November 08, 2005

अध्याय १०: पिंक या ब्लू

चलो भाग चले पूरब की ओर
भारत से वापसी हुई तो डलास से भी रूखसत होने का समय आ चुका था। अगला कार्यक्षेत्र मिला फिलाडेल्फिया। अभी तक कुल मिलाकर अमेरिका में दक्षिणी प्रांतो में ही रहना बसना हुआ था। उत्तर पूर्व के प्रांतो को लेकर एक अज्ञात सा डर बैठा रहता था। दरअसल यह सारा डर बर्फ को लेकर महेश भाई और सत्यनारायण स्वामी सरीखे मित्रों ने पैदा किया था, जो बेबुनियाद भी नही था। सत्यनारायण अपने बर्फ पर कार फिसलने से हुई दुर्घटना और बर्फीले मौसम की मुश्किलों के हाल बता चुके थे। वहीं महेश भाई की तो जबरदस्त दुर्गति हुई थी। किसी भारत में रहने वाली मौसी से बतिया रहे थे महेश भाई। रिसेप्शन न मिलने की वजह से अपार्टमेंट के बाहर आ गये। अपार्टमेंट के पास एक रेल का ट्रेक था, वहाँ से जाती एक ट्रेन की आवाज सुनकर मौसी को शक हो गया कि महेश भाई किसी चाल या खोली में रहते हैं बिल्कुल वैसी ही जैसी भारत में रेलवे लाईन के पास कुँजड़ाबस्तियाँ होती हैं। महेशभाई मौसी की अफवाहप्रसारण क्षमता से भलीभाँति परिचित थे अतः उन्हे ठँडी हवा में ठिठुरते हुए भी यह समझाते रहे कि अमेरिका कि रेलवे लाईन के किनारे भारत की तरह कोई अवैध बस्तियाँ नहीं बसी होती। इस बीच हवा के झोंके से अपार्टमेंट का दरवाजा बँद हो गये और महेशभाई एक अदद बनियान पायजामे में कड़कती ठँड में सड़क पर। अपार्टमेंट आफिस भी रविवार की वजह से बँद। मेंटिनेंस वालो का नँबर याद नही। किसी योगी सरीखे दिखते महेशबाई चलदिये दो मिल दूर रहने वाले किसी दोस्त के यहाँ डाँडी यात्रा पर। रास्ते में अगर एक पुलिसवाला न मिलता तो शायद महेशभाई हमें अटंलाँटा मे न मिलते और हमें बर्तन रखने कि अलमारी के बारे में भी न पता चलता।
खैर हमारे पास फिलाडेल्फिया जाने के अलावा कोई विकल्प न नही था। दिंसबर का मौसम था और इस डलास से फिलाडेल्फिया पूरे सौलह सौ मील ड्राइव करना संभव नही था। इसलिए हवाई यात्रा करते हुए फिलाडेल्फिया को रूख किया। फिलाडेल्फिया में एक छोटे से उपशहर जिसे हम यहाँ सबर्ब कहते हैं, में काम करना और रहना था। जगह का नाम सुन कर विचित्र लगा "किंग आफ प्रशिया"। हवाई अड्डे पर किसी कर्मचारी से पूछा भी कि यह किंग आफ प्रशिया का नाम किस किंग पर पड़ा, पर सभी निरूत्तर थे। इतिहास खँगालने पर भी यही पता चला कि १८५१ में किसी सर्वेक्षणकर्ता ने किसी होटल पर किंग आफ प्रशिया लिखा देख कर पूरे कस्बे का नाम यही समझ लिया| अब वह होटल वाला खुद किंग था या प्रशिया से आया था, खुदा जाने।

बाँके बिहारी
किंग आफ प्रशिया में आने पर पता चला कि हमारे परिवार का अँतरराष्ट्रीयकरण होने जा रहा है। इसमें एक अमेरिकी शामिल हो जायेगा। इस नये मेहमान के आने की तैयारियाँ शुरू हो गई। एक ऐसे ही शनिवार को नये अमेरिकी के संभावित नाम पर विचार विमर्श चल रहा था। आजकल बच्चों के इतने क्लिष्ट नाम रखे जा रहे हैं जिनको अँग्रेजी में टाँगटिव्सटर्स की संज्ञा दी जा सकती है। उस पर तुर्रा यह कि कभी कभी खुद माँ बाप को पता नही होता कि नाम का मतलब क्या है। फिर कई बार एक देश में रखा नाम दूसरे देश में मुसीबत बन जाता है। कुछ अक्षरों का तो अमेरिकन अँग्रेजी में वजूद ही नही । खुद मेरे नाम में आने वाला "त" कभी ड कभी ट बना डालते हैं यहाँ लोग। मेरे एक मित्र वाजिद की तो शामत ही आ गई थी। बेचारे ने बड़े अरमान से अपने जिगर के टुकड़े का नाम फख्र रख दिया। पर हर मेहमान , हर रिश्तेदार उनकी बुद्दि पर तरस खाते हुए उन्हें बच्चे का नाम बदलने की सलाह देने लगा,लेकिन वाजिद भाई भी अपनी पसंद पर अड़े रहे। पर बच्चे ने स्कूल जाना शुरू करने और समझदार हो जाने पर गदर काट दी कि या तो हमारा नाम बदलो या हमारा स्कूल। देर से ही सही वाजिद भाई को बात समझ में आ गयी और तमाम अदालती सरकारी खर्चों के बाद फख्र मियाँ, सलीम उर्फ सैम बन गये। कुछ ऐसे ही संस्कृति के कीड़े ने हमें काटा और हमें सूझा कि अगर हमें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो हम उसका नाम बाँके बिहारी रखेंगे। न जाने क्यों श्रीमती जी को यह नागवार गुजरा। उनको केशव,माधव वगैरह नाम पुरातन पंथी लग रहे थे जब्कि बाँके नाम से गुँडेपन का अहसास हो रहा था। इस मुद्दे पर हमारे गंभीर मतभेद हो गये। अँततः यह समझौता हुआ कि बाँके नाम सिर्फ घर में प्यार से पुकारा जायेगा।

बच्चों की बरसात
नये मेहमान के लिए हम सपरिवार ट्वायसआरअस गये। यहाँ नवजात शिशुओं के लिए एक सेक्शन ही अलग बना होता है। वहाँ हमारे सरीखे कई परिवार खरीदारी में लगे थे। ऐसी ऐसी चीजे जो कभी न देखी न सुनी। हमें किंकर्तव्यविमूढ देख एक सहायिका ने पूछा कि क्या हम बेबीशावर की योजना बना रहे हैं। इस सवाल पर हम से ज्यादा हमारी बेटी चकित थी कि भला बच्चो की बरसात कैसे हो सकती है और अगर बच्चे बरसने लगे तो कैसा नजारा होगा। इस नये शब्द का मतलब भी जल्द समझ में आ गया, बेबी शावर बहुत कुछ उत्तर भारत में होने वाली गोद भराई की रस्म जैसा उत्सव होता है। पर यहाँ आपके घर अनचाहे या एक सरीखे दो तीन उपहार न आ जाये इसके लिए आप अपनी पसंद के किसी स्टोर में अपनी मरजी की उपहार सूची चुन कर उसे अपने मित्रों या रिशतेदारों में ईमेल से वितरित कर देते हैं। लोग उसमें से अपनि पसंद या सामर्थ्य के हिसाब से चुनाव करके भुगतान कर देते हैं और उत्सव वाले दिन सारे सामान आपके घर एकसाथ पहुँच जाते हैं। कुछ ऐसा ही शादी विवाह में भी होता है। अगर ऐसा भारत में भी होता तो हर नवविवाहित को छः घड़ियाँ , तीन आईसक्रीम सेट , बारह लंचबाक्स और बत्तीस थर्मसों का संग्रहालय न बनाना पड़े या फिर गुप्ताजी का गिफ्ट वर्माजी की लड़की की शादी में और वर्माजी का गिफ्ट मिसेज कटियार की सालगिरह में न टिकाना पड़ता।

बताओ डाक्टर ने क्या बताया?
कुछ सप्ताह बाद श्रीमती जी का स्वास्थय परीक्षण के दौरान अल्ट्रासाऊँड हो रहा था। अमेरिका में बेटे या बेटियों को लेकर मुझे कोई पूर्वाग्रह नही दिखा। हलाँकि अल्ट्रासाउँड में नर्स होने वाले बच्चे का लिंग बता सकती है पर बहुत से दंपत्ति इसे अँत तक नही जानना चाहते। पर बच्चे के मामले में कई विशेषाधिकार माँ को प्रदत्त हैं। यही अल्ट्रासाउँड में हुआ , नर्स ने श्रीमती जी से पूछा कि क्या वे जानना चाहेंगी कि होने वाले बच्चे का लिंग क्या है। मारे रोमांच के श्रीमती जी की गर्दन १८० डिग्री केकोण पर घूम गई। नर्स ने यह जानना चाहा कि क्या वे इस सूचना के अधिकार से मुझे भी वंचित रखना चाहेंगीं। पता नहीं क्यों उन्होने हाँ कर दी। फिर क्या था, नर्स ने श्रीमती जी की आँखे ढँक कर मुझे इशारे से बता दिया कि "Its a boy!"। अस्तपताल से बाहर आते ही श्रीमती जी प्रश्न था "बताओ डाक्टर ने क्या बताया?" मैने चुहलबाजी में बहाना टिका दिया कि आप तो रोमांच को रोमांच ही रखना चाहती है अतः इसे रहस्य ही रहने दें। पर उनके पास ब्रह्मास्त्र मौजूद था। उन्होंने दाँव फेका कि चूँकि अमेरिका में हमारे रिश्तेदार वगैरह न होने कि वजह से सारी खरीदारी हमें ही करनी होगी और वह भी शिशुआगमन से पहले इसलिए मुझे या तो उन्हें सच बता देना चाहिए या फिर दोहरी खरीदारी के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि लड़की और लड़के के कपड़े अलग अलग होते हैं।

प्रेटी वीमेन
अमेरिका में प्रसव की तैयारी बहुत ही विधिवत ढंग से होती है। बकायदा अस्तपताल में निशुल्क कक्षाऐं लगती हैं शिशुपालन की भी, और प्रसव कैसे होता है उसकी भी। कुछ दिन पहले अस्पताल में एक टूर भी कराया जाता है जिसमें यह बता दिया जाता है कि प्रसव वाले दिन किस रास्ते से आने है, मैटरनिटी वार्ड के लिए अलग लिफ्ट और अलग रास्ते की व्यवस्था होती है। यहाँ प्रसव में पति को उपस्थित रहने का विकल्प भी होता है और अगर शल्य चिकित्सा हो रही हो तो वह देखने का भी। मेरा विचार यह बना कि यह नियम भारत में बजाय विकल्प के आवश्यक कर देना चाहिये , बिना किसी धर्म के कठमुल्ले विचारों की परवाह किये बगैर। मुझे लगता है कि संस्कृति और धर्म के नाम पर स्त्रियों को प्रसवगृह में जूझते छोड़ अस्तपताल के बाहर चाय आमलेट उड़ाते हिंदुस्तानी पतियों को जब तक सृजन में होने वाली वेदना का साक्षात दर्शन नही होगा, उन्हें सृजन की पीड़ा का पता नहीं चलेगा। अगर एक बार यह हो जाये तो अँधाधुध बढती आबादी पर रोक लगाने की अक्ल भी आ जायेगी और दुर्गा , सीता का नाम ले लेकर कन्या भ्रूण के खून से हाथ रँगने से पहले हाथ भी काँपेंगे। हमारी श्रीमती जी को उनकी किसी मित्र ने भ्रामक सूचना दे दी कि उनका डाक्टर महाखड़ूस है। श्रीमती जी ने डाक्टर बदलने का आग्रह कर डाला। अभी तक मुझे डाक्टर ठीक ही लगा था। पूछताछ करने पता चला कि गलती श्रीमती जी की सहेली के पतिदेव श्रीमान दुरईस्वामी की थी। दुरईस्वामी के यहाँ भी नये मेहमान की तैयारी थी। उनके यहाँ आपरेशन होना निश्चित था। डाक्टर ने दुरईस्वामी से सलाह मशविरा करके सबकी सुविधानुसार आपरेशन का दिन तय करदिया। शाम को दुरईस्वामी ने भारत में अपने पिताश्री को फोन करके आपरेशन के बारे में बताया। अगले दिन सबेरे सबेरे दुरईस्वामी का फोन बजा। यह उनके पिताश्री थे जो किसी ज्योतिषी के यहाँ यह पता कर आये थे कि दुरईस्वामी के तय की तारीख पर पैदा हुऐ बच्चे की कुँडली के सातवें घर मे राहु की धमाचौकड़ी मचनी तय है। अब दुरईस्वामी ने आफिस के आकस्मिक टूर का बहाना बना कर डाक्टर को बमुश्किल आपरेशन को एकदिन आगे खिसकाने पर राजी किया। अगले दिन फिर सबेरे सबेरे दुरईस्वामी का फोन बजा। पिताश्री ही थे फोन पर। दरअसल पिछलीबार ज्योतिषी ने गलती से भारतीय समयानुसार कुँडली विचार दी थी। अब दुरईस्वामी द्वारा तय नयी तारीख पर अगर बच्चे का जन्म होता तो बच्चे की कुँडली के पाँचवे घर मे चँद्रमा और केतू की बीच मारामारी होने वाली थी। बेचारे दुरईस्वामी के एक तरफ डाक्टर नाम का कुँआ था जो फिर तारीख बदलने की गुजारिश पर फट पड़ता और दूसरी तरफ पिताश्रीरूपी खाई थी जो तारीख न बदलवाने पर दुरईस्वामी को अपनी जायदाद से बेदखल करने पर अमादा थे। दुरईस्वामी ने कुँऐ में कूदना मुनासिब समझा और डाक्टर से उलझ गये। डाक्टर खूब चीखा चिल्लाया पर दुरई की कुँडली के आगे उसकी एक न चली। उसने मन मारकर फिर से अपने व्यस्त कैलेँडर से छेड़छाड़ की और नयी तारीख पर आपरेशन किया।
खैर निश्चित दिन पर हम अस्तपताल पहुँचे और कमरा देख कर दँग रह गये। अच्छा खासा होटल का कमरा दिख रहा था। आक्सीजन सिलेंडर, ग्लूकोज चढाने की नली और बाकी संयत्र वस्तुतः कमरे की दीवारों में लकड़ी की दीवारों के पीछे छिपे थे, ताकि किसी को उन्हें देख कर अनावश्यक मानसिक तनाव न हो। श्रीमती जी के लिए टीवी सेट भी लगा था और उसपर प्रेटीवीमेन चल रही थी। कुछ देर में डाक्टर आये तो श्रीमती जी ने निर्देश थमा दिया कि उन्हें पुत्र या पुत्री का क्या नाम सर्टिफिकेट में लिखना है। श्रीमती जी को दो दो शंकाऐ थी, पहली कि शायद हमने उन्हें पुत्र वाली सूचना मन बहलाने के लिए बता रखी है और दूसरी कि प्रसव के बाद उनकी बेहोशी का फायदा उठाकर कहीं हम बर्थसर्टिफिकेट पर बाँकेबिहारी नाम न चढवा दें। डाक्टर उन्हें आश्वस्त करके शल्यक्ष ले गयें मुझे बाहर खिड़की के पास इंतजार करने की सलाह देकर।

भयो प्रगट कृपाला
करीब पंद्रह मिनट बाद ही एक नर्स हाथ में गुलाबी सा खिलौना लिये आ रही थी हमारी ओर। श्री श्री एक हजार आठ बाँके बिहारी जी महाराज का पदार्पण हो चुका था हमारे परिवार में। माननीय बाँके जी की भरपूर फोटो खींची गयीं। श्रीमती जी को बहुत कोफ्त हो रही थी अस्पताल में। शाकाहारी भोजन के नाम पर उबली गोभी , गाजर खानी पड़ रही थी और बाहर से खाना लाने पर पाँबदी थी। एक नरमदिल नर्स उन्हें जूस और फल वगैरह देकर दिलासा दे जाती थी। तीन दिन बाद हमें छुट्टी मिल जानी थी। छुट्टी वाले दिन दो अनुभव हुए। यह बताया गया कि बच्चे की कार सीट लाये बिना आपको बच्चा घर नही ले जाने दिया जायेगा। मेरे पास कारसीट थी पर नवजात शिशु के लिए हेडरेस्ट एक विशेष किस्म का तकिया लाना रह गया था। ट्वायसआरअस गया तो एक सेल्सगर्ल ने पूछा कि हेडरेस्ट बेटे के लिए लेना है या बेटी के लिए। जवाब सुनने पर वह कुछ परेशान होकर बोली अभी मेरे पास कोई नीला हेडरेस्ट नही है सिर्फ गुलाबी है। मैने कहा कि क्या फर्क पड़ता है। उसने गुलाबी हेडरेस्ट देते हुए कहा कि दो दिन बाद आकर नीले रंग वाले से बदल लेना। मैं सोच रहा था कि माना गुलाबी रंग लड़कियों पर फबता है पर "चलता है" वाली प्रवृति के चलते उसकी सलाह नजरअँदाज कर दी।

पिंक या ब्लू
अस्तपताल में डाक्टरों ने भली भाँति कारसीट की जाँच की , गुलाबी हेडरेस्ट देखकर नाक सिकोड़ी और पूरे दो घँटे तक निर्देश दिये कि बच्चे की देखभाल कैसे करनी है। कुछ बाते जहाँ काम की थी वहीं कुछ सलाह अजीबोगरीब लग रहीं थी। जैसे कि बच्चा अगर रात में रोये तो या तो वह भूखा होगा या उसका बिस्तर गीला होगा। कुछ ऐसा लग रहा था कि हम नये माडल की कार घर ले जा रहे हों और सेल्समैन उसके फीचर्स के बारे में विस्तार से बता रहा हो। बाँके बिहारी हमें टुकुर टुकुर देख रहे थे , मानो कह रहो हों "पिताश्री , ठीक से निर्देश समझ लो। बाद में न कहना कि हमने रात में गदर क्यों काटी है या आप सबको हर दो दो घँटे में क्यो उठा रहा हूँ। यह सब तो पैकेज्ड डील है।" अस्तपताल से घर आने के पँद्रह दिन में ही पिंक या ब्लू का अमेरिकी कांसेप्ट अच्छी तरह से दिमाग में घुस गया। हर मिलने वाला छूटते ही कहता था कि बड़ी सुँदर बेटी है हमारी। हम हैरान कि अच्छा खासा लड़का सबको लड़की क्यों दिख रहा है। किसी अनुभवी दोस्त ने बताया कि यह समस्या लेबलिंग की है। अगर आटे की बोरी पर चावल का भी लेबल लगा दो तो एक औसत अमेरिकी उसे आटे के दाम पर खरीद लेगा। यहाँ मैने बाँके की कारसिट में गुलाबी हेडरेस्ट लगाकर लड़की होने का लेबल लगा दिया था।

12 comments:

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सुन्दर, आपकी सहज किस्सागोई ही आपकी सफ़लता का रहस्य है। मजा आ गया।

फ़िर तकिया बदला कि नही। ट्वायआरअस बहुत जेब कटाऊ जगह होती है,लगता है हर चीज खरीद लें।फ़िर बच्चों को समझाना तो बहुत टेड़ी खीर होता है।आजतक ऐसा नही हुआ, जो सोचकर गये हों और सिर्फ़ वो ही लाये हों।हमारी साहबजादी वहाँ जाकर मचल जाती है, फ़िर तो भईया,झक मारकर खरीदना ही पड़ता है, भले ही वो खिलौना,घर मे एक किनारे पड़ा रहे।

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सुन्दर, आपकी सहज किस्सागोई ही आपकी सफ़लता का रहस्य है। मजा आ गया।

फ़िर तकिया बदला कि नही। ट्वायआरअस बहुत जेब कटाऊ जगह होती है,लगता है हर चीज खरीद लें।फ़िर बच्चों को समझाना तो बहुत टेड़ी खीर होता है।आजतक ऐसा नही हुआ, जो सोचकर गये हों और सिर्फ़ वो ही लाये हों।हमारी साहबजादी वहाँ जाकर मचल जाती है, फ़िर तो भईया,झक मारकर खरीदना ही पड़ता है, भले ही वो खिलौना,घर मे एक किनारे पड़ा रहे।

Sushruta said...

maza aagaya pad ke...aap operation mein andar kyun nahi gaye?
aur haan badhai :)

renu ahuja said...

पिंक और ब्ल्यू रंग अमेरिका ही क्यूं गौर से देखें तो भारतीय साहित्य मे भी यही द्र्शाते हैं , याद नहीं ....नीला आसमान, और गुलाबी रंगत.....होने को तो यही होना चाहिये पर सच तो ये भी है कि ..'चलता है'!!! और ये सिर्फ़ हिन्दुस्तान ही क्यों , अगर कोई ओप्शन ही ना हो तो अमेरिका में भी :'चल जाता है' बशर्ते कोई चलाना चाहे! रही बात लेख की तो भई भावी पिताओं के लिये तो बहुत ही अच्छा है और हां ये बेबी शावर जैसी अमेरिकी प्र्था, की गिफ़्ट आइट्म के बारे में मेल कर्के रिश्तेदारों को सूचित कर्ना...इज़ वॆरी गुड़ आइडिया.फ़ोर आल इन्डियन्स, ताकी ये गिफ़्ट की पल्टा पल्टी का टेंशन कुछ कम हो जाए..., रोचक लेख है, ब्धाई.-रेणु .

Anonymous said...

बहुत शानदार लिखते है अतुल भाई, हॅस हॅस कर बुरा हाल हुआ है। अभी तक जितने ब्लोग पढे सबसे शानदार आपका ही लगा। जितनी बधाई दी जाये कम ही होगी। अनुरोध है कि लिखना जारी रखेगे। सादर धन्यवाद।

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।

खुन्दक said...

अतुल ने जो किस्से कहानियां ‘लाईफ इन ए एचओवी लेन’ में चित्रित किए हैं वे सुनाते तो कई हैं पर यहां विशेषताएं दो हैं: भाषा और शैली। यह अमेरिका के खट्टे मीठे अनुभव हैं – एक भारतीय की नज़र से भारत की भाषा में। कोई पूछ सकता है कि भाषा से क्या अंतर पडता है? हां सम्प्रेष्ण तो हो जाता है, पर अंतर कुछ कुछ वैसा ही पडता है जैसा कि उबले हुए कॉंटिनेंटल भोजन और भारतीय मसाले वाले भोजन में है। अतुल के लेखन में भोजन के साथ कानपुर की चाट का भी मज़ा है ;)

Anonymous said...

बहुत शानदार लिखते है अतुल भाई, हॅस हॅस कर बुरा हाल हुआ है। अभी तक जितने ब्लोग पढे सबसे शानदार आपका ही लगा। जितनी बधाई दी जाये कम ही होगी। अनुरोध है कि लिखना जारी रखेगे। सादर धन्यवाद।

Tushar Arora said...

gr8 job bhaiya! very funny..:)

Rakhshan said...

Unbelievable!!!!
Living in States, you haven't forget Hindi...but regret you r not writing now ...
R u still in states ?

Patricia Howell said...


Good info. Lucky me I found your website by accident (stumbleupon). I've saved as a favorite for later! craigslist hampton roads

Kiran Sharma said...

Very nice.Keep it up.
TCS Jaipur