December 03, 2004

अध्याय ‍१: ओवर टू यूएसए

टेलिफोन काल जो भूचाल बनकर आयी
अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में ईनफारमेशन टेक्नोलोजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही| अपनी सरकार तो बस सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबूओं के पीकदान बनने के लिए, या फिर कभी कभी साईबरठेला जैसे मदारियो के तमाशे किये जाते रहेंगे| सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में कम्पयूटरीकरण केनाम पर होने वाले तमाशे के लिए अलग से अध्याय लिखना पड़ेगा| मै समझ गया कि अंततः भला इसी में है कि हवा के रूख के साथ अमेरिका के लिए बोरिया बिस्तर बाँध लिया जाये| खैर कुछ महीने तक अपनी कर्मकुँडली यानि बायोडेटा को कम से कम एक हजार नियोक्ताओं के पास भेजने के बाद यह तक भूल गया कि किस किस के पास भेजा था| सोचा कि दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, हम तो खाक छाने कानपुर की और हमारी कर्मकुँडली ईंटरनेट की बदौलत दुनिया की मुफ्त सैर कर रही है| खैर कर्मकुँडली को कुछ लोगो ने पसंद भी किया और कुछ टेलीफोन काल्स भी आईं, ऐसे ही एक दिन फोन रिसीव करने पर उधर से शालीन आवाज आई "This is Neeraj, and I saw your resume. I want to talk to you about your projets." कुल पाँच मिनट की संक्षिप्त बातचीत हूई और जनाब ने यक्ष प्रश्न पूछ डाला कि "हाँ कहने के क्या लोगे?" बात साफ थी , कि जनाब नया जाब आफर दे रहे थे| मैं पशोपेश में था कि नीरज साहब रहते किस शहर में हैं, दिल्ली या बम्बई तो फिर उसी हिसाब से मुँह खोलूँ| खैर कूटनीतिक जवाब दिया "Mr Neeraj, that will depend on the place of posting". नीरज जी ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया "It does not vary here much, because of the place of posting,except west coast". मेरे मन के एक साथ कई घंटियाँ बज गईं "क्या वेस्ट कोस्ट, यानि कि अमेरिका , यानि कि जवाब डालर में होना चाहिए, यानि कि ........." | खैर नीरज जी ने जो आफर दिया वह मैंने सर्हष स्वीकार कर लिया| नीरज ने अगले दिन ईमेल भेजने की बात कही और अगले दिन टेक्निकल ईंटरव्यू करने का जिक्र किया| पर अगले दिन मेरे ईमेल ईनबाक्स पर आफर लेटर विराजमान था , और दो दिन में ही एक कोरियर असली लेटर कुछ हिदायतों के साथ जिनमें पासपोर्ट के कुछ पेज भी माँगे गये थे| इस पाँच मिनट की काल ने , कनपुरिया भाषा में बवाल मचा दिया| अब कानपुर की आबोहवा छूटने के समय आ गया था| जिंदगी ने १८० डिग्री का टर्न ले लिया था| एक अनजानी दुनिया में पैर टिकाने की तैयारियाँ करनी थी|

क्या छोड़ूँ और क्या ले चलूँ
पहले कुछ दिन बड़ी दूविधा में बीते| अगर आप में से कोई पहली बार अमेरिका आ रहा है तो यह प्रसंग आपके काम का हो सकता है| आपको ऐसे ऐसे विशेषज्ञ मिल जायेंगे कि जिन्होनें खुद तो अपने शहर के बाहर ताउम्र पाँव भी नहीं रखा होगा पर आपको अमेरिका में किस चीज की जरूरत पड़ती है, क्या मिलता है , क्या भारत से लाना पड़ता है यह सब बताने को तत्पर रहेंगे| यह और बात है कि इन सबकी सलाह परस्पर विरोधी होंगी और अंततः आप लालू यादव की भाषा में कनफ्युजिया जायेंगे| लोगो का बस चले तो आपके सामान में रिन साबुन , डालडा घी, प्रेशर कुकर और न जाने क्या क्या बँधवा दें| एक ऐसे ही अंकल चिंतातुर हो रहे थे कि यार तुम शराब को हाथ भी नहीं लगाते तो अटलाटा जैसी ठंडी जगह में जिंदा कैसे रहोगे| अब अटलांटा तो खास ठंडा नहीं था पर यह पात चल गया है कि चार साल से फिलाडेल्फिया जैसी जगह जहाँ बर्फ भी पड़ती है, वहाँ मेरे जैसे कई भलेमानुष बिना सुरासेवन के जिंदा हैं| कोई वहाँ कढ़ाई ले जाने पर जोर दे रहा था तो कोई रजाई| भला हो अमेरिका में पहले से रह रहे मित्रों का जिन्होने वक्त पर सही मार्गदर्शन कर दिया| यहाँ सब कुछ मिलता है| घर एयरकंडीशंड होते हैं अतः रजाई कोई नही ओढ़ता| मेरे एक मित्र को ऐसे ही विशेषज्ञों ने रजाई, कढ़ाई और न जाने क्या माल असबाब लाद कर ले जाने पर मजबूर कर दिया था| बेचारा एयरपोर्ट पर फौजी स्टाईल के बिस्तरबंद के साथ कार्टून नजर आ रहा था|

मेरे जीजा भी कैलीफोर्रनिया में रहते हैं
अमेरिका जाने के पहले सभी नाते रिश्तेदारों से एक बार मिलने के सिलसिले में बड़ा मजेदार अनुभव हूआ| ज्यादातर दूर के रिश्तेदारों के न जाने कहाँ से अमेरिका में संबधी उग आये| अपने निकट का तो खैर कोई कभी भारत से तो क्या उत्तर प्रदेश से भी बाहर मुश्किल से ही गया होगा| अब इन दूर के रिश्तेदारों और जानपहचान वालों ने अपने अमेरिकी रिश्तेदारों के नंबर भी देने शुरू कर दिए , इसके लिए मुझे साथ में हमेशा एक डायरी रखनी पड़ती थी| सोचता था कि कभी तथाकथित अमरीकी रिश्तेदारों को देखा तो है नही इन लोगों के यहाँ, जो रिश्तेदार अमेरिका में रह कर इन पास के रिश्तेदारों को नहीं पूछते वे भला मुझ दूर के रिश्तेदार को क्यों लिफ्ट देंगे| फिर भी औपचारिकता निर्वाह हेतु नंबर सबके नोट कर लिए| एक दिन तो हद हो गयी | किसी ने सलाह दी कि, कस्टम के नियमानुसार सारे लगेज बैग में चाहे छोटे ही सही ताले लगे होने जरूरी हैं| अतः एक परचून वाले की दुकान जाकर सबसे सस्ते ताले माँगे| परचून वाले ने ताले देते हुए पूछ लिया कि "साहब थोड़े मजबूत वाले ले लो , यह तो कोई भी तोड़ देगा"| मैने जब हल्के ताले पर ही जोर दिया तो उसने अगला सवाल उछाला "क्या प्लेन से कहीं जा रहे है"? मेरे हाँ के जवाब में अगला सवाल हाजिर था कि कहाँ? मेरे अमेरिका कहते ही वह परचूनिया बोला "अरे भाई मेरे जीजा भी कैलीफोर्रनिया में रहते हैं| आप उनका नंबर जरूर ले जाओ| शायद काम आ जायें", और वह जनाब बाकि ग्राहकों को टापता छोड़ डायरी लेने चल दिए| मैं सोच रहा था कि मेरा खानदान अब तक अमेरिकियों से अछूता कैसे रह गया| यहाँ तो परचूनिए तक के सँबधी अमेरिका में बैठे हैं| चाहे वह इन हिंदुस्तानियों को पूछे न पूछे यह लोग हरेक को उनका नंबर दरियादिली से बाँटते रहते हैं|

प्रस्तावना

अमेरिका के कुछ महानगरों के हाईवे में सबसे बाईं तरफ की लेन एचओवी यानि कि हाई आकूपेनसी वेह्किल लेन कहलाती है| अगर आप को कुछ दूर तक हाईवे से बाहर नही निकलना , तो एचओवी लेन में आप एकसमान तेज गति से सफर कर सकते है| ईसमें निश्चित अंतराल पर प्रवेश व निकास के चिन्ह निर्धारित होते हैं| बस एक बार एचओवी लेन में प्रवेश कीजिए और फर्राटे से बिना लाल बत्ती या लेन बदलने की चिंता किए भागते जाइऐ | अमेरिका में जिंदगी भी बस एचओवी लेन की तरह लगती है| इस तेजरफ्ता जिंदगी जैसे हाईवे में हर शख्स अपनी गाड़ी एचओवी लेन में पहुँचाने को मगजमारी करता रहता है| जिस लेन में कोई रोकटोक न हो , न ही कोई अड़चन या रूकावट हो| एकबारगी ईस लेन में घुस जाने के बाद बाकी लेनों की धक्कामार जिदंगी यानी कि स्वदेश में कोई वापस नहीं जाना चाहता| लेकिन यह एचओवी लेन है एकदम बेरंग| कोई लालबत्ती नहीं, हमेशा तेज भागते रहने की मजबूरी और साथ ही न भाग सकने पर बाहर निकलने का खौफ | आदमी बस घोड़े का चश्मा लगाए, बिना दूसरी लेन में देखे बस भागता चला जाता है खींचते हुए अपनी जिंदगी की गाड़ी को| पता नहीं चलता कब मंजिल आ गई| कुछ इसी प्रकार से अपना जीवन बीता है| उम्र तमाम होती रही, परिवार में सदस्य जाते आते रहे| दोस्त मिले छूटे| कानपुर की गलियों मे एलएमएल-वेस्पा चलाते चलाते एक दिन खुद को अटलांटा में एचओवी लेन में पाया| अभी तक तेजरफ्ता रही इस जिंदगी में, जो अभी तक गुजरा है, उसमें से जो कुछ खट्टा - मीठा या गुदगुदाता सा है उन्हें समेट कर रोचक संस्मरणों का संकलन तैयार किया है "लाईफ ईन ए एचओवी लेन"|

अध्याय ३: वेलकम टु अमेरिका

वेलकम टु अमेरिका
अटलांटा एयरपोर्ट पर ईमिग्रेशन से निपटने के बाद बाहर आकर देखा कि लोगों की निगाहें अपने-अपने आगंतुको को तलाश रही हैं| कुछ टैक्सी वाले आने वाले लोगों के नाम की तख्ती लिए खडे थे| तभी मुझे अपने नये कंपनी डायरेक्टर की एक हफ्ते पहले ईमेल पर दी गई सलाह याद आई कि अपने कैब ड्राईवर से मिलने के बाद ही बैगेज क्लेम से अपना समान उठाना| दो दिन लग गये थे यह पता करने में कि टैक्सी को कैब भी कहते हैं| पर यहाँ तो अपना नाम किसी की तख्ती पर नही है| अब? आज तो रविवार है| आफिस भी बंद होगा| किसी को फोन करुँ या खुद टैक्सी करुँ| उधेड़बुन में सोचा चलो पहले बैगेज क्लेम से अपना सामान ही उठाया जाय| वापस आकर फिर देखा तो एक नये नजारे के दर्शन हुए| वेटिंग लाऊँज तकरीबन खाली हो चुका था| आगँतुकों को लेने आये मुलाकाती उनकी झप्पियाँ ले रहे थे| एकाध देशी लोग जो महीनों से अपनी बीबीयों से दूर थे, उनके आने पर झप्पियों के साथ पप्पी लेने से नहीं चूके| मैं सोच रहा था कि अगर प्लेन में अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया आये होते तो अमेरिका में हिंदुस्तानियों के इस तरह सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?मेरी नजर एक दुबले पतले मोना सरदार जी पर पड़ी जो एक फटीचर सा कागज का पोस्टर जैसा कुछ लिए अपना शिकार तलाश कर रहे थे| नजदीक जाकर देखा तो उनके पोस्टर पर मुझ नाचीज का ही नाम चस्पां था| उनसे दुआ सलाम हुई तो जान में जान आई| सरदार जी मुझे लेकर टैक्सी की ओर चल दिए| बीच में किसी दक्षिण भारतीय युवक को उन्होने एक अदद "Hi" उछाल दी| रास्ते में सरदार जी ने एयरपोर्ट पर अपने देर से प्रकट होने का राज खोला| वे समय से पहले पहुँचे थे ,पर मेरा और मेरी कम्पनी का नाम लिखी तख्ती घर में भूल गये| कार से वेटिंग लाऊँज आते-आते मेरी कंपनी के नाम "Primus Software" में से Primus उनकी याददाश्त से कहीं टपक गया और वे सिर्फ Software को अपने साथ वेटिंग लाऊँज लेते आए| दक्षिण भारतीय युवक ईमिग्रेशन से निकलने वाला पहला हिंदुस्तानी था| सरदार जी ने उससे सवाल दागा "Are you from software?" अब भला वह युवक क्यों मना करता आखिर वह भी यहाँ कम्पयुटरों से कुश्ती लड़ने ही तो आया था| सरदार जी उस भाई को अतुल अरोरा समझ लेकर अपने साथ ले गये और लगे रास्ते में पंजाबी झाड़ने| सरदार जी का माथा तब ठनका जब वह बंदा अंग्रेजी से नीचे उतरने को राजी नही हुआ| सरदार जी को दाल में काला नजर आया कि अगर कोई बंदा न हिंदी समझता है न पंजाबी तो वह अरोरा तो हो ही नही सकता| सरदार जी ने जब उसका नाम पूछने की जहमत उठायी तो उन्हे ईल्म हो गया कि वह गलत आदमी को पकड़ लाये है और असली अरोरा उन्हें एयरपोर्ट के वेटिंग लाऊँज पर लानतें भेज रहा होगा| बेचारे तुरंत यू टर्न लगा कर एयरपोर्ट वापस आये जहाँ उस दक्षिण भारतीय युवक को लेने आया ड्राईवर हैरान हो रहा था कि उसका मुसाफिर कहाँ तिड़ी हो गया| सरदार जी, इससे पहले कि असली अरोरा कहीं गुम न हो जाये, कहीं से एक कागज का जुगाड़ कर मेरा नाम उस पर लिखा और मेरा इंतजार करने लगे|

यह बर्तन रखने की अलमारी है
कंपनी के गेस्ट हाउस में दो जंतु मिले, एक हिंदी भाई महेश एक चीनी भाई डांग| डांग को मेरे महेश से हिंदी बोलने पर कोई एतराज नही था, होता भी तो बेचारा अकेला चना कौन सा भाड़ फोड़ लेता| महेश भाई टीसीएस के भूतपूर्व कर्मचारी थे और उन्हें अमेरिका प्रवास का एक वर्ष का अनुभव था| शुरू में बड़ी खुशी हूई कि नये देश में अपनी जबान बोलने वाला कोई अनुभवी मित्र मिल गया| पर यह खुशफहमी ज्यादा देर नहीं रही| महेश भाई का अनुभव खाने पीने के मामले में बहुत कष्टकारी सिद्ध हुआ| बंदा ग्रोसरी स्टोर में शापिंग कार्ट लेकर एक तरफ से दौड़ लगाता था और पेमेन्ट काउन्टर पर पहुँचने से पहले उसकी शापिंग कार्ट वाली ट्रेन के सिर्फ चार अदद स्टेशन आते थे टमाटर, दूध, दही एवं फल| इन सबके के अतिरिक्त बाकि सभी चीजें किसी न किसी प्रकार उसकी नजर में माँस युक्त थी अतः और कुछ देखना उसके हिसाब से समय की बर्बादी था| चार दिन से भाई ने टमाटर, चावल व दही निगलने पर मजबूर किया हुआ था| मैं हैरान था कि बाकि कनपुरिये मात्र दही-चावल-टमाटर पर यहाँ कैसे अब तक जीवित हैं| एक दिन अपने पुराने मित्र शुक्ला जी के घर फोन किया तो उनकी धर्मपत्नी ने ईंडियन ग्रोसरी जाने की सलाह दी| पर महेश भाई को ईंडियन ग्रोसरी ले जाने को तैयार करना किसी कुत्ते को बाथटब में घुसेड़ने से कम मुशकिल नहीं था| रोज वही दही-चावल-टमाटर का भोज फिर बर्तन धोना| एक दिन महेश भाई चावल बनाने मे व्यस्त थे और मैं गप्पबाजी में कि अचानक किसी अलमारी जैसी चीज का हैंडल मुझसे खुल गया| एक अजीब सी अलमारी जिसमें बर्तन लगाने के रैक बने थे| मेरे प्रश्न का महेश भाई ने उत्तर दिया , यह बर्तन रखने की अलमारी है | मैंने कहा पर रैक तो ऊपर काऊंटर पर भी लग सकते थे , तो यह अलग से अलमारी की क्या जरुरत? महेश भाई ने शांत भाव से उत्तर दिया ताकि बर्तनों का पानी इसी में गिर जाये, देखो अलमारी के नीचे पानी निकलने का छेद भी बना है| मैं अभी तक बिजली के उल्टे स्विच की महिमा ही समझ नही पाया था, अब यह एक नया शगूफा| दरअसल जिस अपार्टमेंट में हम रूके थे वहाँ तकरीबन हर महीने नये लोग आते रहते थे एवं पुराने लोग जाते रहते थे| इस आवागमन की अवस्था को बेंच पर आना या बेंच से बाहर जाना कहते हैं| बेंच का तत्वज्ञान बड़ा सीधा सा है| हिंदुस्तान से कंप्यूटर प्रोग्रामर्स को अमेरिकी कंपनियाँ (body shoppers or head hunters) H1B वीसा पर बुलाती हैं अपना स्थायी कर्मचारी दर्शा कर, जो निश्चित अवधि के प्रोजेक्टस पर दूसरी कंपनीयों में काम करते हैं| दो प्रोजेक्टस के बीच की अवस्था, या फिर नये H1B रंगरूट को पहला प्रोजेक्ट मिलने से पहले की अवधि बेंच पीरीयड कहलाती है| यह एक तरह से अघोषित बेरोजगारी है जिसमें हर बाडीशापिंग कंपनी के कायदे कानून उसकी सुविधा के अनुसार बने हैं| कोई कंपनी बिना कोई भत्ता दिये ६-७ लोगों को एक ही अपार्टमेंट में ठूंसकर रखती है| हफ्ते भर का राशन दे दिया जाता है और तब तक पूरी तनख्वाह नहीं मिलती जब तक बेंच पीरीयड खत्म न हो जाये| इस गोरखधंधे का खुलासा आगे के अध्यायों में विस्तार से करूँगा, यहाँ सिर्फ ईतना ही जोड़ूँगा कि मैं इस कंपनी में पहले से तसल्लीबख्श हो कर आया था| मुझे पता चल गया था कि मेरे कुछ और मित्र भी इसी कंपनी के सौजन्य से अमेरिका पधारे हैं या आने वाले हैं| बाद में कंपनी के काम के तौर तरीके देखने और कंपनी के मालिकों से मिलने के बाद यह यकीन हो गया कि मेरा कंपनी पर भरोसा सही निकला| पर गेस्ट हाउस में एक हफ्ते में ही महेश भाई के तथाकथित अनुभव का पोस्टमार्टम हो गया| श्री सत्यनारायण उर्फ सत्या पीट्सबर्ग से बेंच पर गेस्ट हाउस में पधारे| वे अमेरिका प्रवास के मात्र चार माह के अनुभवी थे उस पर से ड्राईविंग लाईसेंसधारी भी नही थे अतः महेश भाई की नजर में तुच्छ प्राणी थे| दही-चावल-टमाटर का भोज तो वे बिना शिकवा शिकायत के उदरस्थ कर गये पर हमें बर्तन साफ करते देख कर खुद को रोक नही पाये और जिज्ञासु होकर पूछ बैठे कि हमें डिश वाशर से क्या एलर्जी है? मैंने पूछा कि यह डिश वाशर किस चिड़िया का नाम है तो उन्होंने बर्तन रखने की अलमारी के असली गुणों का परिचय करा कर हम अज्ञानियों का उद्धार कर दिया| परंतु अब महेश भाई हम लोगों के निशाने पर आ चुके थे| जल्द पता चल गया कि महेश भाई के दही-चावल-टमाटर प्रेम का राज शाकाहार नही बल्कि निरि कँजूसियत है| महेश भाई वास्तव में टीसीएस (एक नामचीन भारतीय बाडी शापिंग फर्म) से फरारी काट रहे थे| वे खुद अटलांटा में थे पर उनके प्राण उनकी खटारा कार जिसे वे केंटकी में छोड़ आए थे, में अटके थे|हर शनिवार की सुबह उनका एक ही शगल होता था, केंटकी फोन करके अपने दोस्तों से यह पूछना कि उनके पुराने मैनेजरों में कोई उनको,उनके बिना बताए भाग आने पर ढूढ तो नही रहा, और अपने दोस्तो से चिरौरी करना कि अटलांटा घूमने आ जाओ| वजह साफ थी, पाँच सौ डालर की कार को बिना नौसौ का भाड़ा खर्च किए अटलाँटा मँगाने का इससे सस्ता तरीका नही हो सकता था| महेश भाई ने बचत के अनोखे तरीके ईजाद कर रखे थे| दो महीने से पहले बाल कटवाने नहीं जाते थे| अपनी कृपण मित्र मंडली के सौजन्य से हर बार ऐसी हेयर कटिंग सैलून का पता लगा लेते थे जहाँ नये कारीगरों को प्रशिक्षण के लिए माडलों की जरूरत होती थी| महेश भाई हमेशा ऐसी जगह सहर्ष माडल बनने को तैयार हो जाते थे, क्योंकि वहाँ बाल काटने के चौथाई पैसे पड़ते थे| तभी वह हर बार नयी से नयी हैरतअंगेज हेयर स्टाईल में नजर आते थे, भले ही इसी वजह से हमारे कंपनी मालिक नीरज साहब उन्हें उस हफ्ते कहीं व्यक्तिगत साक्षात्कार पर भेजने से हजार बार क्यों न सोंचे|

हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं
सप्ताहाँत पर महेश भाई को एक मित्र मोहन ने अपार्टमेंट शेयर करने का प्रस्ताव दिया| मोहन ने मुझे भी साथ ले लिया| अपार्टमेंट खोज के दौरान महेश भाई खासतौर से हर अपार्टमेंट काम्पलेक्स का स्विमिंग पूल देखने का आग्रह जरूर करते थे| मोहन को उनका स्विमिंग पूल से अतिशय प्रेम हजम नहीं हो रहा था| एक और बात थी कि अक्सर अपार्टमेंट पसंद आने के बाद मोहन भाई स्विमिंग पूल देख कर ही अपार्टमेंट नापसंद कर देते थे| झल्लाकर मोहन को पूछना पड़ा कि आखिर स्विमिंग पूल से महेश को क्या शिकवा है? बात बड़ी दिलचस्प निकली| दरअसल महेश भाई ध्यान दे रहे थे कि आसपास अश्वेतों की आबादी कितनी है| चूँकि वर्णभेद संज्ञेय अपराध है, अतः प्रबंधतंत्र से सीधे नही पूछा जा सकता था कि वहाँ किस तरह के लोग रहते हैं? इसलिए महेश भाई ने स्विमिंग पूल के मुआयने के बहाने अश्वेतों की आबादी का अनुपात निकलाने का विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया था| यह पता चलने पर मोहन ने महेश भाई को लंबा चौड़ा भाषण पिला दिया, गाँधी जी तक को बहस में घसीट लिया गया| पर महेश भाई टस से मस नहीं हो रहे थे| बहुत घिसने पर महेश भाई ने बताया कि अश्वेतों से उन्हें कोई दुराग्रह नहीं है ,बल्कि पूर्व में उनके साथ हुई एक दुर्घटना इस एलर्जी का कारण है| दरअसल जैसे लँगड़े को लँगड़ा कहना गलत है वैसे ही काले को काला कहना| चुँनाचे देशी बिरादरी अश्वेतों को आपसी बातचीत में कल्लू कहकर बुलाती है| पर धीरे धीरे यहाँ के कल्लुओं को पता चल गया है कि कल्लू का मतलब क्या होता है| बल्कि उन लोगों ने सभी प्रसिद्ध भाषाओं में कल्लू का मतलब सीख रखा है| पर महेश भाई को कल्लुओं के ज्ञान की सीमा का पता न्यूयार्क यात्रा में चला| वे अपने बचपन के दोस्त के साथ घूम रहे थे, जिसका नाम दुर्योग से कल्लू था| महेश भाई ने टाईम्स स्कवायर पर दोस्त को जोर से पुकारा और पास खड़े चार अश्वेतों को ईतना बुरा लगा कि उन्होने महेश भाई को खदेड़ लिया| वह दिन है और आजका दिन है महेश भाई एक ही गाना गाते हैं "जिस गली में रहे कलवा,उस गली से हमें तो गुजरना नहीं|"

श्री सत्यनारायण कथा
एक दो हफ्ते बाद प्रोजेक्ट मिल गया और मैं सत्या भाई के साथ कुछ माह के लिए रुम पार्टनर बन गया| सत्यनरायण जी ने बहुत से काम अपने अनुभव से आसान कर दिये| अब मैं भी एक अदद क्रेडिटकार्डधारी था| सत्या भाई शास्त्रीय संगीत प्रेमी थे| मेरे पास कुछ गिनी चुनी आडियो सीडी थीँ और उनको कोई भी खास पसंद नही थी| एक दिन मैं ईंडियन ग्रोसरी से दलेर मेंहदी का तुनक तुनक तुन उठा लाया| वह उनको कुछ ज्यादा ही भा गया| हलांकि उस भलेमानुस को लुँगी में कुछ तमिलियाना अँदाज में तुनक तुनक तुन गाते देखना कम रोचक नही था| एक दिन सवेरे बाथरुम में नहाते हुए सत्या भाई बाथटब में ढ़ह गये| कारण था नहाते हुए भाँगड़ा करने की बचकानी कोशिश|

मोनिका को गुस्सा क्यों आया?
यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है| घटना की संवेदनशीलता को मद्देनजर रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों (तीसरी पात्रा से अब संपर्क नही है) से इसे अपनी किताब में शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है| बात मेरे पहली कार खरीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका जिक्र इस अध्याय में ही उचित होगा| मेरे ईंजीनीयरिंग कालेज में साथ पढे पाँच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल, हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आये| कंपनी के गेस्ट हाउस का फोन नंबर, ईंजीनीयरिंग कालेज में पढे अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था| प्रायः सभी मित्र नये आने वाले दोस्तों को फोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और जरूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे| मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था| एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती (soti) जी गेस्ट हाऊस में पधारे| सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं| उस सप्ताहाँत पर मैं गेस्ट हाऊस गया और उन्हें लेकर अपनी कार से अटलाँटा भ्रमण पर निकल गया| उसी सप्ताह गेस्ट हाऊस में दो और नये प्राणी आये थे, एक बंदा जिसका मुझे नाम याद नही और एक बंदी मोनिका| उन दोनों से हम लोगों ने जाते हुए पूछ लिया था कि उन्हें ईंडियन ग्रोसरी से कुछ मंगाना तो नहीं| शाम को मैनें सोती जी को गेस्ट हाऊस वापस छोड़ा और अपने अपार्टमेंट को चल दिया| मेरे रूम पार्टनर सत्यनारायण स्वामी ने बताया कि मेरे लिए किन्हीं गोस्वामी का फोन था| गोस्वामी जी भी मेरे वरिष्ठ सहपाठी हैं और श्रीमान सोती के बैचमेट हैं| गोस्वामी जी बहुत ही मिलनसार एवं विनोदी स्वभाव के हैँ| गोस्वामी जी से हुआ वार्तालाप प्रस्तुत है
मैः गुरू जी, नमस्कार|
गोस्वामी जीः नमस्कार प्रभू, क्या गुरू खुद भी घूमते रहते हो और हमारे सोती जी को भी अवारागर्दी की आदत डलवा रहे हो|
मैः अरे गोस्वामी जी सरकार, अब अपने मित्र भारत से नये नये आते हैं, पास में कार तो होती नहीं, तो थोड़ी सेवा ही सही| सोती जी को शापिंग कराने ले गया था|
गोस्वामी जीः अच्छा अच्छा| यार पर एक बात बता , गेस्ट हाऊस में भाभीजी भी साथ आयी हैं क्या ? और क्या भाभी बहुत तेजतर्राट हैं या आज उनका सोती से सवेरे सवेरे झगड़ा हूआ था?
मैः भाभीजी? तेजतर्राट? अरे गुरूदेव, सोती साहब तो अकेले आयें हैं, भाभी बाद में आयेंगी| आपको किसने कह दिया कि उनका कोई झगड़ा हुआ है?
गोस्वामी जीः यार लगता है कुछ लोचा हो गया है| कुछ समझ नहीं आ रहा| मैनें सवेरे गेस्ट हाउस सोती को फोन लगाया था| सोती तो मिला नहीं, फोन पर किसी महिला की आवाज आयी| मैं समझा कि शायद सोती भारत से भाभीजी को साथ लाया है| मैंने नमस्ते की और बताया कि गेस्ट हाऊस का नंबर मैंने तुझसे लिया है|
मैः फिर?
गोस्वामी जीः मैनें उन मोहतरमा से पूछा कि "सोती किधर है"? पर इतना पूछते ही वह भड़क गईं, कहने लगी कि आप को तमीज नहीं है| आप महिलाओं से ऊलजलूल सवाल पूछते हैं , आपको शर्म आनी चाहिए| यह कहकर उन मोहतरमा ने फोन ही पटक दिया| अब यार तू ही बता , मैनें कौन सा ऊलजलूल सवाल पूछा?
मैं भी पशोपेश में पड़ गया कि गोस्वामी जी से ऐसी कौन सी खता हो गई जो मोनिका जी क्रूद्ध हो गईं| चूंकि मोनिका जी अगले ही दिन किसी दूसरे प्रांत चली गयीं, अतः उनसे संपर्क नही हो सका| हलाँकि बाद में जब यह वृतांत अन्य मित्रों को बताया गया तो वह सब के सब हँस हँस के दोहरे हो गये| उनके जवाब "जाकी रही भावना जैसी, प्रश्न का अर्थ समझे तिन तैसी" ने गुत्थी सुलझा दी| अफसोस कि मोनिका जी को हम यह स्पष्टीकरण नहीं दे सके| यादि आपको मोनिका जी कहीं मिले तो आप उन्हें बता दीजिएगा कि गोस्वामी जी ने तो उनसे सिर्फ अपने मित्र सोती जी का ठिकाना पूछा था|

अध्याय २: पहली हवाई यात्रा

फन्ने खाँ मत बनो
शुभचिंतको की राय थी कि अमेरिका जाने से पहले कार चलाना सीख लेना फायदे में रहेगा| हलाँकि वहाँ कार चलाने का ढंग बिल्कुल अलग है पर कम से कम स्टीयरिंग पकड़ने का शऊर तो होना ही चाहिए| अपने परिवार मे किसी ने पिछली सात पुश्तों में भी कार नही खरीदी है, अतः एक कारड्राईविंग स्कूल में जाकर ट्रेनिंग ली| ट्रेनिंग सेंटर के अनुभव से कह सकता हूँ कि ज्यादातर रईस अपने किसी रिश्तेदार या ड्राईवर से कार चलाना सीखते हैं, इसका मजेदार नतीजा बाद में मैने अमेरिका में देखा| इन ट्रेनिंग स्कूल में आने वाले ज्यादातर लड़के ड्राईवर की नौकरी करने के लिए सीखने आते हैं| ट्रेनर कोई खान साहब थे| बेचारे लड़के खान साहब से इतनी चपत खाते थे कि पूछिए मत| खान साहब हर गलती पर उनके सर के पीछे जोरदार चपत रसीद करते थे इस जुमले के साथ "ससरऊ ,कायदे से सीखो वर्ना मालिक दो दिन में निकाल बाहर करेगा|" पर खान साहब ने मुझे कानपुर में ही एक्जिट रैंप, हाईवे मर्जिंग वगैरह के बारे में बता दिया था यह बात दीगर है कि उन्होनें खुद कभी हिंदुस्तान से बाहर कदम नहीं रखा था|एक दिन मजेदार वाक्या हुआ| मेरे ट्रेनिंग का आखिरी दिन था| खान साहब ने मुझसे खाली सड़क पर कार तेज स्पीड में चलवा कर देखी और तारीफ की कि तेज स्पीड में भी कार लहराई नहीं| लौटते समय एक लड़का कार चला रहा था| बेचारे ने खाली सड़क देख कर जोश में कार कुछ तेज भगा दी और तभी उसके सर के पीछे जोर की टीप पड़ी| खान साहब गुर्रा रहे थे " ज्यादा फन्ने खाँ बनने की कोशिश न करो , तुम भी क्या इनके साथ अमेरिका जा रहे हो जो हवा मे कार उड़ा रहे हो?"

तुम्हारा एयरकंडीशनर उखड़वा दूँ क्या?
विदेश जाने से पहले ईनकमटैक्स क्लीयरेंस लेना था| मेरी पहली कम्पनी में होने वाली ईनकम टैक्स के काबिल नहीं थी पर एयरपोर्ट पर ईमीग्रेशन काउँटर के यमदूतों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता| ईनकमटैक्स आफिस से कोई कागज निकलवाना हो तो कोई न कोई जुगाड़ जरूर होना चाहिए| मैं एक इनकम टैक्स कमिश्नर का सिफारिशी पत्र लेकर पहुँच गया| कानपुर की भाषा में इसे जैक लगाना (जैक, जो पंचर कार को जमीन से ऊपर उठाने के काम आता है) कहते है| कमिश्नर साहब की चिठ्ठी लेकर मैं उस अधिकारी (शायद संपत्ति अधिकारी) के पास पहुँचा जिसके पास पूरी ईमारत की देखभाल का जिम्मा था| उन जनाब ने कमिश्नर साहब की चिठ्ठी एक चपरासी को सुपुर्द की और मुझे उसके साथ भेज दिया हर संबद्ध अधिकारी/लिपिक से फार्म पर साईन करवाने | एक क्लीयरेंस के लिए इतने सारे अधिकारियों की चिड़िया फार्म पर बैठाने की लालफीताशाही| हर अधिकारी की डेस्क से मेरा निंरकुश फार्म निकल गया पर आखिर में एक धुरंधर लिपिक टकरा ही गया| चपरासी को दरकिनार कर उसने मुझसे कोई ऐसा फार्म माँग लिया जो मेरे पास नही था| घूस खाने के लिए ही इस तरह की गैरजरूरी शासकीय बाध्यताऐं खड़ी की जाती है हमारे समाजवादी दुर्गों में| चपरासी ने उस लिपिक को ईशारा किया कि फार्म के साथ कमिश्नर साहब का सिफारिशी जैक लगा है पर वह लिपिक फच्चर लगाने पर तुला रहा| मजबूर होकर चपरासी उस लिपिक से कहा साहब, आप बड़े साहब (संपत्ति अधिकारी) मिल कर उन्हीं को समझाओं| लिपिक तैश में आगे आगे और हम दोनों पीछे से संपत्ति अधिकारी के कमरे में दाखिल हुए| संपत्ति अधिकारी ने प्रश्नवाचक नजरों से लिपिक की ओर देखा| आगे के संवाद इस प्रसंग का मनोरंजक पटाक्षेप हैं
संपत्ति अधिकारी: क्या हुआ?
लिपिकः साहब इनके (मेरी तरफ ईशारा करके) फार्म में फलाना दस्तावेज नहीं लगा है|
संपत्ति अधिकारी: तो?
लिपिक: साहब वह दस्तावेज जरूरी है|
संपत्ति अधिकारी: कमिश्नर साहब की सिफारिशी चिठ्ठी की भी कुछ ईज्जत है कि नहीं?
लिपिक: साहब, उनकी चिठ्ठी सिर-माथे पर बरसात में खड़े होकर भी कोई बिना भीगे कैसे जा सकता है? (ईनकमटैक्स आफिस से कोई बिना सुविधाशुल्क दिये कैसे जा सकता है?)
संपत्ति अधिकारी: तुम्हारे कमरे से एयरकंडीशनर उखड़वा दूँ क्या?
लिपिक ने इस ब्रम्हास्त्र के चलने पर बिना एक शब्द बोले हस्ताक्षर कर दिए| ठंडी हवा का सुख खोने का डर लालफीताशाही अकड़ पर भारी पड़ा|
कनपुरिया चला एनआरआई बनने
लुफ्थांसा की फ्लाईट से अटलांटा जाना था| दिल्ली तक परिवार छोड़ने आया था| पहली बार विदेश जाने का अनुभव भी आम की तरह खट्टा मीठा होता है| परिवार से विछोह सालता है| नये देश के अनजाने बिंब मन में घुमड़ते हैं कि जो कुछ अब तक सिर्फ तस्वीरों में देखा है वह साकार होने जा रहा है| एक अजीब सी अनिश्चितता परेशान करती है कि पहले खुद को बाद में परिवार को एकदम अनजानी धरती पर स्थापित करना है| यह सब रोमांचक भी है और कठिन भी| वह सब याद करने पर एक फिल्म का डायलाग याद आता है, A League Of Their Own में महिला बेसबालकोच बने टाम हैंक्स अपनी मुश्किलों पर आँसू बहाती एक लड़की पर चिल्लाते हैं कि "अगर यह खेल मुश्किल न होता तो हर कोई इसका खिलाड़ी होता | फिर मुशकिलों पर आँसू क्यों बहाना?" सच भी है जब दूसरे छोर पर सुनहरे भविष्य की किरणें दिखती हैं तो न जाने कहाँ से हर मुश्किल हल करने की जीवटता आ जाती है| खालिस कनपुरिया को अच्छा खासा एनआरआई बनते देर नहीं लगती|

प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?
दिल्ली के ईंदिरा गाँधी एयरपोर्ट पर औपचारिकताऐं निपटाते हुए एक मजेदार वाक्या याद आ गया| लखनऊ में साथ में एक अनिल भाई साथ में काम करते थे| अनिल को हमारे सब साथी प्यार से गंजा कहते थे क्योकि वह बहुत छोटे बाल रखता था| खैर हमारा प्यारा गंजा विश्व बैंक के गोमती प्रोजेक्ट पर हमारी कंपनी की तरफ से कुछ काम में लगा था| प्रोजेक्ट मैनेजर को दिल्ली में प्रोजेक्ट रिपोर्ट दिखानी थी| प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो गंजू भाई ने बड़ी धाँसू बना दी| पर प्रोजेक्ट मैनेजर में प्रोजेक्ट कमेटी के सवालों की बौछार और कंप्यूटर पर प्रिजेक्ट रिपोर्ट को एक साथ चलाने का माद्दा नहीं था, चुनाँचे उसने गंजे को दिल्ली साथ चलने का हुक्म तामील कर दिया| गंजा बाराबंकी का रहने वाला था और मेरी तरह उसने भी ऐरोप्लेन को या तो तस्वीरों में देखा था या टीवी पर | खैर जनाब अपने प्रोजेक्ट मैनेजर के साथ दिल्ली की फ्लाईट पर सवार हो गये| गंजू भाई बाकि यूपीवालों की तरह पानमसाले के शौकीन थें और हवाई यात्रा में भी मसाला मुँह में दबाये हुए थे| उन्होनें सोचा कि मौका पाकर हवाई जहाज के शौचालय में पीक थूक देंगे| पर कुछ देर में नींद लग गयी| आधे घंटे बाद नींद खुली तो आदतन पीक नीचे थूकने के लिए खिड़की खोलने की नाकामयाब कोशिश की| खिड़की नहीं खुली तो ताव में पीक पिच्च से पाँव के नीचे ही थूक दी| दरअसल गहरी नींद से जागने के बाद गंजू भाई भूल गये थे कि वह दिल्ली तशरीफ ले जाये जा रहे हैं, उनको गफलत थी कि वह बाराबंकी जाने की बस पर सवार हैं| बगल वाले यात्रीयों के चिल्लपों मचाने पर गंजू भाई उनसे बाराबँकी वाले अँदाज में भिड़ गये| इस धमाल के बीच परिचारिका (ऍयरहोस्टेस) आ गई और पीक देख कर गंजू भाई की ओर उसने भृकुटी तानकर पूछा कि यह क्या है? गंजू भाई अभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ थे कि यह बस में लेडी कंडक्टर कहाँ से आ गई? उन्होनें बड़े भोलेपन से पूछा क्या बाराबंकी आ गया? एयरहोस्टेस ने कर्कश स्वर में जवाबी सवाल किया "प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?". अब मामला गंजू भाई की समझ में आ गया था, आगे क्या हुआ यह बताना गंजू भाई की तौहीन होगी|

यह लेमन वाटर क्या होता है?
मैनें लुफ्थांसा की फ्लाईट में दो नादानियाँ की थीं| पहले तो जब ऍयरहोस्टेस ने मुस्कुराते हुए ईयरफोन गिया तो मैंने भी मुस्कुराते हुए यह सोचकर वापस कर दिया कि भला विदेशी संगीत सुनकर क्या करूँगा| यह देर से पता चला कि प्लेन पर फिल्में देखने का भी ईंतजाम होता है| फिल्म पँद्रह मिनट की निकल गई तब जाकर पता चला कि ऍयरहोस्टेस को बुलाने के लिए अपने हाथ के पास लगा बटन दबाना पर्याप्त है| दूसरी नादानी खाने के बाद काफी लेकर की| अपने उत्तर भारत में काफी दूध वगैरह डालकर मीठी पीते है| अंग्रेजो की काफी एकदम काली और जहर के मानिंद कड़वी लगी| कुछ कुछ ऐसी ही काफी दक्षिण भारत में भी प्रचलित है| खैर ऍयरहोस्टेस से लेमन वाटर माँगा| ऍयरहोस्टेस ने हैरत जताई कि उसने कभी लेमन वाटर के बारे में नहीं सुना| बाद में वह सादे पानी में कटा नीबू डालकर ले आयी| अब इस तरह का लेमन वाटर तो अपने यहाँ होटल में खाने के बाद चिकने हाथ साफ करने में उपयोग होता है जिसे कभी कभी कोई देहाती नादानी में पी भी जाता है, यहाँ मैं देहाती बन गया था| पता ही नही था कि विदेशों में लेमन वाटर लेमोनेड के नाम से जाना जाता है| हो सकता है कि ऍयरहोस्टेस को नही पता होगा अतः सदाशयता में वह सादे पानी में कटा नीबू डालकर ले आयी| पर शायद एयरलाईन के कर्मचारियों को यह ट्रेनिंग तो दी जाती है कि दुनिया के अलग अलग हिस्सों में कुछ खाद्य पदार्थ अलग नाम से भी प्रचलित हैं| ऐसें मामलों में यह गोरे लोग विशुद्ध घोंघाबसंत बनकर क्या रेशियल प्रोफाईलिंग नहीं करते? सोचिऐ अगर ऍयरईंडिया की ऍयरहोस्टेस किसी अमेरिकी के एगप्लाँट माँगने पर अँडो पर मूली के पत्ते सजाकर पेश करदे तो क्या होगा?