March 13, 2005

अध्याय ४:गड्डी जान्दी है छलांगा मारदी!

Oh, I am going to New Jersey
दो हफ्ते बाद मेरे अभिन्न मित्र नीरज गर्ग एवं सोलंकी जी भारत से मेरी ही कंपनी में आ गये| नवीन भाई ने सप्ताहाँत पर ड्राईविंग पर हाथ साफ करने के लिए रेंटल कार ले ली | हलाँकि नवीन भाई को ड्राईविंग लाईसेंस हममें से सबसे पहले मिला, पर मिला एक धीरे से लगने वाले जोर के झटके के बाद| हम सब ड्राईविंग टेस्ट देने टेस्ट सेंटर गये| यहाँ आपके साथ एक पुलिस अफसर कार में बैठ कर एक आपका कुछ मानको के आधार पर ड्राईविंग टेस्ट लेता है| इस में दो करतब खास तौर पर उल्लेखनीय हैं| रोमांचक पैरेलल पार्किंग एवं वीविंग यानि कि आठ दस प्लास्टिक के छोटे-छोटे खंभो के बीच से शाहरुख खान की तरह कार निकालना| नवीन भाई को अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर न्यूजर्सी जाना था अतः उनके ख्यालों में न्यूजर्सी छाया हुआ था| नवीन भइया ने देशी बुद्धि दौड़ायी और बाकि लोगो को एक कोने में खड़े होकर, टेस्ट देते देख कर टेस्ट के सारे हिस्से कंठस्थ कर डाले| उनकी बारी आने पर पुलिस अफसर कार में नवीन भाई के साथ बैठा और उनका टेस्ट लेने लगा| सब कुछ ठीक चल रहा था| नवीन भाई के हिसाब से अगला स्टेप तेज चला कर ब्रेक लगाने का प्रदर्शन था, पर पुलिस अफसर ने खालिस अमेरिकी आवाज में उन्हें कार को पहले वीविंग कराने के लिए कह दिया| लेकिन नवीन भाई अपनी धुन में सीधे जाने लगे तो पुलिस अफसर ने टोक कर पूछा कि "Sir, Where are you going?" नवीन भाई इस अप्रत्याशित प्रश्न से मानो चिरनिद्रा से जागे| पर वे अभी पूर्ण सुप्तावस्था से अर्धचेतना में ही आ पाये थे| उन्हें यह कौतूहुल था कि इस पुलिस अफसर को मेरे अगले हफ्ते प्रोजेक्ट पर जाने के बारे में कैसे पता चल गया कहीं यह Primus Sofwtare वालों को तो नही जानता जहाँ वह काम करते हैं| एकबारगी उन्हे लगा कि Primus Sofwtare वालों ने इस पुलिस वाले को सेट तो नहीं कर रखा, हलाँकि ऐसा होता तो नहीं अमेरिका में| वह बोल पड़े "Oh, I am going to New Jersey|" पुलिस अफसर जो उन्हें चेताने की कोशिश कर रहा था उसे ऐसे बेहूदा जवाब की उम्मीद नही थी| उसने उन्हें टेस्ट स्थल से बाहर जाने का आदेश थमा दिया और नवीन भाई मानो आसमान से गिरे| बाहर निकलते ही पहले तो आधे घंटे तक रेंटल कार पर मुक्के ठोंकते रहे, फिर बोले गुरू क्या यह लोग सौ पचास की पत्ती मेज के नीचे से लेकर लाईसेंस नहीं दे सकते क्या? हलाँकि एक ही सप्ताह में वे दुबारा ड्राईविंग टेस्ट देकर लाइसेंस झटक लाये| उस सप्ताहाँत पर वे हम सबको एक रेंटल कार से सैर पर भी ले गये| सैर के दौरान एक सीधी सादी दिखती सड़क ने नवीन भाई को धोखे से फ्रीवे में पहुँचा दिया| अगर सोलंकी जी न संभालते तो नौसिखिया नवीन भाई फ्रीवे देखकर इतने आतंकित हो गये थे कि कार में हम सब को छोड़ कर पैदल भागने वाले थे| फ्रीवे वह बला है जिससे हर नया ड्राईवर घबराता है| दो से छः लेन का हाईवे, जिसमें हर कोई ६० से ८० मील प्रति घंटा कि गति से कार भगाता है| फ्रीवे के उस्ताद को प्रवेश, हाई स्पीड मर्ज, लेन चेंज करना , एक्जिट लेना आदि सभी कलाओं में पारंगत होना आवश्यक है| एक भी कला में कम निपुणता आपकी या आपकी कार की बलि ले सकती है| अब इन कलाओं में निपुणता के लिए एक अदद द्रोणाचार्य की हर नया अर्जुन तलाश करता है| मैं अर्जुन भी बना और समय के साथ द्रोणाचार्य भी|
आजा बताऊँ तुझे मैं अंडे का फंडा
अगर हमने महेश भाई को झेला तो मेरे मित्र (नवीन, नीरज जी व सोलंकी) सुरेश भाई से त्रस्त रहे| सप्ताहाँत पर नवीन भाई मुझे गेस्ट हाउस बुला लाए| भोजन के दौरान सोलंकी जी ने अथ श्री सुरेशानंद-व्यथा-कथा छेड़ दी| पता नही क्यों कंपनी वालो ने मेरे मित्रों के साथ एक मियाँ बीबी को भी गेस्ट हाउस में टिका दिया था| वैसे सुरेश की बीबी मेरे मित्रों का भी भोजन सस्नेह बना देती थी| वह जितनी भली स्त्री थी, सुरेश भईया उतने ही अझेल प्राणी थे| पहले तीन दिन तक तो सारे मित्र उनके श्रीमुख से सिंगापुर एयरपोर्ट के मुकाबले अटलांटा एयरपोर्ट के घटिया होने का प्रलाप सुन-सुन कर त्रस्त हुए| वजह सिर्फ एक थी की माननीय सुरेश जी को अटलांटा एयरपोर्ट में सामान रखने की ट्राली का एक डालर किराया देना खल रहा था जो सिंगापुर एयरपोर्ट में नही देना पड़ता था| उसके बाद सुरेश भाई का सिंगापुर स्तुतिगान (जहाँ से सुरेश भाई अवतरित हुए थे) और अमेरिका का नित्य निंदापुराण मेरे तीनों मित्रों की नियति बन गया| सुरेश भाई द्वारा कंपनी आफिस में इकलौते ईंटरनेट टर्मिनल पर सारे दिन का कब्जा जमाये रखना एवं गेस्ट हाउस में नाहक धौंसबाजी मेरे मित्रों के सब्र के पैमाने से उपर जा चुकी थी| तीनों मित्र गेस्ट हाउस में आमलेट नही खा सकते थे क्योंकि सुरेश भाई को अंडे की बदबू नही पसंद थी| रात में आठ बजे के बाद टीवी चलाने से सुरेश भाई की नींद में खलल पड़ता था| बेचारे मित्र प्रतिदिन डिब्बाबंद खाने की जगह मिलने वाले ताजे खाने की वजह से सुरेश भाई को पैकेज्ड डील की तरह बर्दाश्त कर रहे थे| बातचीत में पता चला कि वस्तुतः यह सुरेश, महेश के सगे भाई भी थे जिन्हें मैने झेला था| जब मैनें उनको बर्तन रखने की अलमारी का किस्सा सुनाया तब सबको दोनों भाईयों के व्यवहारिक धरातल का सहज अनुमान हो गया| उस समय दोनो भाई कहीं गये हुए थे| महेश सवेरे नीरज जी को जाने क्या अनुचित बोल गया था कि अगर सुरेश की बीबी का लिहाज न होता तो नीरज जी व सोलंकी, महेश भाई की धुलाई कर डालते| मुझे शाम को आमलेट बनाने की सूझी| सोलंकी जी ने टोका भी कि सुरेश सपरिवार आ रहा होगा| मैनें कहा ठीक मैं भी महात्मा के दर्शन कर लूँगा , पर आमलेट जरूर खाऊँगा| मित्रगण मेरे स्वभाव से कालेज के जमाने से परिचित थे अतः थोड़ी देर में होने वाले प्रहसन के इंतजार में टीवी लगाकर बैठ गये| आमलेट बनने के धुँए के बीच सुरेश जी अवतरित हुए व सीधे सपत्नीक कमरे में चले गये| कुछ ही देर में बाहर आकर कुकुरनासिका का प्रदर्शन करते हुए जिज्ञासा प्रकट की कि किसी ने आमलेट बनाया था क्या? मैं बोला हाँ मैं बना रहा हूँ| सुरेश जी कुछ भृकुटी तान कर बोले पर इस बर्तन में तो शाकाहारी खाना बनता है| मैने पूरी कनपुरिया दबंगई से जवाब दिया "अरे, आपको महेश ने नहीं बताया कि चीनी डांग तो इसी बर्तन में बीफ (गाय का माँस) बनाता था जिसे महेश बाद में धोकर टमाटर-चावल की लुगदी पकाने के लिए प्रयोग करता था|" सुरेश जी इससे पहले कुछ और सोचें, मै चालू रहा "और अभी आप सब रेस्टोरेंट में खाकर आ रहे हैं वहां कौन सा शाकाहारी भोजन बनाने से पहले बर्तनों का धार्मिक शुद्धीकरण होता है|" सुरेश जी अवाक रह गये| महेश उन्हें और जलील होने से बचाने के लिए कमरे में खींच कर ले गया| मित्र मंडली की हँसी बमुश्किल ही रूक पायी| दोनों भाईयों में शायद पहले डांग को लेकर जमकर नोंक झोंक हुई फिर न जाने क्या सूझी कि दोनों भाई, सुरेश की पत्नी को उसके सामान सहित कहीं छोड़ने चले गये| नवीन भाई इस प्रकरण में सुरेश की पत्नी के जाने से कुछ दुखी थे| उनको फिर से डिब्बाबंद खाने पर जीना अप्रिय लग रहा था | पर बाकी सब इसलिए प्रसन्न थे कि अब सुरेश तो निहत्था गेस्ट हाउस लौटने वाला था| अब तो हमाम में सभी नंगे हैं जो जिस पर जैसे चाहे रोब जमायें| हुआ भी वही, एक सप्ताह में सुरेश भाई मेरे मित्रों के बदले हुए वाचाल वानरी रूप के आगे नतमस्तक हो गये| उन्हें अहसास हो गया कि गेस्ट हाउस में जब तक उनकी पत्नी थी वहाँ शराफत थी| उसकी बीबी के लिहाज से सब उसे चाहे-अनचाहे सम्मान देने को और उसके नाज सहने को विवश थे| पर बेचारा अपनी पत्नी को गेस्ट हाउस से भेजकर वानर सेना के हत्थे चड़ गया और वह भी बिना ढाल के| सबने उसे बेतरह परेशान किया रात रात भर टीवी चलाकर, जमकर निरामिष भोजन बनाकर| यहाँ तक कि जब सबका एक साथ प्रोजेक्ट लगा तो सबने सुरेश को एक हफ्ते पुराने हिसाब के १५ डालर जानबूझ कर एक-एक सेंट के सिक्कों की शक्ल में थमा दिये| लेकिन कृपणचंद तीन किलो भारी चिल्लर का थैला लादे लादे एयरपोर्ट चला गया|
मेरी पहली टोयोटा कोरोला
प्रोजेक्ट मिलने के बाद ड्राईविंग लाईसेंस झटकना एकसूत्रीय कार्यक्रम बन गया था| पहले लिखित परीक्षा देकर लर्नर परमिट मिला| कुछ ड्राईविंग लैसंस भी लिए| सत्यनारायण जी के दर्दनाक अनुभवों से विश्वास हो चुका था कि ड्राईविंग लाईसेंस पाना टेड़ी खीर है|मेरा व उनका ड्राईविंग गुरू एक ही गोरा था| बेचारे चार बार बैरंग वापस लौट चुके थे| हर बार कुछ न कुछ गलती कर बैठते थे| पाँचवी बार हद हो गई| सत्यनारायण जी ड्राईविंग टेस्ट के सारे स्टेप ठीक कर चुके थे, पैरेलल पार्क करते हुए ब्रेक की जगह हड़बड़ी में एक्सीलेटर झोंक दिया और टेस्ट सेंटर में लगा एक खंभा ही जमींदोज कर डाला| मुझे अगले दिन मेरी ड्राईविंग प्रैक्टिस के दौरान उस गोरे ने बताया कि सत्यनारायण जी हताशा में अपना माथा ठोंक रहे थे| उन्हें फेल करने वाला महाखड़ूस ड्राईविंग परीक्षक भी उन पर तरस खाकर दिलासा दे रहा था| फिर भी जब सत्यनारायण जी का मस्तक ठोंकन बंद नही हुआ तो उस गोरे ने झल्ला कर अपनी कार के ट्रंक के टूलबाक्स से एक हथौड़ा निकालकर थमा दिया सर को ठोंकने को| सत्यनारायण जी भारत वापस जाने पर अमादा हो गये| रात भर उनका प्रलाप चलता रहा कि यहाँ कभी लाईसेंस नही मिलने वाला| हिदुंस्तान होता तो अब तक ट्रैफिक एक्जामिनर की हजार पाँच सौ से हथेली गर्म कर के मिल गया होता| अब कब तक पैदल चलूँ , कही किसी दिन किसी कार या ट्रक के नीचे आ जाऊँगा| उन्होनें हिंदुस्तान पलायन की ठान ली थी| मैने अगले दिन अपने कंपनी डायरेक्टरों को उनके घायल जज्बातों के बारे में बताया| वे बेचारे दोनों अपने सारे काम छोड़ कर भागे| सत्यनारायण जी की दोनो ने करीब करीब साईकोलाजिकल काऊँसिलिंग कर डाली|
अगले दिन मेरा ड्राईविंग टेस्ट था| टेस्ट एक गोरी एक्जामिनर ले रही थी| जब उसने मुझसे वीविंग करने के लिए बोला तो मैने उससे पूछा कि “Which style , Left before, center left, center right or right after?” वीविंग के इतने सारे प्रकार सुनकर एक्जामिनर समझ गई कि पाला गोरे ट्रेनर के चालू शागिर्द से पड़ा है| मै ड्राईविंग लाईसेंस पाने मे कामयाब हो गया| इतना सुखद अहसास कि मानो लंका जीत ली हो| एक महीने बाद आफिस में एक सहकर्मी से एक अदद पुरानी टोयोटा कोरोला आनन फानन में खरीद डाली| मैं शाम को सोच रहा था अगर यह कार कानपुर में खरीदनी होती तो पहले जानकारी के लिए न जाने किसकी-किसकी चिरौरी की जाती| कार सपरिवार मंदिर दर्शन को जाती| मिष्ठान वितरण होता | यहाँ तो बस पैसे दिये और कार दरवाजे पर, कोई बधाई देने वाला नही|

3 comments:

Jitendra Chaudhary said...

मजा आ गया,
जितनी बार पढा, उतनी बार हँसी आयी, और हद तो तब हुई, जब पत्नी जी दूसरे कमरे से पूछती हुई आयी, कि क्या हो गया? जब उन्होने पढा तो वो भी बहुत हंसी.

हमारे भी काफी खट्टे मीठे अनुभव थे ड्राइविंग लाइसेन्स लेने मे, वो फिर कभी सुनाउंगा. अभी के लिये तो आपका ब्लाग पढकर ही सन्तोष कर लेता हूँ.

Scott Fish said...

This is a really cool site!

Ive been trying to find several india related blogs before I travel to Mumbia this summer.

Thanks!

- India Fashion Week

Anonymous said...

ाति ुतम ापका पन्रा पडकर काफी परसनाता हुि.