December 03, 2004

अध्याय ‍१: ओवर टू यूएसए

टेलिफोन काल जो भूचाल बनकर आयी
अपने कैरियर के तीन साल लखनऊ कानपुर में खर्च करने के बाद एक दिन मुझे भी यह ब्रह्मज्ञान हो गया कि उत्तर प्रदेश में ईनफारमेशन टेक्नोलोजी की क्रांति शायद मेरी जवानी में आने से रही| अपनी सरकार तो बस सूचना क्रांति के नाम पर हर शहर में टेक्नोलाजी पार्क बनाकर ठोंकती रहेगी सरकारी बाबूओं के पीकदान बनने के लिए, या फिर कभी कभी साईबरठेला जैसे मदारियो के तमाशे किये जाते रहेंगे| सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में कम्पयूटरीकरण केनाम पर होने वाले तमाशे के लिए अलग से अध्याय लिखना पड़ेगा| मै समझ गया कि अंततः भला इसी में है कि हवा के रूख के साथ अमेरिका के लिए बोरिया बिस्तर बाँध लिया जाये| खैर कुछ महीने तक अपनी कर्मकुँडली यानि बायोडेटा को कम से कम एक हजार नियोक्ताओं के पास भेजने के बाद यह तक भूल गया कि किस किस के पास भेजा था| सोचा कि दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, हम तो खाक छाने कानपुर की और हमारी कर्मकुँडली ईंटरनेट की बदौलत दुनिया की मुफ्त सैर कर रही है| खैर कर्मकुँडली को कुछ लोगो ने पसंद भी किया और कुछ टेलीफोन काल्स भी आईं, ऐसे ही एक दिन फोन रिसीव करने पर उधर से शालीन आवाज आई "This is Neeraj, and I saw your resume. I want to talk to you about your projets." कुल पाँच मिनट की संक्षिप्त बातचीत हूई और जनाब ने यक्ष प्रश्न पूछ डाला कि "हाँ कहने के क्या लोगे?" बात साफ थी , कि जनाब नया जाब आफर दे रहे थे| मैं पशोपेश में था कि नीरज साहब रहते किस शहर में हैं, दिल्ली या बम्बई तो फिर उसी हिसाब से मुँह खोलूँ| खैर कूटनीतिक जवाब दिया "Mr Neeraj, that will depend on the place of posting". नीरज जी ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया "It does not vary here much, because of the place of posting,except west coast". मेरे मन के एक साथ कई घंटियाँ बज गईं "क्या वेस्ट कोस्ट, यानि कि अमेरिका , यानि कि जवाब डालर में होना चाहिए, यानि कि ........." | खैर नीरज जी ने जो आफर दिया वह मैंने सर्हष स्वीकार कर लिया| नीरज ने अगले दिन ईमेल भेजने की बात कही और अगले दिन टेक्निकल ईंटरव्यू करने का जिक्र किया| पर अगले दिन मेरे ईमेल ईनबाक्स पर आफर लेटर विराजमान था , और दो दिन में ही एक कोरियर असली लेटर कुछ हिदायतों के साथ जिनमें पासपोर्ट के कुछ पेज भी माँगे गये थे| इस पाँच मिनट की काल ने , कनपुरिया भाषा में बवाल मचा दिया| अब कानपुर की आबोहवा छूटने के समय आ गया था| जिंदगी ने १८० डिग्री का टर्न ले लिया था| एक अनजानी दुनिया में पैर टिकाने की तैयारियाँ करनी थी|

क्या छोड़ूँ और क्या ले चलूँ
पहले कुछ दिन बड़ी दूविधा में बीते| अगर आप में से कोई पहली बार अमेरिका आ रहा है तो यह प्रसंग आपके काम का हो सकता है| आपको ऐसे ऐसे विशेषज्ञ मिल जायेंगे कि जिन्होनें खुद तो अपने शहर के बाहर ताउम्र पाँव भी नहीं रखा होगा पर आपको अमेरिका में किस चीज की जरूरत पड़ती है, क्या मिलता है , क्या भारत से लाना पड़ता है यह सब बताने को तत्पर रहेंगे| यह और बात है कि इन सबकी सलाह परस्पर विरोधी होंगी और अंततः आप लालू यादव की भाषा में कनफ्युजिया जायेंगे| लोगो का बस चले तो आपके सामान में रिन साबुन , डालडा घी, प्रेशर कुकर और न जाने क्या क्या बँधवा दें| एक ऐसे ही अंकल चिंतातुर हो रहे थे कि यार तुम शराब को हाथ भी नहीं लगाते तो अटलाटा जैसी ठंडी जगह में जिंदा कैसे रहोगे| अब अटलांटा तो खास ठंडा नहीं था पर यह पात चल गया है कि चार साल से फिलाडेल्फिया जैसी जगह जहाँ बर्फ भी पड़ती है, वहाँ मेरे जैसे कई भलेमानुष बिना सुरासेवन के जिंदा हैं| कोई वहाँ कढ़ाई ले जाने पर जोर दे रहा था तो कोई रजाई| भला हो अमेरिका में पहले से रह रहे मित्रों का जिन्होने वक्त पर सही मार्गदर्शन कर दिया| यहाँ सब कुछ मिलता है| घर एयरकंडीशंड होते हैं अतः रजाई कोई नही ओढ़ता| मेरे एक मित्र को ऐसे ही विशेषज्ञों ने रजाई, कढ़ाई और न जाने क्या माल असबाब लाद कर ले जाने पर मजबूर कर दिया था| बेचारा एयरपोर्ट पर फौजी स्टाईल के बिस्तरबंद के साथ कार्टून नजर आ रहा था|

मेरे जीजा भी कैलीफोर्रनिया में रहते हैं
अमेरिका जाने के पहले सभी नाते रिश्तेदारों से एक बार मिलने के सिलसिले में बड़ा मजेदार अनुभव हूआ| ज्यादातर दूर के रिश्तेदारों के न जाने कहाँ से अमेरिका में संबधी उग आये| अपने निकट का तो खैर कोई कभी भारत से तो क्या उत्तर प्रदेश से भी बाहर मुश्किल से ही गया होगा| अब इन दूर के रिश्तेदारों और जानपहचान वालों ने अपने अमेरिकी रिश्तेदारों के नंबर भी देने शुरू कर दिए , इसके लिए मुझे साथ में हमेशा एक डायरी रखनी पड़ती थी| सोचता था कि कभी तथाकथित अमरीकी रिश्तेदारों को देखा तो है नही इन लोगों के यहाँ, जो रिश्तेदार अमेरिका में रह कर इन पास के रिश्तेदारों को नहीं पूछते वे भला मुझ दूर के रिश्तेदार को क्यों लिफ्ट देंगे| फिर भी औपचारिकता निर्वाह हेतु नंबर सबके नोट कर लिए| एक दिन तो हद हो गयी | किसी ने सलाह दी कि, कस्टम के नियमानुसार सारे लगेज बैग में चाहे छोटे ही सही ताले लगे होने जरूरी हैं| अतः एक परचून वाले की दुकान जाकर सबसे सस्ते ताले माँगे| परचून वाले ने ताले देते हुए पूछ लिया कि "साहब थोड़े मजबूत वाले ले लो , यह तो कोई भी तोड़ देगा"| मैने जब हल्के ताले पर ही जोर दिया तो उसने अगला सवाल उछाला "क्या प्लेन से कहीं जा रहे है"? मेरे हाँ के जवाब में अगला सवाल हाजिर था कि कहाँ? मेरे अमेरिका कहते ही वह परचूनिया बोला "अरे भाई मेरे जीजा भी कैलीफोर्रनिया में रहते हैं| आप उनका नंबर जरूर ले जाओ| शायद काम आ जायें", और वह जनाब बाकि ग्राहकों को टापता छोड़ डायरी लेने चल दिए| मैं सोच रहा था कि मेरा खानदान अब तक अमेरिकियों से अछूता कैसे रह गया| यहाँ तो परचूनिए तक के सँबधी अमेरिका में बैठे हैं| चाहे वह इन हिंदुस्तानियों को पूछे न पूछे यह लोग हरेक को उनका नंबर दरियादिली से बाँटते रहते हैं|

6 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अतुल भाई,
मजा आ गया....
शुरुवात तो बहुत बढिया है....
बस एक चीज की कमी अखर रही है.....
हर अध्याय के आखिर मे अगले और पिछले अध्याय का लिंक हो तो मजा आ जाये.....
वैसे दांयी तरफ तो लिंक मिला हुआ है, और एक बात..... इस किताब का पीडीफ डाउनलोड लिंक हो तो कहने ही क्या.....

Ashish Gupta said...

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Kanwal said...

Waah Atul bhai.. bahut khoob likha hai... bahut badhiya.. baki ke comments poora padhne ke baad likhunga :)

Kanwal

anam said...

बहुत शानदार लिखते है अतुल भाई, हॅस हॅस कर बुरा हाल हुआ है। अभी तक जितने ब्लोग पढे सबसे शानदार आपका ही लगा। जितनी बधाई दी जाये कम ही होगी। अनुरोध है कि लिखना जारी रखेगे। सादर धन्यवाद।

Jerry said...

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