September 09, 2005

अध्याय ९: जीरो मतलब शून्य!

एकबार फिर फजीहत से बचने के लिए एनआरआई तमगा चमकाना पड़ा। हुआ कुछ यूँ कि लखनऊ फोन करना था। वर्ष २००० में मोबाईल,डब्लयूएलएल,आरआईएल और एसएमएस सरीखी तकनीकें ईजाद नही हुई थीं। पीसीओ सर्वसुलभ थे। मैं सीधे पीसीओ पहुँचा और लखनऊ का नँबर मिलाने लगा। दोतीन बार प्रयास के बाद भी नँबर नही लग रहा था। सँचालिका एक मध्यमवर्गीय घरेलू सी दिखने वाली नवयुवती थी। शायद सँचालक कही तशरीफ ले गये थे और अपनी बहन को बैठाल गये थे। खैर उस कन्या ने पूछा कि आपका नँबर तो सही है। मेरे हिसाब से तो सही होना चाहिए था, अभी पिछले ही महीने तो अमेरिका से मिलाया था। जब एक बार फिर मिलाने लगा तो कन्या ने टोका ,
कन्याः "आप क्या कर रहे हैं?"
मैः लखनऊ का नँबर मिला रहा हूँ।
कन्याःवह तो ठीक है पर एसटीडी कोड क्या मिला रहे हैं?
मैः ५२२ , क्यों यह नही है क्या?
कन्याः५२२ तो ठीक है पर जीरो क्यो नही लगा रहे?
मैः जीरो
कन्याःजीरो मतलब शून्य!
मैः अरे, मुझे पता है जीरो मतलब शून्य।
कन्याः लेकिन आप ५२२ के पहले शून्य क्यो नही लगा रहे? क्या पहली बार एसटीडी डायल किया है?
दरअसल अमेरिका में आदत पड़ गयी थी ०११‍ ९१ ५२२ नँबर मिलाने की, अब यहाँ ०११‍ ९१ टपका कर शेष नँबर मिला रहा था।
कन्या को अब कुछ शक हो चला था कि मैं शायद घाटमपुर सरीखे किसी देहात से उठकर सीधे शहर पहुँच गया हूँ और शायद जिंदगी में पहली बार एसटीडी मिला रहा हूँ। अब तक बाकी ग्राहको की दिलचस्पी भी मुझमें बढ चली थी। सबकी तिर्यक दृष्टि से स्पष्ट था कि मैं वहाँ एक नमूना बनने जा रहा था, जो शक्लोसूरत और हावभाव से तो पढा लिखा दिखता था पर उस नमूने को एसटीडी करने जैसे सामान्य काम की भी तमीज नही थी। मुझे याद आ गया कि करीब डेढ साल पहले एसटीडी मिलाने से पहले जीरो लगाने की आदत अमेरिका में आईएसडी मिलाते मिलाते छूट गयी थी और यहाँ मैंने सिर्फ आईएसडी कोड हटाकर जीरो न लगाने की नादानी कर डाली थी। खाँमखा बताना पढा कि मैं जीरो मतलब शून्य लगाना क्यों भूल रहा था। अब उस षोडशी की दिलचस्पी यह जानने में पैदा हो गई थी कि मैनें कित्ते पैसे देकर अमेरिका में नौकरी हासिल की थी। निम्न मध्यवर्ग जिसे अमेरिका में स्किल्ड लेबर्स कहते हैं, अपने खेत खलिहान बेचकर भी खाड़ी या लंदन में काम पाने की फिराक में रहता है। यह चलन वैसे पँजाब में कुछ ज्यादा है। डाटकाम के बुलबुले अभी दिल्ली बँबई से कानपुर सरीखे शहरो तक नही पहुँचे थे इसलिए किसी भी कनपुरिए को किसी ऐसे एनआरआई कनपुरिया जो अभी भी कानपुर में एलएमएल वेस्पा पर घूम रहा हो देख कर ताज्जुब करना स्वभाविक ही है।

आपकी स्कूटर पर नँबर तो यूपी का है?
अमेरिका में ट्रैफिक सिगनल स्वचालित हैं। इसिलिए यहाँ भारत की तरह चौराहे के बीच न तो मुच्छाड़ियल ट्रैफिक पुलिसवाला दिखता है न उसके के खड़े होने के लिए बनी छतरी। कभी कभी किसी समारोह वगैरह में या फिर सड़क निर्माण की दशा में ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए आम पुलिसवाले या पुलिसवालियाँ ही ट्रैफिक नियंत्रित करते हैं। पुलिसवालियाँ तो खैर डिंपल कपाड़िया जैसी दिखती ही हैं, पुलिसवाले भी कम स्मार्ट नही दिखते। केडीगुरू का मानना है कि इन पुलिसवालो की भर्ती के पहले ब्यूटी कांटेस्ट जरूर होता होगा। मैने भी आजतक एक भी तोंदियल पुलिसवाला नही देखा अमेरिका में। खैर फोटोग्रफी का नया शौक चर्राया था, जेब में कैमरा था और हैलट हास्पिटल के चौराहे पर सफेद वर्दी में एक ट्रैफिक हवलदार को देखकर उसकी फोटो लेने की सूझी। पर यह उतना आसान नही निकला जितना सोचा था। ट्रैफिक हवलदार बड़ा नखरीला निकला। पहले पँद्रह मिनट तक उसे यही शक बना रहा कि मैं शायद किसी मैगजीन या अखबार से हूँ और किसी लेख वगैरह में पुलिस की बुराई करने के इरादे से उस हवलदार की फोटो अपने लेख के लिए उपयोग कर लूँगा। वैसे पुलिसवालो की छवि कैसी है यह बताने की जरूरत नही पर उस वक्त वह दरोगा वाकई काम ही कर रहा था वसूली नहीं। पर उसे यह कतई हजम नही हो रहा था कि कोई भलामानुष अपने व्यक्तिगत एलबम के लिए किसी मुच्छाड़ियल पुलिसवाले की फोटो भला क्यों लेना चाहेगा। फिर से अमेरिका का तमगा चमकाना पड़ा। पर जो सवाल उस दरोगा ने किया उसकी उम्मीद बिल्कुल नही थी। उसने पूछा "आप कह रहे हैं कि आप अमेरिका में रहते हैं पर आपकी स्कूटर पर नँबर तो यूपी का है?" मैं सोच रहा था कि पुलिसवालो की भर्ती के पहले जनरलनालेज का टेस्ट नही होता क्या?

डा. जैन
एक दिन सोचा कि अपने इंजीनियरिंग कालेज के दर्शन ही कर लिये जायें। थोड़ी ही देर में एचबीटीआई के निदेशक के केबिन के बाहर था। उन दिनों डा. वी के जैन निदेशक थे। केबिन के बाहर उनके सचिव और एक दो क्लर्क बैठे थे। डा. जैन के बारे में पूछते ही रटा रटाया जवाब मिला "डायरेक्टर साहब अभी जरूरी मीटिंग कर रहे हैं , दो घँटे के बाद आइये।" पता नही इन क्लर्को की आदत होती है यह इन्हें निर्देश होतें है कि हर ऐरे गैरे को घुसने से रोकने के लिए मीटिंग का डँडा इस्तेमाल किया जाये। सचिव ने पूछ लिया "कहाँ से आये हैं", मैने जब डलास कहा तो उसने मुझे अँदर जाने का इशारा कर दिया। मतलब कि मीटिंग के दौरान नोएँट्री का बोर्ड सिर्फ स्वदेशियों के लिए ही होता है। डा. जैन अँदर किसी से बात ही कर रहे थे। देखते ही पहचान गये। हजारों विज्ञार्थियों के नाम और शक्ल याद रख सकने की उनकी क्षमता विलक्षण है। कुछ देर तक वे बड़ी आत्मीयता से हालचाल लेते रहे। तभी कुछ सचिव और एक दो प्रोफेसर जिन्हे मैं नहीं जानता था फाईले लिये अँदर आये। मैने चलने की अनुमति चाही तो डा. जैन ने मुझसे बैठे रहने को कहा। बाकी सबको बैठने को कहकर उन्होनें मेरा परिचय सबको यह कहकर दिया कि ये डलास से आये हैं , वही काम करते हैं। मैं अभी यही सोच रहा था कि डा. जैन ने मेरा परिचय एचबीटीआई के पूर्व छात्र के रूप में क्यों नही दिया। तभी डा. जैन मुझसे मुखातिब हुए और एक सवाल दाग दिया "अतुल, यह बताओ कि अगर मेरे पास दस लाख रूपये हो और मुझे एचबीटीआई के कंप्यूटर सेक्शन के लिए कंप्यूटर खरीदने हो तो मुझे दो विकल्पों में क्या चुनना चाहिए, पचास हजार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर या फिर पाँच पाँच लाख के दो एडवाँस वर्कस्टेशन। " मैनें सीधे बेलौस राय जाहिर कर दी "पचास हजार के बीस डेस्कटाप कंप्यूटर लेने चाहिए।" डा. जैन के सामने बैठी मँडली में से कुछ लोग कसमसाये और उनमे कोई कुछ बोलने को हुआ कि तभी डा. जैन ने अगला सवाल दागा "क्यों?" मैं सोच रहा था कि डा. जैन की आखिर मँशा क्या है और यह समिति किस बात की मीटिंग कर रही है। पर चूंकि मैं डा. जैन के भूतपूर्व छात्र की हैसियत से वहाँ गया था इसलिए मैने समग्र जवाब देना उचित समझा। मैने कहा "सर, अगर कोई मशीन या पुल डिजाईन का कोर्स नही चलाना है इनपर तो डेस्कटाप ही ठीक रहेंगे, जिन एप्लीकेशन पर हम काम करते हैं वही यहाँ सिखायी जानी चाहिए, जो अभी भी यहाँ नही हैं और उन एप्लीकेशन के लिए डेस्कटाप की क्षमता काफी है। उससे कम से कम एकबार में चालीस छात्रों का भला होगा। अगर आप दो कंप्यूटर ले लेंगे तो एकबार में ज्यादा से ज्यादा चार लोग ही उसे उपयोग कर सकेंगे। यह वर्कस्टेशन की क्षमता के साथ नाइंसाफी और पैसे की बर्बादी होगी।" डा. जैन ने मुड़कर बाकी लोगो पर कटाक्ष रूपी प्रश्न किया " सुना आपने, यह राय एक अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियर की है, यही राय मै दे रहा था तो आप सब मुझे बेवकूफ समज रहे थे और कह रहे थे कि मैं बाबा आदम के जमाने कि तकनीकी पर भारोसा कर रहा हूँ।" मैने वहाँ वाकयुद्ध छिड़ने से पहले फूटने में भलाई समझी। बाद मे पता चला कि अँदर बैठे लोग कंप्यूटर खरीद समिति के सदस्य थे और उन लोगो में खरीदे जाने वाले कंप्यूटरों की क्षमता को लेकर मतभेद थे। डा. जैन जानते थे कि उनकी व्यवहारिक सलाह को लोग दकियानूसी समझ रहे थे पर जब उसी सलाह पर अमेरिकी स्वीकृती का मुलम्मा चढ गया तो वह काम की बात हो गई।

पागल कौन?
रात में मेरे चाचाश्री का फोन आया। वे मिर्जापुर के पास किसी फैक्ट्री में सहायक जनरल मैनेजर हैं। चाचाश्री कानपुर न आ पाने का कारण बता रहे थे। कारण सुन कर सब हँस हँस कर दोहरे हो गये। चाचाश्री की फैक्ट्री में कोई गार्ड था सँतराम। किसी मानसिक परेशानी के चलते उसका दिमाग फिर गया और वह फैक्ट्री में तोड़फोड़ करने लगा। चाचाश्री ने सँतराम को दो चौकीदारो के साथ फैक्ट्री के डाक्टर का सिफारशी पत्र देकर राँची मानसिक चिकित्सालय ले जाकर भर्ती कराने का आदेश दिया। चाचाश्री ने दोनो को निर्देश दिया था कि राँची पहुँच कर वहाँ के डाक्टर से बात करवा दें। अगले रविवार को चाचाश्री को कानपुर आना था। पर न जाने क्यों दोनो चौकीदारो का राँची पहुँच कर कोई फोन नही आया। चाचाश्री दोनो चौकीदारों की गैरजिम्मेदारी को लानते भेजते हुऐ शनिवार को सो गये। रात में बँगले के दरवाजे की घँटी बजी। चाचाश्री ने लाईट खोल कर देखा तो सँतराम खड़ा था। चाची की चीख निकलते निकलते बची। चाचाश्री ने चाची को संयत रहने का ईशारा किया। चाचाश्री ने देखा सँतराम फिलहाल तो सामान्य लग रहा था। उसने चाचाश्री को हाथ जोड़कर नमस्कार भी किया। चाचाश्री ने उसे वहीं बैठने को कहा और खुद यथासंभव दिखने की कोशिश करते हुए उससे दस फुट दूर सोफे पर बैठ गये। अब पागल का क्या भरोसा , कहीं हमला ही कर दे। चाचाश्री सोच रहे थे कि शायद यह उन दोनो चौकीदारों से निगाह बचाकर भाग आया है और वे दोनो चौकीदार या तो इसे ढूड़ रहे होंगे या फिर मारे डर के वापस ही नही आये। उसी उधेड़बुन में चाचाश्री ने सँतराम से पूछा
चाचाश्रीः कहो सँतराम कैसे हो?
सँतरामः जी साहब, दया है आपकी।
चाचाश्रीः अकेले आये हो?
सँतरामः जी साहब।
चाचाश्रीः वह दोनो कहाँ हैं?
सँतरामः कौन साहब?
चाचाश्रीः अरे दोनो चौकीदार , जो तुम्हारे साथ राँची गये थे?
सँतरामः साहब, उन दोनो को मैं भर्ती करा आया।
चाचाश्री कुर्सी से उछलते हुए क्या!
सँतरामः जी साहब, कल भर्ती कराया था, अगली ट्रेन पकड़ कर मैं ड्यूटी पर टैम से वापस आ गया।
चाचाश्री ने सँतराम को चाय पिलाने के लिए इँतजार करने को कहकर दूसरे कमरे में फोन करने आ गये। चाची सँतराम पर निगाह रखे थीं। सँतराम बिल्कुल सामान्य दिख रहा था। चाचाश्री ने राँची मानसिक चिकित्सालय फोन मिलाया तो सुपरवाईजर ने बताया कि उनकी फैक्ट्री से एक चौकीदार दो पागलों को भर्ती करा गया है। भर्ती के दिन से दोनो ने बवाल मचा रखा है और रह रह कर दोनो आसमान सर पर उठा लेते हैं। चाचाश्री ने सुपरवाईजर को बड़ी मुश्किल से यकीन दिलाया कि उसने पागल को छोड़कर दो भलेमानुषों को भर्ती कर लिया है। चाचाश्री ने अबकी बार छः चौकीदारो को सँतराम के साथ राँची भेजा। इस बार सँतराम को भर्ती कराने में कोई बखेड़ा नही हुआ। पिछली बार गये दोनो चौकीदार वापस आते ही चाचाश्री के पैरो में लौटकर रोने लगे और दुहाई माँगने लगे कि आगे से उन्हे किसी पागल के साथ न भेजे। दोनो ने राँची की कहानी सुनायी। दोनो चौकीदारों के साथ सँतराम बिल्कुल मोम के पुतले की तरह शाँत बैठे बैठै राँची तक गया। दोनों ने उसे रिक्शे के बीच बैठाल कर स्टेशन से मानसिक चिकित्सालय ले जाने लगे। मानसिक चिकित्सालय का गेट पास आते ही सँतराम रिक्शे से कूदकर भागा और चिकित्सालय के अँदर घुस गया। उसे जो भी पहला डाक्टर दिखा उसके पैर पकड़ कर वह जोर जोर से रोने लगा। उसने चिल्ला चिल्ला कर कर कहा कि उसे दो पागलों ने घेर लिया है और उसे बाहर बहुत मार रहे हैं। यह सुनकर डाक्टर ने चार वार्ड ब्वाय बाहर भेजे जहाँ वाकई दोनो चौकीदार चिकित्सालय की ओर बदहवास से भागे आ रहे थे। वार्डब्वायज यही समझे कि दोनो वाकई पागल हैं और सँतराम को ढूड़ रहे हैं। दोनो चौकीदारों को जब्रदस्ती हवा में टाँग के डाक्टर के सामने लाया गया। दोनो खुद को छुड़ाने के लिए गुल गपाड़ा मचाये थे और सँतराम को पागल बता रहे थे। डाक्टर ने उन्हे डपट कर कहा कि हर पागल खुद को समझदार और दूसरों को पागल कहता है। यह सुनकर चौकीदार वार्डब्वायज को पागल बताने लगे। दोनो को बाँधने के लिए वार्डब्वायज को उन्हे थोड़ा बहुत पीटना भी पड़ा। ज्यादा हँगामा करने पर उन्हें बेहोशी के इंजेक्शन ठोंक दिये गये। सँतराम जी तो उन्हे शान से भर्ती कराकर मिर्जापुर चल दिये, पर वार्डब्वायज की पिटाई से उन बेचारे चौकीदारों के शरीर के सारे जोड़ खुल गये।