April 22, 2005

अध्याय ५: अटलाँटा के अलबेले रँग

उत्तर दक्षिण समागम
मेरे मित्र अनुपम जी कुछ दिन के लिए मेरे कार ड्राईविंग के द्रोणाचार्य बन गये| एक दिन उनके साथ मंदिर जाना हुआ| अमेरिका में आने के बाद पहली बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला| मंदिर में गणेश, शिव , हनुमान , मुरुगन, भूदेवी , तिरूपति बालाजी सब की प्रतिमा एक साथ एक हाल में देख कर सुखद आश्चर्य हुआ| मैनें अनुपम जी से, जो कि हिंदु स्वंयसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे , से हर्षमिश्रित आश्चर्य से कहा कि भारत से भाषावाद-क्षेत्रवाद की समस्या यहाँ नही आयी|, क्या उत्तर क्या दक्षिण सब के देवी देवता एक साथ सुशोभित हैं| अनुपम भाई ने एक ही क्षण में मुझे यथार्थ के धरातल पर ला पटका| वे बोले मान्यवर ये विशुद्ध अर्थशास्त्र है राष्ट्रप्रेम जैसा कुछ नही है | भाई जब मंदिर बना तो हैदराबादी बिना बालाजी की मूर्ती लगे चंदा नही दे रहे थे, वहीं तमिलनाडु और कर्नाटक वालों को लगता है कि उन्हें सिर्फ मुरुगन , भूदेवी या लक्ष्मी का आशीर्वाद ही फलीभूत होगा और बचे उत्तर भारतीय तो वे अपनी टेंट तभी ढीली करेंगे जब यहाँ हिन्दी में की गई प्रार्थना स्वीकारने वाले हनुमान जी विराजें| वह तो अटलांटा में काफी देशी (भारतीय) हैं वरना चंदा पूरा करने के लिए गुरू ग्रंथ साहिब और भगवान बुद्ध को भी मदिंर का हाल शेयर करना पड़ता| बाद में पता चला कि अटलांटा में जिमखाना क्रिकेट क्लब, तमिल समाज, पंजाबी बिरादरी, जैन सम्मेलन, बंगाली असोसियेशन , सिंधी सभा आदि आदि सारे मंच अपने अपने एजेंडे के साथ विद्यमान हैं| मैं सोच रहा था कि हम भारत से अपनी संस्कृति ही साथ नही लाते अपनी भाषावाद,जातिवाद और क्षेत्रवाद वगैरह की दीवारें भी साथ ले आते हैं| यह सब हमारी मानसिक बेड़ियाँ है जिनसे हमें छुटकारा मिल ही नहीं सकता| वैसे जहाँ एक ओर भाषावाद,जातिवाद और क्षेत्रवाद की बेड़ियाँ दिखी, वहीं एक सुखद अहसास भी हुआ | अमेरिका में भगवान भी एनआरआई नफासत के साथ रहते हैं| एयरकंडीशंड मंदिर, स्वच्छ वातावरण, अनुशासित भक्त| ताज्जुब है कि दीवार पर दिशा निर्देशो का पूरी सजगता से पालन होता है| न कोई फोटोग्राफी कर रहा है, न कोई शिवलिंग पर मत्था रगड़ कर उसे चमका रहा है न ही प्रसाद के लिए मारामारी| सिर्फ एक कमी खलती है, नये मंदिरों की बात छोड़ दें तो ज्यादातर पुराने मंदिर डाऊनटाउन में बने हैं| अति सीमित पार्किंग के साथ| मंदिर व्यवथापक शुरु में जहाँ आकर बसे वहीं मदिंर ठोंक दिया| भविष्य में भक्त संख्यावृद्धि का ख्याल उनके जहन में कभी नही आया| अब चाहे शहर कितना बड़ जाये पर कई मंदिर व्यवथापक सुविधाविस्तार के मामलें में भारतीय रेल मंत्रालय की तरह सोचते हैं| जहाँ जी चाहे स्टेशन बना दो पब्लिक को सत्तर बार गरज है तो आयेगी ही|

गोस्वामी जी की आंसरिग मशीन
आजकल दिल्ली बंबई में तो आंसरिग मशीन आम बात हो गयी है| पर १९९९ में मेरे लिए नयी चीज थी| पर प्रहसन तब होता है जब यह अजूबा किसी छोटे शहर में पहुँच जाये | हमारे गोस्वामी जी भारत यात्रा से लौटकर आये तो सुनाने के लिए उनके पास यही प्रहसन था| बेचारे एक अदद आंसरिग मशीन ले गये अपने मथुरा वाले घर में| उन्होने आसंरिग मशीन को फोन से कनेक्ट करके रख दिया और बाकी परिवार के साथ चाय छत पर जाकर चाय पीने लगे| तभी नीचे से नौकर चिल्लाया कि "भईया, जिज्जा जी ईं भोपूं से कईस चिल्लाय रहे हैं?" सबने नीचे झाँका तो विकट दृश्य था| गोस्वामी जी के पड़ोस के मुहल्ले में रहने वाले जीजा जी ने फोन किया था| फोन चार घँटी बजते ही आँसरिंग मशीन पर ट्रांसफर हो गया| आगे का नजारा खुद गोस्वामी जी के शब्दों में
आँसरिंग मशीन: श्री कुंदन गोस्वामी जी (गोस्वामी जी के पिताश्री) इस समय ....
जीजाजी: हल्लो, हल्लो
आँसरिंग मशीन: ...... या तो व्यस्त हैं या ..
जीजाजी: अरे कौन बोल रहा है बिरजू (गोस्वामी जी का घरेलू नाम)?
आँसरिंग मशीन: ... या घर में नहीं हैं ..
जीजाजी: अरे बिरजू ई हम है मुरली(खुद जीजाश्री) पहिचाने नहीं का?
आँसरिंग मशीन: ... आप कृपया बीप बजने के ..
जीजाजी: अरे तुम कहीं संतू (गोस्वामी जी का नटखट भतीजा) तो नही हो, ई का शैतानी कर रहे हो छोरा लोग? चाचा की आवाज बना के बोलत हौ?
आँसरिंग मशीन: ... बाद अपना संदेश रिकार्ड करें, ..
जीजाजी: अरे का रिकार्ड करें , हम कोई गवैया हैं का? हे संतू , तनिक चाचा (गोस्वामी जी) को बुलाओ
आँसरिंग मशीन: ... बीप ..
जीजाजी: ए संतू तुम लोग बहुत शरारती हो गये हो, चाचा की आवाज बना के बोलते हो, अरे काम की बात करनी है , बुलाओ जल्दी चाचा को, नही तो हम आ रहे हैं|
आँसरिंग मशीन: .... सन्नाटा ....
जीजाजी: अच्छा नाही मनिहौ, अभी हम आवत है तुम्हरी कुट्म्मस करै की खातिर| धड़ाक से फोन पटकने की आवाज|
इधर संतू मियाँ जो पास ही खेल रहे थे , जीजाश्री की आवाज सुनकर सिहर गये| जीजाजी के खाँमखा में संभावित आक्रमण की धमकी से उनकी पैंट भी गीली हो गई थी| गोस्वामी जी के पिताजी अलग चिल्ला रहे थे कि यह क्या तमाशा है, यहाँ किसी को इन सब झमेलों का शऊर नहीं हैं| तभी गोस्वामी जी की मुश्किलों में ईजाफा करते गुस्से में लाल पीले जीजाश्री का अवतरण हुआ| आते ही भाषण चालू कि तुम लोगो ने लड़को को बिगाड़ रखा है, फोन तक पर मजाक करते हैं, बड़ों की आवाज की नकल करके बेवकूफ बनाते हैं वगैरह वगैरह| जीजाश्री को लस्सी पिला कर ढंडा किया गया और फिर उन्हीं की आवाज आंसरिंग मशीन पर सुनाई गयी| आशा के विपरीत जीजाश्री का कथन था "लाला ई भोंपू हमरे लिए काहे नहीँ लाये| बहुत काम की चीज लगत है|" और आशानुसार गोस्वामी जी के पिताजी ने तुरंत बवालेजान यानि की आँसरिंग मशीन को जीजाश्री के सुपुर्द कर दिया|

पीजी भाई
जिंदगी में कुछ लोग ए॓से भी मिलते है जो बिन माँगे हमेशा सबकी मदद को तत्पर रहते हैं| हमारे पीजी भाई ए॓से ही जिंदादिल शख्स हैं| मैं पहली मुलाकात में उनका कायल हो गया था| न जाने कैसे उन्होनें मेरे मुँह से सिर्फ एक वाक्य सुन कर ताड़ लिया कि मैं कानपुर से हूँ| अमेरिका मे रहने लायक जुझारुपन पीजी भाई की शागिर्दी में सीखा है| १५ अगस्त को मजेदार वाक्या हुआ| सिविक सेंटर पर १५ अगस्त का मेला लगा था| खाने पीने से लेकर हर तरह की धार्मिक-सामाजिक धंधेबाजी के स्टाल लगे थे| कुछ देशप्रेमी कारगिल में पाकिस्तानी ज्यादतियों के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़े हुए थे| मैं और पीजी भाई कुछ अतिउत्साहियों की जबानी पतंगबाजी का मजा ले रहे थे| पाकिस्तान पर जबानी गोलीबारी में कोई सूरमाभोपाली पीछे नही रहना चाह रहा था| ऐसे तनावपूर्ण वातावरण में पीजी भाई को मसखरी सूझी| वे बोले यदि आप सब साथ दें तो हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दे सकते है| सभी को लगा कि पीजी के दिमाग में कोफी अन्नान या बिल क्लिंटन को चिठ्ठी लिख मारने सरीखा कोई धाँसू आईडिया खदबदा रहा होगा| सारे भारत माँ के सपूत समवेत स्वर में बोले, पीजी भाई आप बस हुक्म करो हम सब का तो खून खौल रहा है| पीजी भाई बोले तो निकालो सब दस-बीस डालर| इस अप्रत्याशित पहल पर सबका क्यों कहना प्रत्याशित था| पीजी भाई ने प्रस्ताव रखा, कि जब पाकिस्तान आतंकवाद प्रायोजित कर सकता है तो हम क्यों नही | रकम खर्च कर के क्या हम भी किसी बंबई दुबई के पप्पू पेजर , मुन्ना भाई या मदन ढोलकिया को कराची या लाहौर में एकाध बम फोड़ने की सुपारी नहीं दे सकते| अगर आप हजार डालर भी ईकठ्ठा कर लो तो मैं सुपारी का ईंतजाम करता हूँ| मैने देखा कि भारत माँ के सारे सपूत जिनका कुछ देर पहले खून खौल रहा था अपने अपने दस डालर लेकर छोले भटूरे का स्टाल तलाशने में लग गये| पीजी भाई का फलसफा कुछ अलग ही है| उन्होनें न्यूयार्क के भिखारियों की बदहाली की वीडियो फिल्म बना रखी है, जिसे वह हिंदुस्तान में अमेरिका-पूजकों को खासकर दिखाते हैं|

हिंदु स्वंयसेवक संघ
यह भारत वाले आरएसएस का अंतराष्ट्रीय संस्करण है| शुरू के महीनों में सप्ताहाँत पर करने को कुछ विशेष न होने के कारण शाखा में भी लिया| इसकी गतिविधियों में भाग लेकर पता चला कि हिंदु स्वंयसेवक संघ की उपयोगिता कितनी है और साथ ही लोगों खासकर बुध्दिजीवीयों के इससे बिदकते के कारण है| स्वंयसेवक संघ का अमेरिकी संस्करण एचएसएस क्रीमी लेयर समाज से आने वाले लोगों की वजह से कुछ "हटके" है| इसके पुराने सदस्य पहली बार अमेरिका आने वालों की यथासंभव मदद करते है, किसी भी सामाजिक कर्तव्य को निबाहने में , चाहे गुजरात का भूकंप राहत कोष एकत्र करना हो या कारगिल युद्ध में पाकिस्तान विरोध मार्च, आगे रहते हैं| सबसे अच्छा प्रयास तो बालगोकुलम का है| छोटे बच्चों के लिए भारतीय संस्कृति एवं महाकाव्यों पर आधारित लघुकथा, नाटक , मातृभाषा सिखाने हेतु सप्ताहाँत पर कक्षाओं का आयोजन होता है| अभिभावक ही सामूहिक रूप से कक्षा संचालन की जिम्मेदारी लेते हैं| संघ की भूमिका पाठ्य सामग्री एवं आवश्यक प्रशिक्षण तक सीमित रहती है | भारत के बाकि हिस्सों का तो पता नही पर अपने उत्तर प्रदेश में लफंगातत्व धर्म का तथाकथित ठेकेदार बनकर ऐसे संघठन में स्वार्थवश घुस जाता है और बुध्दिजीवी ऐसे तत्वों की वजह से बिदकते हैं|

दिव्यराज जी और उनका गृह प्रवेश समारोह
दिव्यराज सिहं जी अटलांटा में संघ के सक्रिय कार्यकर्ता हैं| एक दिन मणिका जी (दिव्यराज सिहं की धर्मपत्नी) ने सकुचाते हुए अनुरोध किया कि मैं उनके पुराने घर से नये घर में सामान पहुँचाने मे सहयोग कर दूँ| दिव्यराज जी कुछ सकोंची स्वभाव के हैं| उनके सकोंच का एक अन्य कारण भी था| एक अति उत्साही स्वंयसेवक एक दिन पहले उनके घर से पुराना सामान फिंकवाते समय उनका खालिस नया मंहगे जूते का डिब्बा कचरा समझ कर फेंकने की नादानी कर चुका था| दिव्यराज सिहं जी अब किसी नौसिखिए स्वंयसेवक से सेवा लेने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे| मैनें उनका संकोच मैं कुली नं वन हूँ कह कर दूर कर दिया| खैर मैं, पीजी भाई एवं दिव्यराज जी ने मिलकर उनका सारा सामान नये घर में पहुँचा दिया| पीजी भाई अपने घर चले गये| मणिका जी अगले दिन नये घर में होने वाले गृह प्रवेश समारोह के लिए मिठाई व समोसे का आर्डर किसी महिला को दे रखा था| तमाम भारतीय महिलाएं खास अवसरों हेतु भोजन - पकवान आदि आर्डर पर सशुल्क बना कर देती हैं| मैं, दिव्यराज जी एवं मणिका जी मिठाई व समोसे लेने चल दिए| घर वापस आते हुए अचानक मणिका जी को अगले दिन होने वाली गृहप्रवेश पूजा के लिए फूल लेने की याद आ गई | ग्रोसरी स्टोर के पार्किंग स्थल पर अचानक दिव्यराज जी बिदक गये कि यहाँ फूल नही मिलते| मणिका जी के यह याद दिलाने पर कि स्वंय दिव्यराज जी उनकी वैवाहिक वर्षगाँठ पर उसी स्टोर से फूल लाये थे, दिव्यराज जी ने पाँसा फेंका कि वहाँ गेंदे के फूल नहीँ मिलते| अगले पँद्रह मिनट तक मिँया बीबी में पूजा और फूलों की किस्मो पर शास्त्रार्थ होता रहा| जब दिव्यराज जी के तरकश के सारे तीर मणिका जी के तर्को के आगे कुंद हो गये तो दिव्यराज जी थकान के बहाने कार मे बैठ गये और मणिका जी को फूल लेने अकेले भेज दिया| मैं अब तक मूकदर्शक बना दिव्यराज जी के अचानक व्यवहार परिवर्तन का कारण सोच ही रहा था कि दिव्यराज जी ने खुद रहस्योदघाटन कर दिया| वे बोले अतुल भाई जल्दी दो समोसे ट्रे से निकाल के दो | एक समोसा उन्होनें खुद खाया और एक मुझे टिका कर बोले, आधे घण्टे से समोसे की खुशबू व्याकुल किये थी पर दिल पे काबू रखना जरूरी था वरना मणिका कल पूजा के पहले इनको हाथ भी नही लगाने देने वाली थी| अभी उसे नोंक झोंक के बहाने अकेले दुकान भेजना जरूरी था| यह फरमा कर दिव्यराज जी पति धर्म का निर्वाह करने ग्रोसरी स्टोर में चले गये|
अगले दिन पूरे विधि विधान से एक पडिंत जी ने नये घर में हवन संस्कार कराया| बाद में पीजी भाई आदतन पडिंत जी से शास्त्रार्थ में उलझ गये| यह सवेंदनशील मुद्दा था मदिरापान के तथाकथित रूप से धर्मविरूद्ध होने का| पीजी भाई का तर्क जायज था, आखिर जब देवताओं द्वारा खुद सुरापान कर सकते हैं तो भक्तों के शौक पर शास्त्रों के बहाने क्यों अड़ंगा लगा रखा है| पीजी भाई पूरी तरह से हावी थे जब्कि पडिंत जी पतली गली से भागने का मार्ग तलाश रहे थे ताकि अगले जजमान के यहाँ विलंब न हो |
पडिंत जी सवेरे सवेरे एक और हादसे से दो चार हो चुके थे| दिव्यराज जी के घर का पता था 7125 ब्रुकवुड रिवर | ब्रुकप्लेस कम्युनिटी, ब्रुकवुड रिवर नाम की कम्युनिटी से कुछ ही पहले था| पडिंत जी सवेरे पाँच बजे गफलत में 7125 ब्रुकप्लेस में जा धमके और चार पाँच बार दरवाजे की घंटी दे मारी| मकान मालिक कोई गोरा अमेरिकन था| बेचारे ने उनींदी आँखो से दरवाजा खोला| पडिंत जी दरवाजा खुलते ही बोले "Where is Divyraj" | गोरे अमेरिकन जिसकी अभी ठीक से नींद भी नही खुली थी उसके लिए गेरुआ वस्त्रधारी एवं पूर्ण मस्तक चंदन तिलकधारी, अजीब सा नाम पूछते पडिंत जी किसी मंगल ग्रह के निवासी से कम साबित नही हुए| गोरा अमेरिकन पडिंत जी को हेलोवीन कास्टयूमधारी समझ रहा था| हेलोवीन नवंबर के महीने में मनाया जाने वाला पर्व है जिसमें बच्चे भूत प्रेत या अन्य विचित्र किस्म के कपड़े पहनकर टोली बनाकर घर घर टाफीयाँ माँगने निकलते हैं| वह गोरा पलटा और कुकुड़ाते हुए पँडित जो को एक मुठ्ठी टाफी टिकाने लगा| जब्कि पडिंत जी जो यह समझ रहे थे कि दिव्यराज जी ने शायद यह घर जिस किसी से खरीदा है वह पुराना मकान मालिक अभी भी वहाँ डटा है| पाँच मिनट बाद पंडित जी को पता चला कि वे गलत घर में आ गये हैं और उनका 7125 ब्रुकवुड रिवर में इंतजार करते हुए देशी जनता सूख कर काँटा हो रही हैं|

मुझे आटो में घर जाना है
करीब ६-७ माह बाद जब कार, अपार्टमेंट ईत्यादि का इंतजाम हो गया तो अपने परिवार (दादा,प्रीति व चारु) को कानपुर से बुला लिया| अब परदेशी भूमि पर पैर जम गये थे| दिव्यराज जी साथ एयरपोर्ट गये| मेरी ३ साल की चारु जिसे ६ माह पहले दिल्ली में छोड़ा था ६ मिनट बाद मुझे पहचान पायी| दादा ने बताया कि इसने एयरप्लेन में सीटबेल्ट बाँधने में ताँडव मचा रखा था| चारू कार देख कर तो चहकी पर कार-सीट देख कर बिदक गयी और बोली मुझे इस कार पर नही जाना, मुझे आटो में घर जाना है| अमेरिका में आटो? वह एक हफ्ते तक कार सीट पर नहीं बैठी| आखिर ट्वायसआरअस की रिश्वत काम आयी| कहाँ कानपुर की हजारीलाल की दुकान का काईयाँ सेल्समैन, शीशे में बंद खिलौने, दाम पूछ पूछ कर खिलौने देखने की मजबूरी और कहाँ ट्वायसआरअस का महाकाय शोरूम, फ्रीफंड की मुस्कान बिखेरती सेल्सगर्ल्स और खिलौने परखने की निरंकुश आजादी | चारू जी के तो जलवे हो गये|

कोरोला की शहादत
चार महीने रहने के बाद दादा वापस कानपुर चले गये| उनको अटलांटा एयरपोर्ट से विदा कर वापस आ रहा था| प्रीती (मेरी धर्मपत्नी) व चारू कार की पिछली सीट पर बैठे थे| प॓रीमीटर फ्रीवे की सबसे दाईं लेन से चार लेन बाई तरफ चेंज कीं| तभी देखा कुछ दूर एक कार मेरी लेन में खड़ी है| सारी लेन का ट्रैफिक भाग रहा है और यह कार बीचोबीच खड़ी थी| पूरी ताकत से ब्रेक लगाये| मेरी कार रूकते रूकते आगे वाली कार से हौले से जा लड़ी| तभी दो जबरदस्त झटके लगे| पीछे की खिड़की का काँच टूटकर हम सब पर आ गिरा| पर्मात्मा की कृपा से किसी को चोट नही लगी| बाहर निकल कर देखा , मेरी कार के आगे व पीछे दो दो कार और दुर्घटना में शामिल थीं| तेज रफ्तार ट्रैफिक के साथ यही मुश्किल है| अगर एक कार किसी वजह से रूक गयी तो पीछे की कई कारें मरखनी भेड़ों की तरह बिना आगा पीछा सोचे एक दूसरे के पीछे पिल पड़ेंगी| कार का ट्रंक पिचक गया था| पुलिस व एंबुलेंस वाले दो मिनट में आ गये| कोई घायल नही था इसलिए सारी कार्यवाही आधे घण्टे में निपट गयी| यह विदेश में दुर्घटना का पहला अनुभव था| ईंश्योरेंस कंपनी ने कार को शहीद (अमेरिकी भाषा में टोटल) घोषित करार देकर कार की पूरी कीमत के बराबर छतिपूर्ति कर दी| यहाँ कल्लू मिस्त्री छाप मरम्मत बहुत महँगी पड़ती है| शायद इसीलिए यूस एंड थ्रो का चलन है| शुरू में भारत में किसी को दुर्घटना के बारे में नही बताया, सब नाहक परेशान होते| पर एक दिन चारू पटाखा अपने दादा जी से फोन पर बोल पड़ी कि दादा मैं बच गयी| अब यह रहस्योदघाटन जरूरी था कि चारू किस चीज से बची| दो दिन बाद नयी कोरोला ली| इस बार मोलभाव के लिए पीजी भाई साथ थे| ठोंकबजा कर कार दिला दी| ज्ञानी मित्रों ने कदम कदम पर मार्ग दर्शन किया वर्ना वही होता जो अब छः साल बाद मेरे मित्र के साथ हुआ| हम दोनो साथ कही जा रहे थे, ड्राईविंग सीट पर बैठै मेरे मित्र बता रहे थे कि उन्होनें ईंश्योरेंस से कोलोजन डेमेज वेव कर दिया किसी की गलत सलाह के चलते है| तभी उनका जबरदस्त कोलीजन दूसरी कार से हुआ और हमारी कार के सेफ्टी बैग तक बाहर आ गये| हम दोनो तो बच गये पर कार शहीद हो गयी| आज जब यह कहानी लिखने बैठा तो छः साल पहले के सत्यनारायणस्वामी याद आते हैं| सुरक्षा से कभी समझौता न करने के उनके दृष्टिकोण के चलते उन्होने न सिर्फ खुद, बल्कि मुझे भी महँगा ईंश्योरेंस दिला दिया था| हलाँकि बहुत से लोग पैसे को दाँतो से पकड़ कर चलने की आदत के चलते ईंश्योरेंस में कटौती कर देते हैं और बाद में खामियाजा भुगतते हैं| कार की परदेस में वीरगति पर एक अर्थशास्त्र भी लिखा जा चुका है|

5 comments:

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया है.मजेदार.बधाई.

अतुल श्रीवास्तव said...

अतुल बहुत बहुत धन्यवाद एसी मनोरंजक लघु कथायें लिखने के लिये. सच में हास्य से ओत प्रोत तुम्हारे लेखकों को पढ़ कर वर्षों पूर्व लखनऊ और प्रतापगढ़ में बिताये गये दिनों की यादें ताजा हो गयीं. ऐसा प्रतीत होता है कि तुमने अपने लेखों के पात्रों को मेरे जीवन की घटनाओं से ही उठाया है. ऐसे ही लिखते रहो.. वैसे मेर नाम भी अतुल है और मैं भी उ.प्र. वासी (लखनऊ) हूं.

मेरी भी बकवास यहाँ पढ़ो और अपने विचार व्यक्त करो:
http://lakhnawi.blogspot.com/

अतुल श्रीवास्तव.

RS said...

Hindi lipi hai nahin mere paas, isliye angrezi main likhi hindi se kaam chala leejiye. achha laga aapka blog, hindi badi saaf hai aapki.

Anonymous said...

..(cont.) jaise UP waalon ki hoti hai aam taur par. :).

Anonymous said...

अच्छा लिखा है