July 05, 2005

अध्याय ७: छुट्टी के रँग, केडी गुरू के सँग! !

पामहैंड टर्न
अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस ४ जुलाई को मनाया जाता है। स्वतंत्रता दिवस पर याद आती है सारे जहाँ से अच्छा की स्वर लहरियाँ, रँग बिरंगी झँडिया, स्कूल में बँटने वाले बूँदी के लड्डू, टीवी पर यह गिनना कि राजीव गाँधी ने कितनी बार "हम देख रहे हैं" या "हम देखेंगे" कहा। यहाँ माजरा कुछ दूसरा दिखता है। जगह जगह स्टार और स्ट्राईप्स यानि की अमेरिकी झँडा तो दिखता है पर वह तो वैसे भी साल भर हर कहीं दिख सकता है। पूरी आजादी है आपको अमेरिकी झँडा लगाने की। और तो और लोग स्टार और स्ट्राईप्स वाली टीशर्ट बनियान तक भी पहन डालते हैं। चारो ओर सेल के नजारे। हाँ शाम को तकरीबन हर शहर में सँगीत समारोह , खाना पीना और अँत में धुँआधार आतिशबाजी जरूर होती है। वैसे इस अवसर पर होने वाली तीन दिन की छुट्टी का देशी बिरादरी जम कर सदुपयोग करती है। यह निर्भर करता है आपके प्रवास के अनुभव पर। हमारे सरीखे नये नवेले अप्रवासी पूरे तीन दिन पयर्टन पर खर्च कर डालते हैं। अक्सर मित्रो के साथ भ्रमण रोमांच को दुगुना कर देता है। डलास में चार जुलाई को रूबी फाल यानि कि जल प्रपात देखने का कार्यक्रम निर्धारित हुआ। केडी गुरू साथ चल रहे थे। केडी गुरू हमारे कालेज के जमाने के कनपुरिया मित्र हैं। खासे जिंदादिल और शौकीन तबियत के ईंसान। हलाँकि स्वभाव के मामले में थोड़े प्रेशर कुकर हैं, यानि कि सँयम बहुत जल्दी खो देते हैं पर जल्द ठंडे हो जाते हैं। तो जनाब डलास से हम और केडी गुरू एकसाथ चले टेनेसी के चैटेनोगा की और। रास्ते में मैने ध्यान दिया कि केडी गुरू ड्राईव करते हुए कुछ कुछ कनपुरिया टैंपो वालो की भाँति खुली हथेली स्टेयरिंग पर चिपका कर गाड़ी मोड़ रहे थे और लेन चेंज करते वक्त कँधे को मिथुन चक्रवर्ती की तरह झटका देते थे। यह प्रक्रिया अनवरत चलने पर मैने अपने कौतुहूल को रोकना उचित नही समझा। पता चला कि केडी गुरू ने भारत में अपने ड्राईवर से कार चलाना सीखा था और यह दो गुर बोनस में सीख लिए थे। मुझे मच्छिका स्थाने मच्छिका वाला किस्सा याद आ रहा था जिसमें एक नकलची अपने से आगे वाले परीक्षार्थी की कापी लाईन दर लाईन टीप रहा था और एक जगह आगे वाले की कापी में मरी मक्खी चिपकी दिखने पर एक मक्खी मार कर अपनी कापी में ठीक उसी जगह चिपका देता है।वैसे केडीगुरू के इस खानदानी ड्राइवर ने उन्हे ईंदिरा गाँधी एयरपोर्ट पर मासूमियत मे यह वादा कर दिया था कि वह उनसे मिलने अमेरिका ड्राईव करके जरूर आयेगा, क्योंकि वह हवाईजहाज का टिकट अफोर्ड नही कर सकता था और उसे लगता था कि पँद्रहबीस दिन लगातार चलाने पर अमेरिका पहुँचा जा सकता है। केडीगुरू के फटकारने पर कि अमेरिका सात समुँदर पार है, बेचारा मायूस जरूर हुआ पर निराश कतई नही। सुना गया है कि उसे यकीन है कि केडीगुरू को अमेरिका के सारे रास्ते नहीं मालुम, ईसलिए आजकल वह अमेरिका का बाईरोड रास्ता ढूँड़ने मे लगा है।

पढे लिखे भी झाड़ू लगाते हैं
केडीगुरू ने मजेदार आपबीती सुनायी। केडीगुरू आफिस से घर का रास्ता लोकल ट्रेन से तय करते हैं। एक दिन स्टेशन जाते समय केडीगुरू फुटपाथ पर चल रहे थे। कुछ सोचते सोचते केडीगुरू का सूक्ष्म शरीर चाँदनी चौक पहुँच गया और स्थूल शरीर टेनेसी के फुटपाथ पर चलता रहा। रास्ते में एक भीमकाय अश्वेत झाड़ू लगा रहा था और अमेरिकन सभ्यतानुसार केडीगुरू से "हाई मैन, हाऊ यू डूईंग" बोला। केडी गुरू बेखुदी में सोचने लगे कि क्या जमाना आ गया है जो पढे लिखे अँग्रेजी दाँ लोगो को भी झाड़ू लगानी पड़ रही है। केडीगुरू उसके हालत पर अफसोस प्रकट कर सरकार को कोसने जा ही रहे थे कि उन्हे ख्याल आया कि वे चाँदनी चौक में नही अमेरिका में हैं जहाँ अनपढ भी अँग्रेजी ही बोलते हैं।

रूबी फाल
एक प्राकृतिक करिश्मा है यह मनोरम स्थल। पहले आपको एक पहाड़ी पर स्थित आगंतुक कक्ष में स्थित लिफ्ट से २६० फुट नीचे एक गुफा में जाना होता है। फिर करीब एक मील इस भूमिगत गुफा में चलना होता है। हजारो सालो में पानी के कटाव ने चूने के पत्थरो मे नयनाभिराम आकृतियाँ उकेर दी हैं। केडी गुरू और मेरा मानना था कि अगर यह स्थल भारत मे होता तो शर्तिया हर कदम पर एक चट्टान के पास एक एक पंडा दक्षिणा वसूल रहा होता उनको शिवलिंग या संतोषी माता का स्वरूप बताते हुए। गुफा के अँत में घुप अँधेरा था। नेपथ्य में मधुर संगीत के साथ पानी की आवाज विस्मय पैदा कर रही थी। गाईड ने जब बत्तियाँ जलायी तो सामने १४५ फुट की ऊँचाई से गिरता रूबी जल प्रपात दिखता है।

भईये एँकर तो पानी में फेंक दो!
चैटेनोगा मे एक झील में हम लोगो को चप्पू वाली नौका चलाने की सूझी। अमेरिकियो ने व्यवसायिकता की हद कर रखी है, टिकट के साथ ईश्योरेंस भी बेच रहे थे। खैर एक नौका पर केडी गुरू सपत्नीक लपक लिये। मैं दूसरी नाव की किनारे बाट जोह रहा था कि देखा केडी गुरू की नाव चकरघिन्नी की तरह सिर्फ गोल ही घूम रही है और केडी गुरू नाव की इस बेजा हरकत पर लालपीले हो रहे हैं। उनकी पत्नी उन्हे समझाने का प्रयत्न कर रही थी कि शायद नाव चलाने में कोई बेसिक गलती हो रही है पर केडी गुरू को नाव में कोई निर्माणगत खामी नजर आ रही थी। पँद्रह मिनट बीत जाने पर केडीगुरू ने झल्लाकर अपने हाथवाला चप्पू ही पानी में फेंक दिया। यह देखकर उनकी पत्नी सन्न रह गयीं। तभी मेरे बगल मे खड़े एक भारतीय सज्जन ने कहा "अपने दोस्त को बोलो, वह नाव का एँकर पानी में क्यो नही फेंकता?" इसके बाद केडीगुरू की खिसियानी हँसी,नाव में रखे मस्तूल (anchor) को पानी में डालना, उनकी पत्नी के सैंडिल का चप्पू के स्थान पर उपयोग करके नाव को किनारे तक लाना, दूसरा चप्पू लेना और फिर रास्ते भर उनकी प्रताड़ना अब इतिहास बन चुका है।

कैपेचीनो या एसप्रेसो?
वापस आते वक्त चाय की तलब लगी थी। पर यहाँ अगर हर एक्जिट रैंप पर चाय का ढाबा और पान की दुकान होती तो क्या बात होती। कुछ ऐसा नजारा होता कि एक्जिट रैंप पर कारो की कतारे होती और पप्पू गप्पू कुल्हड़ मे चाय परोस कर कारवालो की खिड़कियो तक पहुँचा रहे होते। लगता है यह सब होते होते पचासेक साल लग जायेंगे। खैर स्टारबक्स से काम चलाने की मजबूरी थी। यह शायद हमारा पहला तजुर्बा था स्टारबक्स में काफी पीने का। कम से कम पचास तरह की काफी के प्रकार उपलब्ध थे। कैपेचीनो , एक्प्रेसो,मोचा ,लैटे आदि आदि की भूलभुलैया में हमे अपनी झागवाली दूधिया काफी याद आ रही थी। केडीगुरू ने कुछ नया ट्राई करने के चक्कर में कैपेचीनो आर्डर कर दी। काउँटर से सवाल दागा गया वन शाट या टू शाट। अब यह जुमला तो मयखाने में ज्यादा चलता है। केडीगुरू गच्चा खा गये और बोले टूशाट। हाथ में लगा एक बित्ते भर का गिलास जिसमें दो छँटाक काफी सरीखा काढा परोसा गया था। बहुत देर मगजमारी के बाद समझ आया कि उसमे दूध इत्यादि खुद ही दूसरे काउँटर पर मिलाना था। बरहहाल काफी आनँद लेने के बाद हम वापस घर को चल दिये। हलाँकि केडीगुरू के टूशाट ने दो घँटे बाद असर दिखाया और उन्हें पेचिश लग गयी।

अति(व्यवस्था) के झटके
रात में हम होटल आकर रूके और दो कमरों मे ठहर गये। खाने के लिए मैं और केडीगुरू सामने के पीजा रेस्टोरेंट आर्डर करने गये। रेस्टोरेंट का दरवाजा बँद था और बाहर खड़े दो कर्मचारी धूम्रपान में मशगूल थे। उन्होने पीजा का आर्डर लेने से ईंकार कर दिया। उनका दिया तर्क अतिव्यवस्था के दुष्परिणाम दिखा रहा था। रेस्टोरेंट की व्यवस्था के अनुसार एक बार काऊँटर बँद हो जाने के बाद वो सिर्फ फोन पर ही आर्डर ले सकते थे, यानि कोई जुगाड़ वाली व्यवस्था नहीं। केडीगुरू दाँत पीसते हुए वापस आये और अपने कमरे से दो पीजा का आर्डर देकर पेचिशनिवारण हेतु बाथरूम में घुस गये। उनकी पत्नी हमारे कमरे में आकर मेरी पत्नी से बात करने लगीं। दो मिनट बाद देखा कि एक पीजा डिलीवरीवाला केडीगुरू के कमरे का दरवाजा पीट रहा है। बाहर आकर उससे पीजा माँगा तो अगला शगूफा हाजिर था। पीजावाला हमारे पैसे देने पर और केडीगुरू के पत्नी के यह दिलासा देने पर भी कि आर्डर देने वाला उनका पति है उन्हें पिजा देने को तैयार नही था। उनकी पालिसी थी कि आर्डर उसी कमरे में सप्लाई होगा जहाँ के फोन से आर्डर बुक किया गया है। हमारे सामने पीजावाले को दरवाजा पीटते हुऐ टापते रहने के अलावा कोई चारा नही था। दो मिनट बाद केडीगुरू तौलिया लपेटे आग्नेयनेत्रो से हमें घूरते प्रकट हुए। पीजावाले की व्यवसायिक मजबूरी जानने के बाद उनके पास मस्तक ठोंकने के अलावा कोई चारा नही था।

वह खिड़की जो बँद रहती है
नैशविले से वापस आते हुए बड़ा संगीन काँड हो गया। अँधेरा छा गया था और डलास आने में करीब दो घँटे बाकी थे। रास्ते में हमने रात्रिभोज करने के लिए एक कस्बे मे कार रोकी। एक चाईनीज रेस्टोरेंट में खाने का आर्डर दिया कि तभी मेरी चारूचँद्र को फ्रेंचफ्राई खाने की हट सवार हो गयी। केडीगुरू स्नहेवश खुद ही सड़क के दूसरी तरफ बने मैकडोनाल्ड में पैदल ही फ्रेंचफ्राई लेने चल दिये। करीब पँद्रह मिनट बाद केडीगुरू एक पुलिस आफिसर के साथ नमूदार हुए जो यह तसल्ली करना चाहता था कि उनके साथ और कौन हैं? हमें देखने के बाद पुलिसवाला खिसियानी हँसी हँसने लगा और केडीगुरू भुनभुनाने लगे। दरअसल बदकिस्मती से मैकडोनाल्ड का रेस्टोरेंट बँद हो गया था सिर्फ ड्राईवईन खुला था। ड्राईवईन वह खिड़की है जो रेस्टोरेंट के अँदर जाये बिना आप कार में बैठे बैठे खाने का सामान का आर्डर दे सकते हैं और भुगतान करके अपना सामान ले सकते हैं। केडीगुरू उस खिड़की पर पैदल पहुँच गये और उनकी खिड़की के काँच पर उँगली से ठक-ठक करके खिड़की खुलवाने का आग्रह करने लगे। कमअक्ल रेस्टोरेंट वालो ने शायद पहलीबार Drive-in खिड़की पर Walk-in ग्राहक देखकर उन्हें कोई चोरउचक्का समझ लिया और पुलिस बुला ली थी।

7 comments:

Krishna Tripathi said...

Guru,

Baki sab to theek hain lekin main point par boat goal goal khumane main jahan hum dono logon ne naav mein saath mein baith kar katvaya that, wahan apne aap ko meri bewi se replace kar diya. nahin pata tha kee america aa kar tum itne broad minded ho gaye ho ..

any way really good post and appreciate your sense of humor and recollection capability both as I had to think for a while to remember most of it

Hope you show same courtsey to some other kanpuriha's as well

अतुल श्रीवास्तव said...

अतुल,
अति सुन्दर. पढ़ कर मजा आ गया और साथ में कारण भी पता चल गया कि बुश महराज दक्षिण के प्रदेशों से जीत कैसे जाते हैं. ऊपर वाल जब अकल को चौराहे पर मुफ्त में बाँट रहा था तो शायद ये "गाय के बच्चे" (cowboys) गायें हाँकने में जुटे हुये थे.

एक छोटा सा प्रश्न है - "तुमुल" का अर्थ क्या होता है? उत्तर ई-मेल पर भेजने का कष्ट करें - shriatku@yahoo.com.

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।

Rohit said...

Atul Bhaiya,

good post, Bhaiya please also write about your personal experience about there
Rohit - Kanpur

Anonymous said...

हा हा हा । आपका blog पढ कर बहुत गुदगुदी हुई । ळिखेते रहिये ।

reema said...

Really very nice post.Keep share in future.
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