December 03, 2004

अध्याय २: पहली हवाई यात्रा

फन्ने खाँ मत बनो
शुभचिंतको की राय थी कि अमेरिका जाने से पहले कार चलाना सीख लेना फायदे में रहेगा| हलाँकि वहाँ कार चलाने का ढंग बिल्कुल अलग है पर कम से कम स्टीयरिंग पकड़ने का शऊर तो होना ही चाहिए| अपने परिवार मे किसी ने पिछली सात पुश्तों में भी कार नही खरीदी है, अतः एक कारड्राईविंग स्कूल में जाकर ट्रेनिंग ली| ट्रेनिंग सेंटर के अनुभव से कह सकता हूँ कि ज्यादातर रईस अपने किसी रिश्तेदार या ड्राईवर से कार चलाना सीखते हैं, इसका मजेदार नतीजा बाद में मैने अमेरिका में देखा| इन ट्रेनिंग स्कूल में आने वाले ज्यादातर लड़के ड्राईवर की नौकरी करने के लिए सीखने आते हैं| ट्रेनर कोई खान साहब थे| बेचारे लड़के खान साहब से इतनी चपत खाते थे कि पूछिए मत| खान साहब हर गलती पर उनके सर के पीछे जोरदार चपत रसीद करते थे इस जुमले के साथ "ससरऊ ,कायदे से सीखो वर्ना मालिक दो दिन में निकाल बाहर करेगा|" पर खान साहब ने मुझे कानपुर में ही एक्जिट रैंप, हाईवे मर्जिंग वगैरह के बारे में बता दिया था यह बात दीगर है कि उन्होनें खुद कभी हिंदुस्तान से बाहर कदम नहीं रखा था|एक दिन मजेदार वाक्या हुआ| मेरे ट्रेनिंग का आखिरी दिन था| खान साहब ने मुझसे खाली सड़क पर कार तेज स्पीड में चलवा कर देखी और तारीफ की कि तेज स्पीड में भी कार लहराई नहीं| लौटते समय एक लड़का कार चला रहा था| बेचारे ने खाली सड़क देख कर जोश में कार कुछ तेज भगा दी और तभी उसके सर के पीछे जोर की टीप पड़ी| खान साहब गुर्रा रहे थे " ज्यादा फन्ने खाँ बनने की कोशिश न करो , तुम भी क्या इनके साथ अमेरिका जा रहे हो जो हवा मे कार उड़ा रहे हो?"

तुम्हारा एयरकंडीशनर उखड़वा दूँ क्या?
विदेश जाने से पहले ईनकमटैक्स क्लीयरेंस लेना था| मेरी पहली कम्पनी में होने वाली ईनकम टैक्स के काबिल नहीं थी पर एयरपोर्ट पर ईमीग्रेशन काउँटर के यमदूतों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं होता| ईनकमटैक्स आफिस से कोई कागज निकलवाना हो तो कोई न कोई जुगाड़ जरूर होना चाहिए| मैं एक इनकम टैक्स कमिश्नर का सिफारिशी पत्र लेकर पहुँच गया| कानपुर की भाषा में इसे जैक लगाना (जैक, जो पंचर कार को जमीन से ऊपर उठाने के काम आता है) कहते है| कमिश्नर साहब की चिठ्ठी लेकर मैं उस अधिकारी (शायद संपत्ति अधिकारी) के पास पहुँचा जिसके पास पूरी ईमारत की देखभाल का जिम्मा था| उन जनाब ने कमिश्नर साहब की चिठ्ठी एक चपरासी को सुपुर्द की और मुझे उसके साथ भेज दिया हर संबद्ध अधिकारी/लिपिक से फार्म पर साईन करवाने | एक क्लीयरेंस के लिए इतने सारे अधिकारियों की चिड़िया फार्म पर बैठाने की लालफीताशाही| हर अधिकारी की डेस्क से मेरा निंरकुश फार्म निकल गया पर आखिर में एक धुरंधर लिपिक टकरा ही गया| चपरासी को दरकिनार कर उसने मुझसे कोई ऐसा फार्म माँग लिया जो मेरे पास नही था| घूस खाने के लिए ही इस तरह की गैरजरूरी शासकीय बाध्यताऐं खड़ी की जाती है हमारे समाजवादी दुर्गों में| चपरासी ने उस लिपिक को ईशारा किया कि फार्म के साथ कमिश्नर साहब का सिफारिशी जैक लगा है पर वह लिपिक फच्चर लगाने पर तुला रहा| मजबूर होकर चपरासी उस लिपिक से कहा साहब, आप बड़े साहब (संपत्ति अधिकारी) मिल कर उन्हीं को समझाओं| लिपिक तैश में आगे आगे और हम दोनों पीछे से संपत्ति अधिकारी के कमरे में दाखिल हुए| संपत्ति अधिकारी ने प्रश्नवाचक नजरों से लिपिक की ओर देखा| आगे के संवाद इस प्रसंग का मनोरंजक पटाक्षेप हैं
संपत्ति अधिकारी: क्या हुआ?
लिपिकः साहब इनके (मेरी तरफ ईशारा करके) फार्म में फलाना दस्तावेज नहीं लगा है|
संपत्ति अधिकारी: तो?
लिपिक: साहब वह दस्तावेज जरूरी है|
संपत्ति अधिकारी: कमिश्नर साहब की सिफारिशी चिठ्ठी की भी कुछ ईज्जत है कि नहीं?
लिपिक: साहब, उनकी चिठ्ठी सिर-माथे पर बरसात में खड़े होकर भी कोई बिना भीगे कैसे जा सकता है? (ईनकमटैक्स आफिस से कोई बिना सुविधाशुल्क दिये कैसे जा सकता है?)
संपत्ति अधिकारी: तुम्हारे कमरे से एयरकंडीशनर उखड़वा दूँ क्या?
लिपिक ने इस ब्रम्हास्त्र के चलने पर बिना एक शब्द बोले हस्ताक्षर कर दिए| ठंडी हवा का सुख खोने का डर लालफीताशाही अकड़ पर भारी पड़ा|
कनपुरिया चला एनआरआई बनने
लुफ्थांसा की फ्लाईट से अटलांटा जाना था| दिल्ली तक परिवार छोड़ने आया था| पहली बार विदेश जाने का अनुभव भी आम की तरह खट्टा मीठा होता है| परिवार से विछोह सालता है| नये देश के अनजाने बिंब मन में घुमड़ते हैं कि जो कुछ अब तक सिर्फ तस्वीरों में देखा है वह साकार होने जा रहा है| एक अजीब सी अनिश्चितता परेशान करती है कि पहले खुद को बाद में परिवार को एकदम अनजानी धरती पर स्थापित करना है| यह सब रोमांचक भी है और कठिन भी| वह सब याद करने पर एक फिल्म का डायलाग याद आता है, A League Of Their Own में महिला बेसबालकोच बने टाम हैंक्स अपनी मुश्किलों पर आँसू बहाती एक लड़की पर चिल्लाते हैं कि "अगर यह खेल मुश्किल न होता तो हर कोई इसका खिलाड़ी होता | फिर मुशकिलों पर आँसू क्यों बहाना?" सच भी है जब दूसरे छोर पर सुनहरे भविष्य की किरणें दिखती हैं तो न जाने कहाँ से हर मुश्किल हल करने की जीवटता आ जाती है| खालिस कनपुरिया को अच्छा खासा एनआरआई बनते देर नहीं लगती|

प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?
दिल्ली के ईंदिरा गाँधी एयरपोर्ट पर औपचारिकताऐं निपटाते हुए एक मजेदार वाक्या याद आ गया| लखनऊ में साथ में एक अनिल भाई साथ में काम करते थे| अनिल को हमारे सब साथी प्यार से गंजा कहते थे क्योकि वह बहुत छोटे बाल रखता था| खैर हमारा प्यारा गंजा विश्व बैंक के गोमती प्रोजेक्ट पर हमारी कंपनी की तरफ से कुछ काम में लगा था| प्रोजेक्ट मैनेजर को दिल्ली में प्रोजेक्ट रिपोर्ट दिखानी थी| प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो गंजू भाई ने बड़ी धाँसू बना दी| पर प्रोजेक्ट मैनेजर में प्रोजेक्ट कमेटी के सवालों की बौछार और कंप्यूटर पर प्रिजेक्ट रिपोर्ट को एक साथ चलाने का माद्दा नहीं था, चुनाँचे उसने गंजे को दिल्ली साथ चलने का हुक्म तामील कर दिया| गंजा बाराबंकी का रहने वाला था और मेरी तरह उसने भी ऐरोप्लेन को या तो तस्वीरों में देखा था या टीवी पर | खैर जनाब अपने प्रोजेक्ट मैनेजर के साथ दिल्ली की फ्लाईट पर सवार हो गये| गंजू भाई बाकि यूपीवालों की तरह पानमसाले के शौकीन थें और हवाई यात्रा में भी मसाला मुँह में दबाये हुए थे| उन्होनें सोचा कि मौका पाकर हवाई जहाज के शौचालय में पीक थूक देंगे| पर कुछ देर में नींद लग गयी| आधे घंटे बाद नींद खुली तो आदतन पीक नीचे थूकने के लिए खिड़की खोलने की नाकामयाब कोशिश की| खिड़की नहीं खुली तो ताव में पीक पिच्च से पाँव के नीचे ही थूक दी| दरअसल गहरी नींद से जागने के बाद गंजू भाई भूल गये थे कि वह दिल्ली तशरीफ ले जाये जा रहे हैं, उनको गफलत थी कि वह बाराबंकी जाने की बस पर सवार हैं| बगल वाले यात्रीयों के चिल्लपों मचाने पर गंजू भाई उनसे बाराबँकी वाले अँदाज में भिड़ गये| इस धमाल के बीच परिचारिका (ऍयरहोस्टेस) आ गई और पीक देख कर गंजू भाई की ओर उसने भृकुटी तानकर पूछा कि यह क्या है? गंजू भाई अभी भी किंकर्तव्यविमूढ़ थे कि यह बस में लेडी कंडक्टर कहाँ से आ गई? उन्होनें बड़े भोलेपन से पूछा क्या बाराबंकी आ गया? एयरहोस्टेस ने कर्कश स्वर में जवाबी सवाल किया "प्लेन को क्या बाराबंकी की बस समझ रखा है?". अब मामला गंजू भाई की समझ में आ गया था, आगे क्या हुआ यह बताना गंजू भाई की तौहीन होगी|

यह लेमन वाटर क्या होता है?
मैनें लुफ्थांसा की फ्लाईट में दो नादानियाँ की थीं| पहले तो जब ऍयरहोस्टेस ने मुस्कुराते हुए ईयरफोन गिया तो मैंने भी मुस्कुराते हुए यह सोचकर वापस कर दिया कि भला विदेशी संगीत सुनकर क्या करूँगा| यह देर से पता चला कि प्लेन पर फिल्में देखने का भी ईंतजाम होता है| फिल्म पँद्रह मिनट की निकल गई तब जाकर पता चला कि ऍयरहोस्टेस को बुलाने के लिए अपने हाथ के पास लगा बटन दबाना पर्याप्त है| दूसरी नादानी खाने के बाद काफी लेकर की| अपने उत्तर भारत में काफी दूध वगैरह डालकर मीठी पीते है| अंग्रेजो की काफी एकदम काली और जहर के मानिंद कड़वी लगी| कुछ कुछ ऐसी ही काफी दक्षिण भारत में भी प्रचलित है| खैर ऍयरहोस्टेस से लेमन वाटर माँगा| ऍयरहोस्टेस ने हैरत जताई कि उसने कभी लेमन वाटर के बारे में नहीं सुना| बाद में वह सादे पानी में कटा नीबू डालकर ले आयी| अब इस तरह का लेमन वाटर तो अपने यहाँ होटल में खाने के बाद चिकने हाथ साफ करने में उपयोग होता है जिसे कभी कभी कोई देहाती नादानी में पी भी जाता है, यहाँ मैं देहाती बन गया था| पता ही नही था कि विदेशों में लेमन वाटर लेमोनेड के नाम से जाना जाता है| हो सकता है कि ऍयरहोस्टेस को नही पता होगा अतः सदाशयता में वह सादे पानी में कटा नीबू डालकर ले आयी| पर शायद एयरलाईन के कर्मचारियों को यह ट्रेनिंग तो दी जाती है कि दुनिया के अलग अलग हिस्सों में कुछ खाद्य पदार्थ अलग नाम से भी प्रचलित हैं| ऐसें मामलों में यह गोरे लोग विशुद्ध घोंघाबसंत बनकर क्या रेशियल प्रोफाईलिंग नहीं करते? सोचिऐ अगर ऍयरईंडिया की ऍयरहोस्टेस किसी अमेरिकी के एगप्लाँट माँगने पर अँडो पर मूली के पत्ते सजाकर पेश करदे तो क्या होगा?

8 comments:

अनूप शुक्ला said...

सारे लेख रोचक हैं.कई बार पढ़े.मजा आया.आगे के लेख का इंतजार है.लालफीताशाही (प्रापर चैनेल)के बारे में परसाईजी ने लिखा है--इस देश का प्रापर चैनेल बहुत चौड़ा है.कुछ लोग प्रापर चैनेल नहीं पार पाते वो इंगलिश चैनेल पार कर जाते हैं.आप की क्षमता पता चलती है इस बात से कि आप दोनो चैनेल सफलता पूर्वक पार कर गये.बधाई.

Anonymous said...

Annop Shukla Sir i like urs Barabanki story i like it very ver much, best of luck for urs next topic -- From ROHIT, Kanpur (U.P.)

Anonymous said...

आपके संस्मरण पढकर मजा आ रहा है, समय का अभाव है , लेकिन टुकडों मे इन्को जरूर पढूगां.

Sanjai said...

Hi,
Janaab taalluq to hamara bhi Kanpur se hai. Agar jee chahe to thoda sa parichay kar lete hain. 7136286624.
Sanjai

nilesh747 said...

aapki story hame bahut pasand aaye!
http://gonusangtine.blogspot.com/

aruna said...

kya baat hai Atul !
bahut deeno ke baad koi original leekh deekha aur pura aanand bhi aaya
bahut khub !
aruna
canada

JANENDRA said...

yar school life me to itni achi hindi likhte nahi the. America me ja kar sikhi hai kya.
Raju Chauhan

JANENDRA said...

Yar apni scool life ki kuch khatti mitthi yado ko bhi khali samay me likh dalo mughe bhut acha laga.
Raju Chauhan