनका खालिस नया मंहगे जूते का डिब्बा कचरा समझ कर फेंकने की नादानी कर चुका था| दिव्यराज सिहं जी अब किसी नौसिखिए स्वंयसेवक से सेवा लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे| मैनें उनका संकोच मैं कुली नं वन हूँ कह कर दूर कर दिया| खैर मैं, पीजी भाई एवं दिव्यराज जी ने मिलकर उनका सारा सामान नये घर में पहुँचा दिया| पीजी भाई अपने घर चले गये| मणिका जी अगले दिन नये घर में होने वाले गृह प्रवेश समारोह के लिए मिठाई व समोसे का आर्डर किसी महिला को दे रखा था| तमाम भारतीय महिलाएं खास अवसरों हेतु भोजन - पकवान आदि आर्डर पर सशुल्क बना कर देती हैं| मैं, दिव्यराज जी एवं मणिका जी मिठाई व समोसे लेने चल दिए| घर वापस आते हुए अचानक मणिका जी को अगले दिन होने वाली गृहप्रवेश पूजा के लिए फूल लेने की याद आ गई | ग्रोसरी स्टोर के पार्किंग स्थल पर अचानक दिव्यराज जी बिदक गये कि यहाँ फूल नही मिलते| मणिका जी के यह याद दिलाने पर कि स्वंय दिव्यराज जी उनकी वैवाहिक वर्षगाँठ पर उसी स्टोर से फूल लाये थे, दिव्यराज जी ने पाँसा फेंका कि वहाँ गेंदे के फूल नहीँ मिलते| अगले पँद्रह मिनट तक मिँया बीबी में पूजा और फूलों की किस्मो पर शास्त्रार्थ होता रहा| जब दिव्यराज जी के तरकश के सारे तीर मणिका जी के तर्को के आगे कुंद हो गये तो दिव्यराज जी थकान के बहाने कार मे बैठ गये और मणिका जी को फूल लेने अकेले भेज दिया| मैं अब तक मूकदर्शक बना दिव्यराज जी के अचानक व्यवहार परिवर्तन का कारण सोच ही रहा था कि दिव्यराज जी ने खुद रहस्योदघाटन कर दिया| वे बोले अतुल भाई जल्दी दो समोसे ट्रे से निकाल के दो | एक समोसा उन्होनें खुद खाया और एक मुझे टिका कर बोले, आधे घण्टे से समोसे की खुशबू व्याकुल किये थी पर दिल पे काबू रखना जरूरी था वरना मणिका कल पूजा के पहले इनको हाथ भी नही लगाने देने वाली थी| अभी उसे नोंक झोंक के बहाने अकेले दुकान भेजना जरूरी था| यह फरमा कर दिव्यराज जी पति धर्म का निर्वाह करने ग्रोसरी स्टोर में चले गये|
    अगले दिन पूरे विधि विधान से एक पडिंत जी ने नये घर में हवन संस्कार कराया| बाद में पीजी भाई आदतन पडिंत जी से शास्त्रार्थ में उलझ गये| यह सवेंदनशील मुद्दा था मदिरापान के तथाकथित रूप से धर्मविरूद्ध होने का| पीजी भाई का तर्क जायज था, आखिर जब देवताओं द्वारा खुद सुरापान कर सकते हैं तो भक्तों के शौक पर शास्त्रों के बहाने क्यों अड़ंगा लगा रखा है| पीजी भाई पूरी तरह से हावी थे जब्कि पडिंत जी पतली गली से भागने का मार्ग तलाश रहे थे ताकि अगले जजमान के यहाँ विलंब न हो |
    पडिंत जी सवेरे सवेरे एक और हादसे से दो चार हो चुके थे| दिव्यराज जी के घर का पता था 7125 ब्रुकवुड रिवर | ब्रुकप्लेस कम्युनिटी, ब्रुकवुड रिवर नाम की कम्युनिटी से कुछ ही पहले था| पडिंत जी सवेरे पाँच बजे गफलत में 7125 ब्रुकप्लेस में जा धमके और चार पाँच बार दरवाजे की घंटी दे मारी| मकान मालिक कोई गोरा अमेरिकन था| बेचारे ने उनींदी आँखो से दरवाजा खोला| पडिंत जी दरवाजा खुलते ही बोले "Where is Divyraj" | गोरे अमेरिकन जिसकी अभी ठीक से नींद भी नही खुली थी उसके लिए गेरुआ वस्त्रधारी एवं पूर्ण मस्तक चंदन तिलकधारी, अजीब सा नाम पूछते पडिंत जी किसी मंगल ग्रह के निवासी से कम साबित नही हुए| गोरा अमेरिकन पडिंत जी को हेलोवीन कास्टयूमधारी समझ रहा था| हेलोवीन नवंबर के महीने में मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें बच्चे भूत प्रेत या अन्य विचित्र किस्म के कपड़े पहनकर टोली बनाकर घर घर टाफीयाँ माँगने निकलते हैं| वह गोरा पलटा और कुकुड़ाते हुए पँडित जो को एक मुठ्ठी टाफी टिकाने लगा| जब्कि पडिंत जी जो यह समझ रहे थे कि दिव्यराज जी ने शायद यह घर जिस किसी से खरीदा है वह पुराना मकान मालिक अभी भी वहाँ डटा है| पाँच मिनट बाद पंडित जी को पता चला कि वे गलत घर में आ गये हैं और उनका 7125 ब्रुकवुड रिवर में इंतजार करते हुए देशी जनता सूख कर काँटा हो रही हैं|

    मुझे आटो में घर जाना है
    करीब ६-७ माह बाद जब कार, अपार्टमेंट ईत्यादि का इंतजाम हो गया तो अपने परिवार (दादा,प्रीति व चारु) को कानपुर से बुला लिया| अब परदेशी भूमि पर पैर जम गये थे| दिव्यराज जी साथ एयरपोर्ट गये| मेरी ३ साल की चारु जिसे ६ माह पहले दिल्ली में छोड़ा था ६ मिनट बाद मुझे पहचान पायी| दादा ने बताया कि इसने एयरप्लेन में सीटबेल्ट बाँधने में ताँडव मचा रखा था| चारू कार देख कर तो चहकी पर कार-सीट देख कर बिदक गयी और बोली मुझे इस कार पर नही जाना, मुझे आटो में घर जाना है| अमेरिका में आटो? वह एक हफ्ते तक कार सीट पर नहीं बैठी| आखिर ट्वायसआरअस की रिश्वत काम आयी| कहाँ कानपुर की हजारीलाल की दुकान का काईयाँ सेल्समैन, शीशे में बंद खिलौने, दाम पूछ पूछ कर खिलौने देखने की मजबूरी और कहाँ ट्वायसआरअस का महाकाय शोरूम, फ्रीफंड की मुस्कान बिखेरती सेल्सगर्ल्स और खिलौने परखने की निरंकुश आजादी | चारू जी के तो जलवे हो गये|

    कोरोला की शहादत
    चार महीने रहने के बाद दादा वापस कानपुर चले गये| उनको अटलांटा एयरपोर्ट से विदा कर वापस आ रहा था| प्रीती (मेरी धर्मपत्नी) व चारू कार की पिछली सीट पर बैठे थे| प॓रीमीटर फ्रीवे की सबसे दाईं लेन से चार लेन बाई तरफ चेंज कीं| तभी देखा कुछ दूर एक कार मेरी लेन में खड़ी है| सारी लेन का ट्रैफिक भाग रहा है और यह कार बीचोबीच खड़ी थी| पूरी ताकत से ब्रेक लगाये| मेरी कार रूकते रूकते आगे वाली कार से हौले से जा लड़ी| तभी दो जबरदस्त झटके लगे| पीछे की खिड़की का काँच टूटकर हम सब पर आ गिरा| पर्मात्मा की कृपा से किसी को चोट नही लगी| बाहर निकल कर देखा , मेरी कार के आगे व पीछे दो दो कार और दुर्घटना में शामिल थीं| तेज रफ्तार ट्रैफिक के साथ यही मुश्किल है| अगर एक कार किसी वजह से रूक गयी तो पीछे की कई कारें मरखनी भेड़ों की तरह बिना आगा पीछा सोचे एक दूसरे के पीछे पिल पड़ेंगी| कार का ट्रंक पिचक गया था| पुलिस व एंबुलेंस वाले दो मिनट में आ गये| कोई घायल नही था इसलिए सारी कार्यवाही आधे घण्टे में निपट गयी| यह विदेश में दुर्घटना का पहला अनुभव था| ईंश्योरेंस कंपनी ने कार को शहीद (अमेरिकी भाषा में टोटल) घोषित करार देकर कार की पूरी कीमत के बराबर छतिपूर्ति कर दी| यहाँ कल्लू मिस्त्री छाप मरम्मत बहुत महँगी पड़ती है| शायद इसीलिए यूस एंड थ्रो का चलन है| शुरू में भारत में किसी को दुर्घटना के बारे में नही बताया, सब नाहक परेशान होते| पर एक दिन चारू पटाखा अपने दादा जी से फोन पर बोल पड़ी कि दादा मैं बच गयी| अब यह रहस्योदघाटन जरूरी था कि चारू किस चीज से बची| दो दिन बाद नयी कोरोला ली| इस बार मोलभाव के लिए पीजी भाई साथ थे| ठोंकबजा कर कार दिला दी| ज्ञानी मित्रों ने कदम कदम पर मार्ग दर्शन किया वर्ना वही होता जो अब छः साल बाद मेरे मित्र के साथ हुआ| हम दोनो साथ कही जा रहे थे, ड्राईविंग सीट पर बैठै मेरे मित्र बता रहे थे कि उन्होनें ईंश्योरेंस से कोलोजन डेमेज वेव कर दिया किसी की गलत सलाह के चलते है| तभी उनका जबरदस्त कोलीजन दूसरी कार से हुआ और हमारी कार के सेफ्टी बैग तक बाहर आ गये| हम दोनो तो बच गये पर कार शहीद हो गयी| आज जब यह कहानी लिखने बैठा तो छः साल पहले के सत्यनारायणस्वामी याद आते हैं| सुरक्षा से कभी समझौता न करने के उनके दृष्टिकोण के चलते उन्होने न सिर्फ खुद, बल्कि मुझे भी महँगा ईंश्योरेंस दिला दिया था| हलाँकि बहुत से लोग पैसे को दाँतो से पकड़ कर चलने की आदत के चलते ईंश्योरेंस में कटौती कर देते हैं और बाद में खामियाजा भुगतते हैं| कार की परदेस में वीरगति पर एक अर्थशास्त्र भी लिखा जा चुका है|

    March 13, 2005

    अध्याय ४:गड्डी जान्दी है छलांगा मारदी!

    Oh, I am going to New Jersey
    दो हफ्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गये| नवीन भाई ने सप्ताहाँत पर ड्राईविंग पर हाथ साफ करने के लिए रेंटल कार ले ली | हलाँकि नवीन भाई को ड्राईविंग लाईसेंस हममें से सबसे पहले मिला, पर मिला एक धीरे से लगने वाले जोर के झटके के बाद| हम सब ड्राईविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गये| यहाँ आपके साथ एक पुलिस अफसर कार में बैठ कर एक आपका कुछ मानको के आधार पर ड्राईविंग टेस्ट लेता है| इस में दो करतब खास तौर पर उल्लेखनीय हैं| रोमांचक पैरेलल पार्किंग एवं वीविंग यानि कि आठ दस प्लास्टिक के छोटे-छोटे खंभो के बीच से शाहरुख खान की तरह कार निकालना| नवीन भाई को अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर न्यूजर्सी जाना था अतः उनके ख्यालों में न्यूजर्सी छाया हुआ था| नवीन भइया ने देशी बुद्धि दौड़ायी और बाकि लोगो को एक कोने में खड़े होकर, टेस्ट देते देख कर टेस्ट के सारे हिस्से कंठस्थ कर डाले| उनकी बारी आने पर पुलिस अफसर कार में नवीन भाई के साथ बैठा और उनका टेस्ट लेने लगा| सब कुछ ठीक चल रहा था| नवीन भाई के हिसाब से अगला स्टेप तेज चला कर ब्रेक लगाने का प्रदर्शन था, पर पुलिस अफसर ने खालिस अमेरिकी आवाज में उन्हें कार को पहले वीविंग कराने के लिए कह दिया| लेकिन नवीन भाई अपनी धुन में सीधे जाने लगे तो पुलिस अफसर ने टोक कर पूछा कि "Sir, Where are you going?" नवीन भाई इस अप्रत्याशित प्रश्न से मानो चिरनिद्रा से जागे| पर वे अभी पूर्ण सुप्तावस्था से अर्धचेतना में ही आ पाये थे| उन्हें यह कौतूहुल था कि इस पुलिस अफसर को मेरे अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर जाने के बारे में कैसे पता चल गया कहीं यह Primus Sofwtare वालों को तो नही जानता जहाँ वह काम करते हैं| एकबारगी उन्हे लगा कि Primus Sofwtare वालों ने इस पुलिस वाले को सेट तो नहीं कर रखा, हलाँकि ऐसा होता तो नहीं अमेरिका में| वह बोल पड़े "Oh, I am going to New Jersey|" पुलिस अफसर जो उन्हें चेताने की कोशिश कर रहा था उसे ऐसे बेहूदा जवाब की उम्मीद नही थी| उसने उन्हें टेस्ट स्थल से बाहर जाने का आदेश थमा दिया और नवीन भाई मानो आसमान से गिरे| बाहर निकलते ही पहले तो आधे घंटे तक रेंटल कार पर मुक्के ठोंकते रहे, फिर बोले गुरू क्या यह लोग सौ पचास की पत्ती मेज के नीचे से लेकर लाईसेंस नहीं दे सकते क्या? हलाँकि एक ही सप्ताह में वे दुबारा ड्राईविंग टेस्ट देकर लाइसेंस झटक लाये| उस सप्ताहाँत पर वे हम सबको एक रेंटल कार से सैर पर भी ले गये| सैर के दौरान एक सीधी सादी दिखती सड़क ने नवीन भाई को धोखे से फ्रीवे में पहुँचा दिया| अगर सोलंकी जी न संभालते तो नौसिखिया नवीन भाई फ्रीवे देखकर इतने आतंकित हो गये थे कि कार में हम सब को छोड़ कर पैदल भागने वाले थे| फ्रीवे वह बला है जिससे हर नया ड्राईवर घबराता है| दो से छः लेन का हाईवे, जिसमें हर कोई ६० से ८० मील प्रति घंटा कि गति से कार भगाता है| फ्रीवे के उस्ताद को प्रवेश, हाई स्पीड मर्ज, लेन चेंज करना , एक्जिट लेना आदि सभी कलाओं में पारंगत होना आवश्यक है| एक भी कला में कम निपुणता आपकी या आपकी कार की बलि ले सकती है| अब इन कलाओं में निपुणता के लिए एक अदद द्रोणाचार्य की हर नया अर्जुन तलाश करता है| मैं अर्जुन भी बना और समय के साथ द्रोणाचार्य भी|
    आजा बताऊँ तुझे मैं अंडे का फंडा
    अगर हमने महेश भाई को झेला तो मेरे मित्र (नवीन, नीरज जी व सोलंकी) सुरेश भाई से त्रस्त रहे| सप्ताहाँत पर नवीन भाई मुझे गेस्ट हाउस बुला लाए| भोजन के दौरान सोलंकी जी ने अथ श्री सुरेशानंद-व्यथा-कथा छेड़ दी| पता नही क्यों कंपनी वालो ने मेरे मित्रों के साथ एक मियाँ बीबी को भी गेस्ट हाउस में टिका दिया था| वैसे सुरेश की बीबी मेरे मित्रों का भी भोजन सस्नेह बना देती थी| वह जितनी भली स्त्री थी, सुरेश भईया उतने ही अझेल प्राणी थे| पहले तीन दिन तक तो सारे मित्र उनके श्रीमुख से सिंगापुर एयरपोर्ट के मुकाबले अटलांटा एयरपोर्ट के घटिया होने का प्रलाप सुन-सुन कर त्रस्त हुए| वजह सिर्फ एक थी की माननीय सुरेश जी को अटलांटा एयरपोर्ट में सामान रखने की ट्राली का एक डालर किराया देना खल रहा था जो सिंगापुर एयरपोर्ट में नही देना पड़ता था| उसके बाद सुरेश भाई का सिंगापुर स्तुतिगान (जहाँ से सुरेश भाई अवतरित हुए थे) और अमेरिका का नित्य निंदापुराण मेरे तीनों मित्रों की नियति बन गया| सुरेश भाई द्वारा कंपनी आफिस में इकलौते ईंटरनेट टर्मिनल पर सारे दिन का कब्जा जमाये रखना एवं गेस्ट हाउस में नाहक धौंसबाजी मेरे मित्रों के सब्र के पैमाने से उपर जा चुकी थी| तीनों मित्र गेस्ट हाउस में आमलेट नही खा सकते थे क्योंकि सुरेश भाई को अंडे की बदबू नही पसंद थी| रात में आठ बजे के बाद टीवी चलाने से सुरेश भाई की नींद में खलल पड़ता था| बेचारे मित्र प्रतिदिन डिब्बाबंद खाने की जगह मिलने वाले ताजे खाने की वजह से सुरेश भाई को पैकेज्ड डील की तरह बर्दाश्त कर रहे थे| बातचीत में पता चला कि वस्तुतः यह सुरेश, महेश के सगे भाई भी थे जिन्हें मैने झेला था| जब मैनें उनको बर्तन रखने की अलमारी का किस्सा सुनाया तब सबको दोनों भाईयों के व्यवहारिक धरातल का सहज अनुमान हो गया| उस समय दोनो भाई कहीं गये हुए थे| महेश सवेरे नीरज जी को जाने क्या अनुचित बोल गया था कि अगर सुरेश की बीबी का लिहाज न होता तो नीरज जी व सोलंकी, महेश भाई की धुलाई कर डालते| मुझे शाम को आमलेट बनाने की सूझी| सोलंकी जी ने टोका भी कि सुरेश सपरिवार आ रहा होगा| मैनें कहा ठीक मैं भी महात्मा के दर्शन कर लूँगा , पर आमलेट जरूर खाऊँगा| मित्रगण मेरे स्वभाव से कालेज के जमाने से परिचित थे अतः थोड़ी देर में होने वाले प्रहसन के इंतजार में टीवी लगाकर बैठ गये| आमलेट बनने के धुँए के बीच सुरेश जी अवतरित हुए व सीधे सपत्नीक कमरे में चले गये| कुछ ही देर में बाहर आकर कुकुरनासिका का प्रदर्शन करते हुए जिज्ञासा प्रकट की कि किसी ने आमलेट बनाया था क्या? मैं बोला हाँ मैं बना रहा हूँ| सुरेश जी कुछ भृकुटी तान कर बोले पर इस बर्तन में तो शाकाहारी खाना बनता है| मैने पूरी कनपुरिया दबंगई से जवाब दिया "अरे, आपको महेश ने नहीं बताया कि चीनी डांग तो इसी बर्तन में बीफ (गाय का माँस) बनाता था जिसे महेश बाद में धोकर टमाटर-चावल की लुगदी पकाने के लिए प्रयोग करता था|" सुरेश जी इससे पहले कुछ और सोचें, मै चालू रहा "और अभी आप सब रेस्टोरेंट में खाकर आ रहे हैं वहां कौन सा शाकाहारी भोजन बनाने से पहले बर्तनों का धार्मिक शुद्धीकरण होता है|" सुरेश जी अवाक रह गये| महेश उन्हें और जलील होने से बचाने के लिए कमरे में खींच कर ले गया| मित्र मंडली की हँसी बमुश्किल ही रूक पायी| दोनों भाईयों में शायद पहले डांग को लेकर जमकर नोंक झोंक हुई फिर न जाने क्या सूझी कि दोनों भाई, सुरेश की पत्नी को उसके सामान सहित कहीं छोड़ने चले गये| नवीन भाई इस प्रकरण में सुरेश की पत्नी के जाने से कुछ दुखी थे| उनको फिर से डिब्बाबंद खाने पर जीना अप्रिय लग रहा था | पर बाकी सब इसलिए प्रसन्न थे कि अब सुरेश तो निहत्था गेस्ट हाउस लौटने वाला था| अब तो हमाम में सभी नंगे हैं जो जिस पर जैसे चाहे रोब जमायें| हुआ भी वही, एक सप्ताह में सुरेश भाई मेरे मित्रों के बदले हुए वाचाल वानरी रूप के आगे नतमस्तक हो गये| उन्हें अहसास हो गया कि गेस्ट हाउस में जब तक उनकी पत्नी थी वहाँ शराफत थी| उसकी बीबी के लिहाज से सब उसे चाहे-अनचाहे सम्मान देने को और उसके नाज सहने को विवश थे| पर बेचारा अपनी पत्नी को गेस्ट हाउस से भेजकर वानर सेना के हत्थे चड़ गया और वह भी बिना ढाल के| सबने उसे बेतरह परेशान किया रात रात भर टीवी चलाकर, जमकर निरामिष भोजन बनाकर| यहाँ तक कि जब सबका एक साथ प्रोजेक्ट लगा तो सबने सुरेश को एक हफ्ते पुराने हिसाब के १५ डालर जानबूझ कर एक-एक सेंट के सिक्कों की शक्ल में थमा दिये| लेकिन कृपणचंद तीन किलो भारी चिल्लर का थैला लादे लादे एयरपोर्ट चला गया|
    मेरी पहली टोयोटा कोरोला
    प्रोजेक्ट मिलने के बाद ड्राईविंग लाईसेंस झटकना एकसूत्रीय कार्यक्रम बन गया था| पहले लिखित परीक्षा देकर लर्नर परमिट मिला| कुछ ड्राईविंग लैसंस भी लिए| सत्यनारायण जी के दर्दनाक अनुभवों से विश्वास हो चुका था कि ड्राईविंग लाईसेंस पाना टेड़ी खीर है|मेरा व उनका ड्राईविंग गुरू एक ही गोरा था| बेचारे चार बार बैरंग वापस लौट चुके थे| हर बार कुछ न कुछ गलती कर बैठते थे| पाँचवी बार हद हो गई| सत्यनारायण जी ड्राईविंग टेस्ट के सारे स्टेप ठीक कर चुके थे, पैरेलल पार्क करते हुए ब्रेक की जगह हड़बड़ी में एक्सीलेटर झोंक दिया और टेस्ट सेंटर में लगा एक खंभा ही जमींदोज कर डाला| मुझे अगले दिन मेरी ड्राईविंग प्रैक्टिस के दौरान उस गोरे ने बताया कि सत्यनारायण जी हताशा में अपना माथा ठोंक रहे थे| उन्हें फेल करने वाला महाखड़ूस ड्राईविंग परीक्षक भी उन पर तरस खाकर दिलासा दे रहा था| फिर भी जब सत्यनारायण जी का मस्तक ठोंकन बंद नही हुआ तो उस गोरे ने झल्ला कर अपनी कार के ट्रंक के टूलबाक्स से एक हथौड़ा निकालकर थमा दिया सर को ठोंकने को| सत्यनारायण जी भारत वापस जाने पर अमादा हो गये| रात भर उनका प्रलाप चलता रहा कि यहाँ कभी लाईसेंस नही मिलने वाला| हिदुंस्तान होता तो अब तक ट्रैफिक एक्जामिनर की हजार पाँच सौ से हथेली गर्म कर के मिल गया होता| अब कब तक पैदल चलूँ , कही किसी दिन किसी कार या ट्रक के नीचे आ जाऊँगा| उन्होनें हिंदुस्तान पलायन की ठान ली थी| मैने अगले दिन अपने कंपनी डायरेक्टरों को उनके घायल जज्बातों के बारे में बताया| वे बेचारे दोनों अपने सारे काम छोड़ कर भागे| सत्यनारायण जी की दोनो ने करीब करीब साईकोलाजिकल काऊँसिलिंग कर डाली|
    अगले दिन मेरा ड्राईविंग टेस्ट था| टेस्ट एक गोरी एक्जामिनर ले रही थी| जब उसने मुझसे वीविंग करने के लिए बोला तो मैने उससे पूछा कि “Which style , Left before, center left, center right or right after?” वीविंग के इतने सारे प्रकार सुनकर एक्जामिनर समझ गई कि पाला गोरे ट्रेनर के चालू शागिर्द से पड़ा है| मै ड्राईविंग लाईसेंस पाने मे कामयाब हो गया| इतना सुखद अहसास कि मानो लंका जीत ली हो| एक महीने बाद आफिस में एक सहकर्मी से एक अदद पुरानी टोयोटा कोरोला आनन फानन में खरीद डाली| मैं शाम को सोच रहा था अगर यह कार कानपुर में खरीदनी होती तो पहले जानकारी के लिए न जाने किसकी-किसकी चिरौरी की जाती| कार सपरिवार मंदिर दर्शन को जाती| मिष्ठान वितरण होता | यहाँ तो बस पैसे दिये और कार दरवाजे पर, कोई बधाई देने वाला नही|