December 03, 2004

अध्याय ३: वेलकम टु अमेरिका

वेलकम टु अमेरिका
अटलांटा एयरपोर्ट पर ईमिग्रेशन से निपटने के बाद बाहर आकर देखा कि लोगों की निगाहें अपने-अपने आगंतुको को तलाश रही हैं| कुछ टैक्सी वाले आने वाले लोगों के नाम की तख्ती लिए खडे थे| तभी मुझे अपने नये कंपनी डायरेक्टर की एक हफ्ते पहले ईमेल पर दी गई सलाह याद आई कि अपने कैब ड्राईवर से मिलने के बाद ही बैगेज क्लेम से अपना समान उठाना| दो दिन लग गये थे यह पता करने में कि टैक्सी को कैब भी कहते हैं| पर यहाँ तो अपना नाम किसी की तख्ती पर नही है| अब? आज तो रविवार है| आफिस भी बंद होगा| किसी को फोन करुँ या खुद टैक्सी करुँ| उधेड़बुन में सोचा चलो पहले बैगेज क्लेम से अपना सामान ही उठाया जाय| वापस आकर फिर देखा तो एक नये नजारे के दर्शन हुए| वेटिंग लाऊँज तकरीबन खाली हो चुका था| आगँतुकों को लेने आये मुलाकाती उनकी झप्पियाँ ले रहे थे| एकाध देशी लोग जो महीनों से अपनी बीबीयों से दूर थे, उनके आने पर झप्पियों के साथ पप्पी लेने से नहीं चूके| मैं सोच रहा था कि अगर प्लेन में अशोक सिंघल या प्रवीण तोगड़िया आये होते तो अमेरिका में हिंदुस्तानियों के इस तरह सार्वजनिक प्रेम प्रदर्शन पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती?मेरी नजर एक दुबले पतले मोना सरदार जी पर पड़ी जो एक फटीचर सा कागज का पोस्टर जैसा कुछ लिए अपना शिकार तलाश कर रहे थे| नजदीक जाकर देखा तो उनके पोस्टर पर मुझ नाचीज का ही नाम चस्पां था| उनसे दुआ सलाम हुई तो जान में जान आई| सरदार जी मुझे लेकर टैक्सी की ओर चल दिए| बीच में किसी दक्षिण भारतीय युवक को उन्होने एक अदद "Hi" उछाल दी| रास्ते में सरदार जी ने एयरपोर्ट पर अपने देर से प्रकट होने का राज खोला| वे समय से पहले पहुँचे थे ,पर मेरा और मेरी कम्पनी का नाम लिखी तख्ती घर में भूल गये| कार से वेटिंग लाऊँज आते-आते मेरी कंपनी के नाम "Primus Software" में से Primus उनकी याददाश्त से कहीं टपक गया और वे सिर्फ Software को अपने साथ वेटिंग लाऊँज लेते आए| दक्षिण भारतीय युवक ईमिग्रेशन से निकलने वाला पहला हिंदुस्तानी था| सरदार जी ने उससे सवाल दागा "Are you from software?" अब भला वह युवक क्यों मना करता आखिर वह भी यहाँ कम्पयुटरों से कुश्ती लड़ने ही तो आया था| सरदार जी उस भाई को अतुल अरोरा समझ लेकर अपने साथ ले गये और लगे रास्ते में पंजाबी झाड़ने| सरदार जी का माथा तब ठनका जब वह बंदा अंग्रेजी से नीचे उतरने को राजी नही हुआ| सरदार जी को दाल में काला नजर आया कि अगर कोई बंदा न हिंदी समझता है न पंजाबी तो वह अरोरा तो हो ही नही सकता| सरदार जी ने जब उसका नाम पूछने की जहमत उठायी तो उन्हे ईल्म हो गया कि वह गलत आदमी को पकड़ लाये है और असली अरोरा उन्हें एयरपोर्ट के वेटिंग लाऊँज पर लानतें भेज रहा होगा| बेचारे तुरंत यू टर्न लगा कर एयरपोर्ट वापस आये जहाँ उस दक्षिण भारतीय युवक को लेने आया ड्राईवर हैरान हो रहा था कि उसका मुसाफिर कहाँ तिड़ी हो गया| सरदार जी, इससे पहले कि असली अरोरा कहीं गुम न हो जाये, कहीं से एक कागज का जुगाड़ कर मेरा नाम उस पर लिखा और मेरा इंतजार करने लगे|

यह बर्तन रखने की अलमारी है
कंपनी के गेस्ट हाउस में दो जंतु मिले, एक हिंदी भाई महेश एक चीनी भाई डांग| डांग को मेरे महेश से हिंदी बोलने पर कोई एतराज नही था, होता भी तो बेचारा अकेला चना कौन सा भाड़ फोड़ लेता| महेश भाई टीसीएस के भूतपूर्व कर्मचारी थे और उन्हें अमेरिका प्रवास का एक वर्ष का अनुभव था| शुरू में बड़ी खुशी हूई कि नये देश में अपनी जबान बोलने वाला कोई अनुभवी मित्र मिल गया| पर यह खुशफहमी ज्यादा देर नहीं रही| महेश भाई का अनुभव खाने पीने के मामले में बहुत कष्टकारी सिद्ध हुआ| बंदा ग्रोसरी स्टोर में शापिंग कार्ट लेकर एक तरफ से दौड़ लगाता था और पेमेन्ट काउन्टर पर पहुँचने से पहले उसकी शापिंग कार्ट वाली ट्रेन के सिर्फ चार अदद स्टेशन आते थे टमाटर, दूध, दही एवं फल| इन सबके के अतिरिक्त बाकि सभी चीजें किसी न किसी प्रकार उसकी नजर में माँस युक्त थी अतः और कुछ देखना उसके हिसाब से समय की बर्बादी था| चार दिन से भाई ने टमाटर, चावल व दही निगलने पर मजबूर किया हुआ था| मैं हैरान था कि बाकि कनपुरिये मात्र दही-चावल-टमाटर पर यहाँ कैसे अब तक जीवित हैं| एक दिन अपने पुराने मित्र शुक्ला जी के घर फोन किया तो उनकी धर्मपत्नी ने ईंडियन ग्रोसरी जाने की सलाह दी| पर महेश भाई को ईंडियन ग्रोसरी ले जाने को तैयार करना किसी कुत्ते को बाथटब में घुसेड़ने से कम मुशकिल नहीं था| रोज वही दही-चावल-टमाटर का भोज फिर बर्तन धोना| एक दिन महेश भाई चावल बनाने मे व्यस्त थे और मैं गप्पबाजी में कि अचानक किसी अलमारी जैसी चीज का हैंडल मुझसे खुल गया| एक अजीब सी अलमारी जिसमें बर्तन लगाने के रैक बने थे| मेरे प्रश्न का महेश भाई ने उत्तर दिया , यह बर्तन रखने की अलमारी है | मैंने कहा पर रैक तो ऊपर काऊंटर पर भी लग सकते थे , तो यह अलग से अलमारी की क्या जरुरत? महेश भाई ने शांत भाव से उत्तर दिया ताकि बर्तनों का पानी इसी में गिर जाये, देखो अलमारी के नीचे पानी निकलने का छेद भी बना है| मैं अभी तक बिजली के उल्टे स्विच की महिमा ही समझ नही पाया था, अब यह एक नया शगूफा| दरअसल जिस अपार्टमेंट में हम रूके थे वहाँ तकरीबन हर महीने नये लोग आते रहते थे एवं पुराने लोग जाते रहते थे| इस आवागमन की अवस्था को बेंच पर आना या बेंच से बाहर जाना कहते हैं| बेंच का तत्वज्ञान बड़ा सीधा सा है| हिंदुस्तान से कंप्यूटर प्रोग्रामर्स को अमेरिकी कंपनियाँ (body shoppers or head hunters) H1B वीसा पर बुलाती हैं अपना स्थायी कर्मचारी दर्शा कर, जो निश्चित अवधि के प्रोजेक्टस पर दूसरी कंपनीयों में काम करते हैं| दो प्रोजेक्टस के बीच की अवस्था, या फिर नये H1B रंगरूट को पहला प्रोजेक्ट मिलने से पहले की अवधि बेंच पीरीयड कहलाती है| यह एक तरह से अघोषित बेरोजगारी है जिसमें हर बाडीशापिंग कंपनी के कायदे कानून उसकी सुविधा के अनुसार बने हैं| कोई कंपनी बिना कोई भत्ता दिये ६-७ लोगों को एक ही अपार्टमेंट में ठूंसकर रखती है| हफ्ते भर का राशन दे दिया जाता है और तब तक पूरी तनख्वाह नहीं मिलती जब तक बेंच पीरीयड खत्म न हो जाये| इस गोरखधंधे का खुलासा आगे के अध्यायों में विस्तार से करूँगा, यहाँ सिर्फ ईतना ही जोड़ूँगा कि मैं इस कंपनी में पहले से तसल्लीबख्श हो कर आया था| मुझे पता चल गया था कि मेरे कुछ और मित्र भी इसी कंपनी के सौजन्य से अमेरिका पधारे हैं या आने वाले हैं| बाद में कंपनी के काम के तौर तरीके देखने और कंपनी के मालिकों से मिलने के बाद यह यकीन हो गया कि मेरा कंपनी पर भरोसा सही निकला| पर गेस्ट हाउस में एक हफ्ते में ही महेश भाई के तथाकथित अनुभव का पोस्टमार्टम हो गया| श्री सत्यनारायण उर्फ सत्या पीट्सबर्ग से बेंच पर गेस्ट हाउस में पधारे| वे अमेरिका प्रवास के मात्र चार माह के अनुभवी थे उस पर से ड्राईविंग लाईसेंसधारी भी नही थे अतः महेश भाई की नजर में तुच्छ प्राणी थे| दही-चावल-टमाटर का भोज तो वे बिना शिकवा शिकायत के उदरस्थ कर गये पर हमें बर्तन साफ करते देख कर खुद को रोक नही पाये और जिज्ञासु होकर पूछ बैठे कि हमें डिश वाशर से क्या एलर्जी है? मैंने पूछा कि यह डिश वाशर किस चिड़िया का नाम है तो उन्होंने बर्तन रखने की अलमारी के असली गुणों का परिचय करा कर हम अज्ञानियों का उद्धार कर दिया| परंतु अब महेश भाई हम लोगों के निशाने पर आ चुके थे| जल्द पता चल गया कि महेश भाई के दही-चावल-टमाटर प्रेम का राज शाकाहार नही बल्कि निरि कँजूसियत है| महेश भाई वास्तव में टीसीएस (एक नामचीन भारतीय बाडी शापिंग फर्म) से फरारी काट रहे थे| वे खुद अटलांटा में थे पर उनके प्राण उनकी खटारा कार जिसे वे केंटकी में छोड़ आए थे, में अटके थे|हर शनिवार की सुबह उनका एक ही शगल होता था, केंटकी फोन करके अपने दोस्तों से यह पूछना कि उनके पुराने मैनेजरों में कोई उनको,उनके बिना बताए भाग आने पर ढूढ तो नही रहा, और अपने दोस्तो से चिरौरी करना कि अटलांटा घूमने आ जाओ| वजह साफ थी, पाँच सौ डालर की कार को बिना नौसौ का भाड़ा खर्च किए अटलाँटा मँगाने का इससे सस्ता तरीका नही हो सकता था| महेश भाई ने बचत के अनोखे तरीके ईजाद कर रखे थे| दो महीने से पहले बाल कटवाने नहीं जाते थे| अपनी कृपण मित्र मंडली के सौजन्य से हर बार ऐसी हेयर कटिंग सैलून का पता लगा लेते थे जहाँ नये कारीगरों को प्रशिक्षण के लिए माडलों की जरूरत होती थी| महेश भाई हमेशा ऐसी जगह सहर्ष माडल बनने को तैयार हो जाते थे, क्योंकि वहाँ बाल काटने के चौथाई पैसे पड़ते थे| तभी वह हर बार नयी से नयी हैरतअंगेज हेयर स्टाईल में नजर आते थे, भले ही इसी वजह से हमारे कंपनी मालिक नीरज साहब उन्हें उस हफ्ते कहीं व्यक्तिगत साक्षात्कार पर भेजने से हजार बार क्यों न सोंचे|

हम काले हैं तो क्या हुआ दिल वाले हैं
सप्ताहाँत पर महेश भाई को एक मित्र मोहन ने अपार्टमेंट शेयर करने का प्रस्ताव दिया| मोहन ने मुझे भी साथ ले लिया| अपार्टमेंट खोज के दौरान महेश भाई खासतौर से हर अपार्टमेंट काम्पलेक्स का स्विमिंग पूल देखने का आग्रह जरूर करते थे| मोहन को उनका स्विमिंग पूल से अतिशय प्रेम हजम नहीं हो रहा था| एक और बात थी कि अक्सर अपार्टमेंट पसंद आने के बाद मोहन भाई स्विमिंग पूल देख कर ही अपार्टमेंट नापसंद कर देते थे| झल्लाकर मोहन को पूछना पड़ा कि आखिर स्विमिंग पूल से महेश को क्या शिकवा है? बात बड़ी दिलचस्प निकली| दरअसल महेश भाई ध्यान दे रहे थे कि आसपास अश्वेतों की आबादी कितनी है| चूँकि वर्णभेद संज्ञेय अपराध है, अतः प्रबंधतंत्र से सीधे नही पूछा जा सकता था कि वहाँ किस तरह के लोग रहते हैं? इसलिए महेश भाई ने स्विमिंग पूल के मुआयने के बहाने अश्वेतों की आबादी का अनुपात निकलाने का विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया था| यह पता चलने पर मोहन ने महेश भाई को लंबा चौड़ा भाषण पिला दिया, गाँधी जी तक को बहस में घसीट लिया गया| पर महेश भाई टस से मस नहीं हो रहे थे| बहुत घिसने पर महेश भाई ने बताया कि अश्वेतों से उन्हें कोई दुराग्रह नहीं है ,बल्कि पूर्व में उनके साथ हुई एक दुर्घटना इस एलर्जी का कारण है| दरअसल जैसे लँगड़े को लँगड़ा कहना गलत है वैसे ही काले को काला कहना| चुँनाचे देशी बिरादरी अश्वेतों को आपसी बातचीत में कल्लू कहकर बुलाती है| पर धीरे धीरे यहाँ के कल्लुओं को पता चल गया है कि कल्लू का मतलब क्या होता है| बल्कि उन लोगों ने सभी प्रसिद्ध भाषाओं में कल्लू का मतलब सीख रखा है| पर महेश भाई को कल्लुओं के ज्ञान की सीमा का पता न्यूयार्क यात्रा में चला| वे अपने बचपन के दोस्त के साथ घूम रहे थे, जिसका नाम दुर्योग से कल्लू था| महेश भाई ने टाईम्स स्कवायर पर दोस्त को जोर से पुकारा और पास खड़े चार अश्वेतों को ईतना बुरा लगा कि उन्होने महेश भाई को खदेड़ लिया| वह दिन है और आजका दिन है महेश भाई एक ही गाना गाते हैं "जिस गली में रहे कलवा,उस गली से हमें तो गुजरना नहीं|"

श्री सत्यनारायण कथा
एक दो हफ्ते बाद प्रोजेक्ट मिल गया और मैं सत्या भाई के साथ कुछ माह के लिए रुम पार्टनर बन गया| सत्यनरायण जी ने बहुत से काम अपने अनुभव से आसान कर दिये| अब मैं भी एक अदद क्रेडिटकार्डधारी था| सत्या भाई शास्त्रीय संगीत प्रेमी थे| मेरे पास कुछ गिनी चुनी आडियो सीडी थीँ और उनको कोई भी खास पसंद नही थी| एक दिन मैं ईंडियन ग्रोसरी से दलेर मेंहदी का तुनक तुनक तुन उठा लाया| वह उनको कुछ ज्यादा ही भा गया| हलांकि उस भलेमानुस को लुँगी में कुछ तमिलियाना अँदाज में तुनक तुनक तुन गाते देखना कम रोचक नही था| एक दिन सवेरे बाथरुम में नहाते हुए सत्या भाई बाथटब में ढ़ह गये| कारण था नहाते हुए भाँगड़ा करने की बचकानी कोशिश|

मोनिका को गुस्सा क्यों आया?
यह घटना किसी चुटकुले से कम नहीं है| घटना की संवेदनशीलता को मद्देनजर रखते हुए मैंने इसके दो पात्रों (तीसरी पात्रा से अब संपर्क नही है) से इसे अपनी किताब में शामिल करने की पूर्वानुमति ले ली है| बात मेरे पहली कार खरीद लेने के बाद की है पर हमारे कंपनी गेस्ट हाऊस से जुड़े होने के कारण इसका जिक्र इस अध्याय में ही उचित होगा| मेरे ईंजीनीयरिंग कालेज में साथ पढे पाँच छः मित्र तीन महीनों के अंतराल, हमारी कंपनी में ही नियुक्त होकर अमेरिका आये| कंपनी के गेस्ट हाउस का फोन नंबर, ईंजीनीयरिंग कालेज में पढे अमेरिका में मौजूद तकरीबन सभी मित्रों को पता था| प्रायः सभी मित्र नये आने वाले दोस्तों को फोन लगाकर उनके हालचाल पूछ लेते थे और जरूरी सलाह मशविरा भी दे देते थे| मैं चूंकि अटलांटा में प्रोजेक्ट पर कार्यरत था अतः गेस्ट हाउस में आने वाले मित्रों से आसानी से मिल सकता था| एक बार मेरे से एक साल वरिष्ठ सहपाठी श्रीमान सोती (soti) जी गेस्ट हाऊस में पधारे| सोती जी बहुत ही विनम्र स्वभाव के मित्र हैं| उस सप्ताहाँत पर मैं गेस्ट हाऊस गया और उन्हें लेकर अपनी कार से अटलाँटा भ्रमण पर निकल गया| उसी सप्ताह गेस्ट हाऊस में दो और नये प्राणी आये थे, एक बंदा जिसका मुझे नाम याद नही और एक बंदी मोनिका| उन दोनों से हम लोगों ने जाते हुए पूछ लिया था कि उन्हें ईंडियन ग्रोसरी से कुछ मंगाना तो नहीं| शाम को मैनें सोती जी को गेस्ट हाऊस वापस छोड़ा और अपने अपार्टमेंट को चल दिया| मेरे रूम पार्टनर सत्यनारायण स्वामी ने बताया कि मेरे लिए किन्हीं गोस्वामी का फोन था| गोस्वामी जी भी मेरे वरिष्ठ सहपाठी हैं और श्रीमान सोती के बैचमेट हैं| गोस्वामी जी बहुत ही मिलनसार एवं विनोदी स्वभाव के हैँ| गोस्वामी जी से हुआ वार्तालाप प्रस्तुत है
मैः गुरू जी, नमस्कार|
गोस्वामी जीः नमस्कार प्रभू, क्या गुरू खुद भी घूमते रहते हो और हमारे सोती जी को भी अवारागर्दी की आदत डलवा रहे हो|
मैः अरे गोस्वामी जी सरकार, अब अपने मित्र भारत से नये नये आते हैं, पास में कार तो होती नहीं, तो थोड़ी सेवा ही सही| सोती जी को शापिंग कराने ले गया था|
गोस्वामी जीः अच्छा अच्छा| यार पर एक बात बता , गेस्ट हाऊस में भाभीजी भी साथ आयी हैं क्या ? और क्या भाभी बहुत तेजतर्राट हैं या आज उनका सोती से सवेरे सवेरे झगड़ा हूआ था?
मैः भाभीजी? तेजतर्राट? अरे गुरूदेव, सोती साहब तो अकेले आयें हैं, भाभी बाद में आयेंगी| आपको किसने कह दिया कि उनका कोई झगड़ा हुआ है?
गोस्वामी जीः यार लगता है कुछ लोचा हो गया है| कुछ समझ नहीं आ रहा| मैनें सवेरे गेस्ट हाउस सोती को फोन लगाया था| सोती तो मिला नहीं, फोन पर किसी महिला की आवाज आयी| मैं समझा कि शायद सोती भारत से भाभीजी को साथ लाया है| मैंने नमस्ते की और बताया कि गेस्ट हाऊस का नंबर मैंने तुझसे लिया है|
मैः फिर?
गोस्वामी जीः मैनें उन मोहतरमा से पूछा कि "सोती किधर है"? पर इतना पूछते ही वह भड़क गईं, कहने लगी कि आप को तमीज नहीं है| आप महिलाओं से ऊलजलूल सवाल पूछते हैं , आपको शर्म आनी चाहिए| यह कहकर उन मोहतरमा ने फोन ही पटक दिया| अब यार तू ही बता , मैनें कौन सा ऊलजलूल सवाल पूछा?
मैं भी पशोपेश में पड़ गया कि गोस्वामी जी से ऐसी कौन सी खता हो गई जो मोनिका जी क्रूद्ध हो गईं| चूंकि मोनिका जी अगले ही दिन किसी दूसरे प्रांत चली गयीं, अतः उनसे संपर्क नही हो सका| हलाँकि बाद में जब यह वृतांत अन्य मित्रों को बताया गया तो वह सब के सब हँस हँस के दोहरे हो गये| उनके जवाब "जाकी रही भावना जैसी, प्रश्न का अर्थ समझे तिन तैसी" ने गुत्थी सुलझा दी| अफसोस कि मोनिका जी को हम यह स्पष्टीकरण नहीं दे सके| यादि आपको मोनिका जी कहीं मिले तो आप उन्हें बता दीजिएगा कि गोस्वामी जी ने तो उनसे सिर्फ अपने मित्र सोती जी का ठिकाना पूछा था|

8 comments:

Kalicharan said...

Kya Likhe hain :D Haans Haans ke pait dukh gaya.
Too Good.

Jitendra Chaudhary said...

काली भाई,
अगर मै आपको कल्लू भाई, कहूँ तो आपको बुरा तो नही लगेगा?
अपनी कमेन्टस हिन्दी मे लिखो यार... रोमनवा हिन्दी हमारे ऊपर से निकलती है,कोई रोमनवा मे तारीफ भी करता है तो लगता है कि कौनो फच्चर फिट कर रहा है.

Jitendra Chaudhary said...

अमाँ यार, अभी हवाई जहाज उतरा नही क्या?
अगला पन्ना कब छापोगे?

वैसे ही ब्लाग जगत मे सन्नाटा पसरा हुआ है.

abhishek sinha said...

sach mein kaphi achcha likha hai ,,,,,padh ke maza aaya ,,,,sorry ab mujhse mat kahiyega ki hindi mein kyon nahin likha ,,,,are janab mujhe type karna is angreji bhasha mein hi aawat hai ,,,,taun agreji ma hi likha hoon ,,,,,tau bhai ram ram ,,,,bahut maza awa,,,sachchi ma.....

Anonymous said...

बहुत शानदार लिखते है अतुल भाई, हॅस हॅस कर बुरा हाल हुआ है। अभी तक जितने ब्लोग पढे सबसे शानदार आपका ही लगा। जितनी बधाई दी जाये कम ही होगी। अनुरोध है कि लिखना जारी रखेगे। सादर धन्यवाद।

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।

Mangal said...

जो कुछ भी हो, चिट्ठा (blog) तो एकदम बिंदास लिखा है | लिखना जरी रखैं | प्रष्ठ का पता संजो लिया गया है |