June 06, 2005

अध्याय ६: वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट

मूविंग
एक दिन सुबह सुबह प्रोजेक्ट मैनेजर ने कमरे में बुलाकर मेरा प्रोजेक्ट समाप्त होने की सूचना दी| सीधी सादी भाषा मे मतलब यह था कि उन्हे अब मेरी जरूरत नही थी और अगले हफ्ते से मैं बेंचप्रेस के लिए तैयार हो गया| जैसा कि पहले भी बता चुका हूँ कि तेजी से बदलती तकनीकि वाले इस कंप्यूटर क्षेत्र में प्रवेश तो आसान है पर हर दोचार महीने के बाद एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट पर जाने का मतलब कई बार एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना होता है| इन सबके साथ जुड़ी है मूविंग की चिर समस्या यानी कि नये प्रांत में नया रहने का ठिकाना, सामान का और कार का स्थानांतरण, फिर घर का पता,टेलीफोन, बैंक इत्यादि सेवाओं को नये स्थान परिवर्तन से सूचित कराने की जद्दोजहद| खैर बेंच पर आने के बाद का पहला सोमवार था| मार्च की गुगुनी धूप सनरूम में आ रही थी और मैं कुछ नया तकनीकी मसला पड़ रहा था कि तभी टेलीफोन की घंटी बजी| यह मामू का फोन था| यह मामू शब्द कंप्यूटर प्रोगामरो ने बिचौलियो के लिए इजाद कर रखा है| पता चला कि दो घंटे मे कोई जनाब ईंटरव्यू के लिए काल करेगे। काल आई और सिर्फ यह पूछने के बाद कि मैने कौन कौन सी विधाओ मे काम कर रखा है, डलास निवासी साक्षात्कारकर्ता ने निमंत्रण भेज दिया कि भाई आ जाओ डलास मे बसने।
डलास यानि कि वाईल्ड-वाईल्ड वेस्ट
अटलांटा से डलास कार यात्रा की ठानी थी| डलास अटलांटा से ८०० मील यानि कि करीब १३०० कि.मी. दूर है| पर रास्ता एकदम सीधा, एक हाईवे अटलांटा से शुरू होकर सीधे डलास पहुँचता है| हिंदुस्तान में मात्र दो दिन में १०५-१३० कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से १३०० कि.मी. का सफर कार में तय करने के बारे स्वपन में भी नही सोचा था| थोड़ी-थोड़ी दूर पर रेस्टोरेंट, रेस्टएरिया,गैसस्टेशन वगैरह होने और उत्तमकोटि की सड़क ने सफर को कष्टरहित बना दिया| जार्जिया से एलाबामा, मिसौरी एवं लुसियाना होते हुए टेक्सास में दाखिल हुए| पूरा रास्ता दो लेन का था| सफर मस्ती से कटता रहा| टेक्सास में दाखिल होते ही प्रांत के स्वागत पट्ट ने टेक्सास के अक्खड़पन से रूबरू कराया| जहाँ सारे प्रांत के स्वागत व॓लकम टु स्टेट से शुरू होते है वही टेक्सास की बानगी देखिए "Don't mess with Texas" | जहाँ तक नजर जा सकती है खेत दिखते हैं, कहीं कहीं काऊब्वाय घोड़े पर सवार गाय भैंसों को घेरे में इकठ्ठा कर रहे थे| अमेरिका में सर्वाधिक क्षेत्रफल मे बसा टेक्सास। जहाँ तक नजर जा सकती है, सपाट जमीन दिखती है। मैं हाइवे पर बने स्वागत कक्ष में रूका| सड़क मार्ग के आगंतुकों के लिए सभी प्रांतो में स्वागत सेंटर बने है| मुफ्त नक्शे, होटल व रेस्टोरेंट की तालिका एवं सभी पयर्टन स्थलों की सचित्र जानकारी| सहायता के लिए कुछ कर्मचारी | स्वागत सेंटर के कर्मचारियों ने मुझे डलास तक का रास्ता समझा दिया| कुछ ही घंटो के बाद अपनी नयी मंजिल डलास डाउनटाउन की खूबसूरत स्काईलाइन दूर से दिखने लगी| अमेरिका में गगनचुँबी ईमारतो का झुँड स्काईलाईन के नाम से जाना जाता है और किसी शहर की समृद्धि का परिचायक है, हलाँकि हम इसे कंक्रीट का जँगल के नाम से भी जानते हैं। फिर ६ लेन वाले हाइवे से सामना हुआ और कुछ ही देर में मै अपने होटल में था| रिसेप्शन कर्मचारी ने बताया कोई रवि आपके बगल वाले कमरे में आपका इंतजार कर रहे हैं| मैं सोच रहा था डलास मे मैं भला किस रवि को जानता हूँ? कमरा खुलवाने पर दारजी रविंदर भाई निकले| दारजी एक हफ्ते पहले ही दिल्ली से आकाशवाणी को तलाक देकर आये थे|
पंजाबी पुत्तर दि ग्रेट
होटल में एकाध घंटे बाद याद आया कि पीजी भाई ने किसी ब्रिज का फिन नंबर दिया था| फोन करने के आधे घंटे के बाद ही ब्रज मोहन जी रात्रिभोज के निमंत्रण के साथ हाजिर थे| ऐसी जिंदादिली कम ही भारतीयों में देखने को मिलती है| ब्रिज भाई के साथ डलास में रंग जम गया या फिर उन्हीं की भाषा में नजारा आ गया| ब्रिज और दार जी दोनों तंदूरी चिकन के शौकीन थे और होटल में गुलाबी तंदूरी चिकन के साथ दोनों की मीठी पंजाबी बातें जो ईमानदारी से मेरे सिर्फ ५० प्रतिशत ही पल्ले पड़ती थी कानों को बड़ी भाती थी | ब्रिज के पास माजदा कार थी दमदार ईंजन वाली| माजदा के डैशबोर्ड पर ब्रिज ने शंकर जी की मूर्ती स्थापित कर रखी थी | ब्रिज भाई ड्राईवर तो उम्दा किस्म के थे पर जब कभी तरन्नुम में गाड़ी चलाते तो खता कर बैठते, अमेरिकी सड़को पर गलती अक्सर मँहगी ही पड़ती है ‌ ब्रिज भाई जब भी ऐसी किसी स्थिती से दोचार होने से बचते तो तुरंत शंकर जी के चरण स्पर्श करके कहते कि आज तो परमपिता परमात्मा ने बचा लिया | शंकर जी भी सोचते होंगे कि भक्त ने एक तो गाड़ी में उल्टा मुँह कर के बैठाला है, अक्सर तेज कार चलाता है और हर उलजलूल गलती से बचाने का ठेका भी मुझे ही दे रखा है| एक बार तो शंकर जी ने बहुत बचाया वरना हम दोनो को बड़े बेभाव की पड़ती | मैं और ब्रिज एक साथ उसकी कार में जा रहे थे| ब्रिज भाई मस्त मूड में थे| बोले कि महाराज, मुझे यहाँ रहते तीन साल हो गये अब तो रास्ते ईतने याद हो गये हैं कि आँख मूँद कर भी मंजिल तक पहुँचा सकता हूँ | यह कहते हुए ब्रिज भाई एक लेन में मुड़े| हम दोनों यह देख कर भौंचक्के रह गये कि एक कार तेजी से हमारी ही लेन में आ रही हैं| ब्रिज भाई ने हार्न मारा तो वह कारचालक उल्टे चोर कि तरह हम कोतवालों को डाँटते यानि कि हार्न मारते हुए चला गया | पर यह क्या अब तो दोनों लेन में कारे अपनी ही दिशा में आ रही थीं | ब्रिज भाई बोले महाराज आज क्या पूरे शहर ने पी रखी है| अब तक मुझे माजरा समझ में आ गया था, गफलत में हम एक एक्जिट रैंप में उल्टी दिशा में जा घुसे थे| अब हम दोनो को काटो तो खून नही कि अब गाड़ी को यूटर्न कैसे लगायें जब दोनो ही लेन में गाड़िया अपनी तरफ मरखने बैल के मानिंद दौड़ती हुई आ रही हैं| मैंने ब्रिज भाई को हार्न बजाते रहने को बोला ताकि दूसरी दिशा वाले सावधान रहें कि हम गलत दिशा में खड़े हैं| तभी एक पुलिस कार हमारी लेन में आई| हमारी कुछ जान मे जान आई| पुलिस वाले ने आकर पहला सवाल किया कि हम गलत दिशा में कैसे आ गये? ब्रिज भाई ने मासूमियत से जवाब दिया कि हम ईस ईलाके में नये हैं रास्ता भूल कर गलत लेन में आ गये, अब यूटर्न लगाना मुश्किल लग रहा है | पुलिस वाले ने लाईसेंस वगैरह की जाँच पड़ताल के बाद एक और पुलिस वाले की मदद से दोनो लेन बंद कर हमारी कार को यूटर्न में मदद दी और साथ ही भविष्य में सजग रहने की ताकीद भी की | पुलिस वाले ने हमारी और बाकि कारों के हार्न की जवाबी कव्वाली सुन कर और हमारी कार दूर से गलत दिशा में खड़ी देख कर समझा कि कोई शराबी गलत लेन में जा घुसा है, ईसीलिए वह मसला हल करने आ गया था| पर यहाँ मामला अपने ही शहर में नये होने का था|
पापड़ प्रेमी
होटल में तीन दिन रूकने के बाद हम नये अपार्टमेंट में गये| सामान पहुँचाते पहुँचाते रात के एक बज गये| अपार्टमेंट में पार्किंग आरक्षित थी| मेरे पार्किंग लाट में न जाने किस खबीस के बच्चे ने अपनी कार खड़ी कर रखी थी| मैने कुछ देर के लिए एक एक आरक्षित परंतु पड़े खाली पार्किंग लाट हथिया लिया| अपार्टमेंट में सामान रख कर वापस जा रहा था कि एक वृद्ध सज्जन अवतरित हुए| सीधे सवाल दागा कि क्या वह कोरोला तुम्हारी है| मैंने जल्दबाजी में लापरवाही से जवाब दिया कि मेरे पार्किंग लाट किसी ने हथिया रखा है अतः मैंने दूसरे पार्किंग लाट को प्रयोग कर लिया| वृद्ध सज्जन का अगला बाउँसर था "आपका पार्किंग लाट हथिया लिया गया हो तो ईसका यह मतलब नही कि आप भी किसी का पार्किंग लाट हथिया ले| आप गेस्ट लाट प्रयोग कर सकते थे|" जवाब बिल्कुल वाजिब था| चाँदनी रात में हैलोजेन की दूधिया रौशनी में भी मैं वृद्ध सज्जन के तमतमाए चेहरे की लाली देख सकता था| मैंने सफाई दी कि जनाब कुछ देर के लिए सामान उतारने तक आपका लाट प्रयोग किया था, मैं अभी खाली करता हूँ| लेकिन वे भद्रपुरुष कल से ध्यान रखना की हिदायत देते हुए ओझल हो गये| बात आयी गई हो गई। डलास की तेज धूप देखकर मेरी मेमसाहब की बाँछे खिल गयी| पूरे दो साल बाद पापड़ बनाने का स्वर्णिम अवसर जो उनके हाथ लगा था| शाम को आफिस से वापस आया तो डलास की धूप में पके पापड़ चाय के साथ हाजिर थे | एक मजेदार प्रहसन हो गया उसके बाद| मेमसाहब ने बताया कि पापड़ बनाते समय नीचे की मंजिल पर रहने वाला कोई अमरीकी उनका दोस्त बन गया है| अधेड़ उम्र का व्यक्ति एकाकी जीवन व्यतीत कर रहा है और भारतीय भोजन का शौकीन है| उसने मेमसाहब को पापड़ बनाते देख कर पूछा होगा कि तुम क्या कर रही हो| मेमसाहब ने उसे पापड़ पुराण सुना दिया| बंदा पापड़ प्रेमी निकला| उसने मेमसाहब को आसपास के सारे भारतीय रेस्टोरेंट के नाम गिना डाले| साथ ही उन्हे यह भी सलाह दे डाली कि चूँकि तुम लोग नये हो अतः मैं तुम्हारे शौहर को आसपास की सभी जरूरी चीजे,पते ठिकाने बता दूँगा| हलाँकि उसने यह भी स्वीकार किया कि भारतीयों को यहाँ अपने सामाजिक कौशल के चलते स्थापित होनें में ज्यादा कष्ट नही उठाना पड़ता| मेमसाहब ने घोषणा की कि छोले भठूरे बने है और मैं उनके "नये दोस्त" को भी कुछ छोले भठूरे दे आऊँ, इसी बहाने किसी काम के आदमी से जान पहचान हो जायेगी| मेरे यह कहने पर कि यहाँ के लोग ज्यादा मेलजोल पसंद नही करते, मेमसाहब ने उसके मिलनसार , एकाकी और अधेड़ होने के दुहाई दे डाली| मैं तब भी अड़ा था कि यहाँ के लोग शायद ही हमारी तरह ताउम्र विवाहित रहते हैं, असुविधा की वजह से बच्चे न पालकर कुत्ते बिल्ली पालते हैं और परिवार की जगह कार और मकान जैसी बेजान चीजों पर ज्यादा समय व ध्यान देते हैं, और ईसी वजह से अकेले रहते रहते खड़ूस हो जाते हैं| पर मेरी संवेदनशील पत्नी अगर किसी का भला करने पर अड़ जाये सारे तर्क कुतर्क व्यर्थ हैं| वह सामाजिकता, संवेदनशीलता और आखिरी में धार्मिक परमार्थ आदि के इतने तर्क प्रस्तुत करेगी कि उसकी बात मानने के अलावा कोई चारा नही बचता| झक मार कर मैं छोले भठूरे की प्लेट लेकर नीचे वाले अपार्टमेंट में गया और घंटी बजायी| अपने इस नये पड़ोसी से मैनें बताया कि मैं उनकी नयी पड़ोसन का पति हूँ और उनके लिए मेरी पत्नी ने छोले भठूरे भेंजे हैं| पड़ोसी ने मुझे अंदर आमंत्रित किया| रोशनी में मेरे दीदार होते ही वे बोले " I know you, we have had a discussion in parking lot. But now forget about it. " जनाब का नाम बाब था और वे फोर्ड कार की डीलरशिप में कार्यरत थे| भारतीय भोजन चटपटा होने की वजह से उन्हें बहुत पसंद था| मुझे उसने एक पेंटिग दिखायी जिसमे विश्व की सभी प्रकार की मिर्ची के चित्र थे| कुल ५६ प्रकार की मिर्ची में वह २० तरह की मिर्ची चख चुका था| बाब पार्किंग लाट वाला मामला जल्द ही भूल गया। उसने मुझे एक और तस्वीर दिखा कर उसमें एक महिला को पहचानने को कहा। यह महिला और कोई नही, बीस तीस अमेरिकी महिलाओ के शिष्टमँडल से घिरी स्वर्गीय श्रीमती ईँदिरा गाँधी की थी। उस शिष्टमँडल में बाब की दादी बी शामिल थी। बाब ने बताया कि वह भारत घूमने जाना चाहता है। उसके पहले वह तैयारी कर रहा और भारत के बारे मे जो कुछ उसे मिला सब पढ चुका था। एक दिन रविवार के सबेरे आवाज लगा कर बुलाने लगा। पता चला जनाब अपने पिछवाड़े बार्बक्यू स्टेक यानि कि भैंसे का माँस पका रहे थे। बोले कि तुम अक्सर भारतीय खाना खिलाते हो आज तुम्हे टेक्सास स्पेशल खिलाता हूँ। यह पता चलने पर कि हम शाकाहारी है, बेचारा बहुत निराश हुआ, पर थोड़ी ही देर मे कही से मैक्सिकन डिश लेकर हाजिर हो गया। कभी कभी ताज्जुब होता है, टेक्सास के बगल मे बसा देश है मेक्सिको, यहाँ के निवासियो के शक्लोसूरत भारतीयो से इस कदर मिलती हैं, कि धोखा हो जाता है। यहाँ तक कि उनका खाना पीना भी बहुत कुछ भारतीयो जैसा होता है।
जलेबी का जलवा
एक दिन शाम को आफिस से घर पहुँचा तो श्रीमती जी हाथ पर बरनाल अपनी पड़ोसन से बरनाल लगवा रही थीं| पता चला महिला मंडल में पकवान चर्चा के बीच जलेबी का जिक्र आ गया| सबको एक ही कोफ्त थी कि डलास में सब मिलता है पर किसी को जलेबी नही दिखी| एक दक्षिण भारतीय पड़ोसन तो कभी जलेबी नाम की चीज से रूबरू नही हुई थी| मेरी पाककला में सिद्धहस्त श्रीमती जी मोर्चे पर कूद पड़ी| आखिर कानपुर और जलेबी की प्रतिष्ठा का प्रश्न था| पर आपाधापी में गर्म तेल मैडम के हाथ छलक गया| उनकी प्राथमिक चिकित्सा के बीच मेरा पदार्पण हुआ| फौरन एक वाक् इन क्लीनिक ले गया| डाक्टर ने मरहम पट्टी तो कर दी पर उसे यह चोट कुकिंग में लगी है यह हजम नही हो रहा था| वह शंकित था कि कहीं चोट की वजह मियाँ बीबी में हाथापाई तो नहीं| अब शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी पर बुड़ऊ डाक्टर कुछ देर मे समझ गया कि इस दुर्घटना के पहले हम दोनों में सिर फुट्टवल जैसा कुछ नही हुआ|

4 comments:

अनूप शुक्ला said...

क्या यही थीं वे जलेबियां जिनको बनाने में हाथ जले?

अतुल श्रीवास्तव said...

धीरे धीरे पूरब से पश्चिम की ओर खिसक रहे हो. अगर ये सिलसिला कायम रहा तो अति शीघ्र ही कैलिफोर्निया में मुलाकात होगी और फिर जलेबी और छोले भटूरों का रसास्वदन करूँगा.

वैसे अगर जलेबी का असली आनन्द लेना हो तो कभी लखनऊ आकर शिव मिष्ठान या फिर नेतराम हलवाई के दर्शन अवश्य करना. और हाँ लगे हाथ राम आसरे के यहाँ से एक-आध किलो मलाई के पान भी उठा लेना.

लगता है हिन्दी के ब्लाग जगत में कोई और लखनऊ वासी नहीं है...

avinash said...

are anup bhai ....hum hain na lucknow se...

aur jalebi ka kaam bhi jaante hain...khandani jo hain ....chowk ke....doodh wali mithai ke maan se mashoor hain yahan...

ranjana gupta said...

Wedding photographer in jaipur

Thanks for share this nice post.